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01 February, 2012

मोहे पिया बिनु चैन न आवे री ..........

राग के भाव ...मन के भाव कितने विचित्र हैं ...इतनी सुंदर राग बसंत में सुख और दुःख एक साथ कैसे गया जा सकता है ....?आप  खुद भी सोचिये.. ...बहुत  हंसने  के  बाद  एक  घड़ी  शांत  बैठने  का  मन  करता  ही  है  ...है न  ...!बसंत पर विरह की कविता न हो मन नहीं मानता ...या शायद बसंत चर्चा ही पूर्ण नहीं होती.....!!जितना आनंद बसंत की श्रृंगार रस की कविता पढ़ कर आता है ...उतना ही प्रबल भाव विरह श्रृंगार भी देता है ....!!


बहुत दिन बीते ...
बीती रतियाँ ...
करत कागा सो बतियाँ ...
पियु तुम काहे  लिख लिख भेजो झूठी पतियाँ ...?
..
राग बसंत मैं पल छिन गाऊं...
विविध  भाँती  अनुराग  सुनाऊं ... 
 झर झर अंसुअन नीर बहाऊं ..
कोयल को ताने  विरह सुनाऊं ...
मन की पीर कैसे जतलाऊं...
ह्रदय चीर.. हिय हीर की पीर ..
कछु कह नाहीं पाऊं ....
आकुल ..व्याकुल ..मौन रह जाऊं ...

दरसन बिनु प्यासे नैन...
अब न कटत दिन रैन ..
जिया   मोरे नाहीं इक पल  चैन...
मन मंदिर की ज्योत जले ...
 मनवा कैसी लगन लगे ...
जर-जर दियरा ...
जियरा अगन लगे ..
ऐसो बसंत ...छायो अनंत ..
मनवा मा सुरसा सी  पीर जगावे री ..
सखीरी बसंत नहीं सुहावे री ....
ए री  ...
मोहे पियु  बिन चैन न आवे री ....
मोहे बिन पियु चैन न आवे री ....
मोहे पिया बिनु चैन न आवे री ...!!!!!!

33 comments:

  1. वसंत की समस्त खुशियों के बीच एक विरहिणी का दुःख सभी सुखों से ऊपर होता है... शायद चारों ओर सुख बयार बहती देख दुःख की पीड़ा असह्य हो जाती है!! आपने इस विरह-गीत में उन भावों को अभिव्यक्ति
    दी है!!

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  2. मोहे पियु बिन चैन न आवे री ....kisi ko nahee aayaa ise kaise aaye
    par hradya kee vyathaa bahut khoobsoortee se sunaaye
    padh kar man ko achhaa lagaa,badhaayee

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  3. आपके उत्‍कृष्‍ठ लेखन का आभार ।

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  4. सच है...विरह गीत के बिना वसन्त अधूरा था...
    बहुत सुन्दर रचना अनुपमा जी.

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  5. पिऊ बिन चैन नहीं ... तो कैसे कुछ भावे

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  6. bahut sudar manbhaaven geet virah vedna vo bhi basant me ....kya khoob chitran kiya hai.....vaah

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  7. अनुपमा जी ! अनुपम विरह गीत..

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  8. बसंत और विरह... बहुत खुबसूरत रचना....
    आदरणीया अनुपमा जी सादर बधाई स्वीकारें...

    बासंती धुन बज रही, चहुँ दिस चारो ओर |
    चन्दा ताकत रैन गयी, दूर मेरा चितचोर ||

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  9. राग बसंत मैं पल छिन गाऊं...
    विविध भाँती अनुराग सुनाऊं ...
    झर झर अंसुअन नीर बहाऊं ..
    कोयल को ताने विरह सुनाऊं ...

    वाह...क्या शब्द हैं...क्या भाव हैं...बेजोड़.

    नीरज

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  10. अनुपम भावपूर्ण प्रस्तुति.
    मन की टीस को खूबसूरती से
    उकेरा है आपने.

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  11. बसंत की ऋतु जहां एक ओर श्रृंगार के रचनाकारों को प्रेरित करती है वहीं दूसरी ओर इस ऋतु में विरह की वेदना भी अपने पूरे स्वरों में प्रकट होती है ..... कवियत्री का ‘राग बसंत’ शब्द का कविता में प्रयोग करना भी इस ओर इशारा करता है।

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  12. बेहद खूबसूरत कविता।

    सादर

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  13. मोहे पियु बिन चैन न आवे री ....खुबसूरत भावनायो को और भी सुन्दर बना दिया है आपके कमाल के शब्द रचना ने.... बहुत ही प्यारी लगी रचना......

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  14. विरह हो मन में तो कैसा बसंत ...? सुंदर रचना

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  15. सुंदर रचना।
    गहरे अहसास।

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  16. बेहतरीन भाव की सुंदर रचना,लाजबाब प्रस्तुतीकरण..
    बहुत दिनों से मेरे पोस्ट आपका आना नही हुआ,
    आइये स्वागत है,.....

    NEW POST...40,वीं वैवाहिक वर्षगाँठ-पर...

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  17. विरह व्यथा को वसन्त ने कितना बढ़ा दिया है उसका बहुत ही सशक्त चित्रण किया है ! बहुत ही खूबसूरत रचना !

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  18. मन विरहणी बन व्याकुल सा हो गया.. बिन पिया चैन कैसे आवे..?

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  19. इस गीत को आपने गाया तो जरूर होगा हमें भी सुनाएँ...

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    Replies
    1. अनीता जी बड़ा अच्छा लगा आपकी बात सुनकर |ये गीत तो मैंने अभी ही लिखा है इसे नहीं गाया किन्तु जिस पद से प्रेरित होकर यह रचना लिखी है ...वो है ...सूरदास जी का ...
      पिया बिनु नागिन कारी रात ...
      जो कहूँ जमीनी उवत जुन्हैया ..
      डसी उलटी ह्वै जात ...

      ये मेरा प्रिय भजन है ...कभी मौका लगा ज़रूर सुनाऊंगी ........

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  20. बसंत राग और विरहन की गूँज ... असल संगीत को सुनने का क्या मंज़र होगा ....

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  21. बेहतरीन विरह गीत ..

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  22. भावप्रवण गीत, पढ़कर बहुत अच्छा लगा...

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  23. mai to har panktiyan do -do baar man hi man me padhti ja rahi thi
    man ki virah vytha ko bahut hi behtreen shabdo me sanjoya hai aapne
    bahut bahut hi umda
    poonam

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  24. har panktiyan baar -baar padhne ko vivash karti aapki
    ye post itni badhiyan lagin ki mai shabdo me bayan nahi kar sakti
    bahut bahut hi umda
    poonam

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  25. .



    बहुत सुंदर रचना !
    यद्यपि बसंत के स्वर उल्लास और आह्लाद लिए होते हैं…

    कृपया, जब आप इस रचना को स्वरबद्ध करें तो अवश्य सुनने का अवसर दें …
    ताकि एक नये अनुभव के साक्षात् का अवसर मिले …

    पिछली पोस्ट की बसंत रचना और इस रचना के लिए बहुत बहुत आभार और बधाई !

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