नमस्कार ....!!आपका स्वागत है ....!!

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23 May, 2012

चल मन ....लौट चलें अपने गाँव .....!!

जेठ कि तपती है..
 जब दुपहरी ....
कहीं झिर झिर..
 कुछ झरता है ..
बिन बदरा भी बरसता है .....
पारदर्शी कर्मरत  मन ,
लिए झीने आवरण ,
दिनचर्या ..शुश्रुशण...!!

युगों युगों से अनवरत ...
पौराणिक,प्राचीन ...
या समकालीन ...
हर युग में ..
यही तेरा अस्तित्व ....
जिससे निखरता जाता -
तेरा व्यक्तित्व ...
ममता की -
वटवृक्ष सी छाया  देता  ...
साक्षात् रूप तेरा ..
मानवता के -
शाश्वत प्रश्नों का-
करता  साक्षात्कार ...
अलंकृत ...सुसज्जित ...
क्षमाशील वात्सल्य तेरा ...
प्रतिकूलता को अनुकूलता  में ..
परिवर्तित करने की
शक्ति देता है ...
स्वजनों  से घिरी ....
सुघड़ वत्सला ......क्या सोचे ...?

माथे पर जीवन  की -
दिव्य आशाओं का...
दमकता ..चमकता ....
लाल सिंदूरी सूरज ...
ह्रदय से उठती ....
आँखों में रूकती ...
कुछ अनकही सी व्यथा ...
तेरे रूप का-
निरूपण कर रही हैं ...!!
कह भी दे री-
मन कि कथा ...
अब क्या है-
तेरी मनोव्यथा ....?
..आज  मुड़कर  क्यूँ  देखे  ...
क्या  कहता है -
ठहरा ठहरा ...सा
शांत सा मन .....?

भीगी सी पलकें ....
बिखरी सी अलकें ...
समेटती ...
धीमे से मुस्काती ...
मन टटोलती ...कहती है ...............

''कुछ यादें मन पर यूँ छाई हुई है ...
आज  मन बहलाने आई हुई हैं ...
जैसे कह रही हों ...कुछ पल को ...
 ...चल मन लौट चलें अपने गाँव ....
अकेली है ...उदास सी ...पीपल की ठंडी छाँव ....
कुछ पल को ...
चल मन .....लौट चलें अपने गाँव .....!!''
***********************************************************************************
बड़े चाव से नारी अपना घर बसाती है ....!कुछ पल को सब कुछ भूल जाती है ..!उन्हीं में रची-बसी रहती है ...!जब धीरे धीरे जिम्मेदारियां बढ़ने लगतीं हैं ....,एक दिन के चौबीस घंटे भी कम पड़ते हैं अपने कर्तव्य और अभिलाषाओं के बीच झूलते ....!मन  उलझने लगता है ...,जेठ का सूरज सर पर चमकने लगता है .....,उस वक्त कौन सी ऐसी स्त्री है जिसे अपने मायके  की ,वो पीपल की ठंडी छाँव याद नहीं आती .....?हमारे पूर्वजों ने हमारे समाज कि रचना कितनी खूबसूरती से ....गहन विचार कर की थी !समय-समय पर स्त्री का मायके जाना ज़रूरी होता था |समाज से डर कर भी हम ,कुछ मान्यताओं का पालन करते थे जो कि हमारे ही भले के लिए हुआ करती थीं |अब हम अज़ाद हैं पर अपने  ही बंधनो से घिरे हुए ........................................... ...?
अब ज्यादा याद आती है .....पीपल की  ठंडी छाँव ....कुछ  पल को ....चल मन ...
लौट चलें अपने गाँव ....!!!!


***

54 comments:

  1. यह उस मन की पुकार है जो शहर की आपाधापी और कोलाहल से त्रस्त है और कुछ पल की सुकून, शांति की चाह में अपनी प्यारी माटी की ओर लौट जाना चाहता है।
    एक शांत, सरल और प्रभावकारी सिल्प से लिखी कविता उद्देश्य परक है।

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  2. बहुत सुन्दर ! प्रशंसनीय ..

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  3. मन के भावो को शब्द दे दिए आपने......

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  4. शनिवार 26/05/2012 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. आपके सुझावों का स्वागत है .

    धन्यवाद!

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    Replies
    1. बहुत आभार यशोदा जी .....!!

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  5. मानव मन हमेशा अपने जड़ो से जुड़े रहना चाहता है . परिस्थितियां जहाँ भी ले जाय, अपने गांव पहुचकर जो अपना पन और सुकून का एहसास होता है उसे शब्दों में आपने निपुणता और आत्मीयता से उकेरा है . मन आल्हादित हुआ .

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  6. छुट्टी का हक़ है सखी, चौबिस घंटा काम |
    बच्चे पती बुजुर्ग की, सेवा में हो शाम |

    सेवा में हो शाम, नहीं सी. एल. ना इ. एल. |
    केवल है सिक लीव, जाय ना जीवन जीयल |

    रविकर मइके जाय, पिए जो माँ की घुट्टी |
    ढूँढ़ सके अस्तित्व, बिता के दस दिन छुट्टी ||

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    Replies
    1. आभार रविकर जी
      आपके शब्द एक भावपूर्ण अर्थ जोड़ देते हैं कविता को ....
      सच ही है .....माँ ही वो घुट्टी ,वो संजीवनि,वो शक्ति ,वो संस्कार देती है जो हमारा अस्तित्व हैं ....!!

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  7. बहुत सुंदर......................
    मन विकल हो उठा.......

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  8. कह भी दे री-
    मन कि कथा ...
    अब क्या है-
    तेरी मनोव्यथा ....?
    ..आज मुड़कर क्यूँ देखे ...
    क्या कहता है -
    ठहरा ठहरा ...सा
    शांत सा मन .....?... इस कथा को आज भी न कहा तो कभी न ख़त्म होगी व्यथा

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    Replies
    1. आज तो पीपल की ठ्ण्डी छांव याद आ रही है दी .......!!
      फिर मन तो मन है कभी कभी व्यथित रहने के बहाने भी तो ढूंढता है ....
      और फिर बहती है मन की सरिता कुछ लिखने की व्याकुलता लिये ........!!
      अभार दी ....बस आप यूँ ही अपना मार्गदर्शन देती रहें ....!!

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  9. अनुपमाजी मैके की छाँव कौन नहीं चाहता ....लेकिन हमारे बंधन ....बस एक उच्छ्वास से ही अपने को सांत्वना देने को बाध्य कर देते हैं ....बड़ी कोमल भावना को एक सुन्दर व्यथा में गूंथकर अभिव्यक्त किया है आपने....बहुत ही सुन्दर !

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  10. भावनाओं की माला में कुछ पल ऐसे भी गूंथे जाते हैं जिनके बिना माला पूरी नहीं होती ... अनुपम भाव संयोजित किये हैं आपने ...आभार

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  11. वाह बेहद खूबसूरत रचना ...बेजोड

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  12. वक़्त के हाथों
    पीपल का वो दरख्त
    ढह गया
    उसकी ठंडी छांव का
    साया भी दरक गया
    बस यादों में
    रह गयी है
    उसकी ठंडी छांव
    ठिठक गए हैं
    अब मेरे पाँव ।


    आपकी सुंदर अनुभूति ने वाकई ठंडी छांव की याद दिला दी .... बहुत सुंदर रचना ...

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    1. आभार संगीता जी ...
      आपकी पंक्तियाँ चार चांद लगा रही हैं इस रचना मेँ ....
      कैसे आभार व्यक्त करूं आपका ....!!!!

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  13. वक्त कोई भी हो अपनी जड़ों से कोई भी नहीं छूटना चाहता.बहुत भावपूर्ण .

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  14. वाह ,,,, अनुपम भाव संयोजित रचना,,बहुत अच्छी प्रस्तुति,,,,

    RECENT POST काव्यान्जलि ...: किताबें,कुछ कहना चाहती है,....

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  15. ''कुछ यादें मन पर यूँ छाई हुई है ...
    आज मन बहलाने आई हुई हैं ...
    जैसे कह रही हों ...कुछ पल को ...
    ...चल मन लौट चलें अपने गाँव ....

    बहुत सुंदर भावपूर्ण रचना..यह व्यथा बनी रहे तभी तो अ \पने असली गाँव जाने का ख्याल कभी भूलेगा नहीं...

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  16. अकेली है ...उदास सी ...पीपल की ठंडी छाँव ....
    कुछ पल को ...
    चल मन .....लौट चलें अपने गाँव .....!

    बहुत ही सुन्दर !

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  17. ये मन तो पागल है ... अतीत कों भूल ही नहीं पाता .. खींचता है अपने गाँव की और ...
    सुकून देती कविता ...

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  18. मन के अनुठे अहसासो को बहुत सुन्दर शब्दो से सजाया है...... अनुपमा जी

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  19. अकेली है ...उदास सी ...पीपल की ठंडी छाँव ....
    कुछ पल को ...
    चल मन .....लौट चलें अपने गाँव .....!!''
    बहुत सुन्दर ... गाँव को लौटने को मन तो होता ही है

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  20. स्वयं से साम्य,
    रहा एक अपना गाँव..

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  21. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 24 -05-2012 को यहाँ भी है

    .... आज की नयी पुरानी हलचल में .... शीर्षक और चित्र .

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    Replies
    1. बहुत आभार संगीता जी ......!!

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  22. जीवन की भागदौड़ बहुत कुछ ले लेती है..... सुंदर रचना

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  23. सुन्दर भावाव्यक्ति!!

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  24. लाजवाब रचना...बेहतरीन प्रस्तुति....

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  25. इस भागमभाग में पुराने सुकून के दिनों की याद सुकून देती है।

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  26. बहुत सुन्दर.

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  27. भावुक करती सुन्दर अभिव्यक्ति...

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  28. अनुपम छटा बिखेरी है मन के भावों की बहुत सुन्दर सशक्त रचना ...वाह ...जेठ की दुपहरी और गाँव के उस पेड़ की छाँव बहुत सुन्दर बिम्ब

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  29. कई बार पढ़ा
    क्या और बचा!

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  30. बहुत सुन्दर कोमल भाव......प्यारी रचना

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  31. आप के अहसास महसूस कर सकता हूँ ...भरी-भरकम शब्द नही :-)) मैं तो ...
    शुभकामनाएँ!

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  32. बहुत सुन्दर और सार्थक अभिव्यक्ति!

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  33. मित्रों चर्चा मंच के, देखो पन्ने खोल |

    आओ धक्का मार के, महंगा है पेट्रोल ||

    --

    शुक्रवारीय चर्चा मंच

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    Replies
    1. बहुत बहुत आभार रविकर जी ...!!

      Delete
  34. बहुत सुन्दर और सार्थक अभिव्यक्ति!

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  35. कभी कभी मन सोचता, और करे फरियाद।
    संस्कार को तज हुआ, कौन भला आजाद?


    अमुवा झूला डोलता, पंछी, चिरगुन शोर।
    मनवा मोरा भागता, फिर गांवों की ओर॥


    सुंदर, शीतल बयार सी रचना...
    आदरणीया अनुपमा जी सादर बधाई स्वीकारें।

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  36. koi apna na ho jab gaanv
    man kis kone me chhanv dhoonde sajni
    abhi to sab hain...ye hai..vo hai...peepal bhi hai.
    jab kuchh nahi ..................tab ?

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    Replies
    1. बहुत सुंदर सार्थक प्रस्तुति ,,,,बेहतरीन रचना,,,,,

      MY RECENT POST,,,,,काव्यान्जलि,,,,,सुनहरा कल,,,,,

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  37. really a heart touching nostalgic poem....which compels us to recollect the moments of our candid childhood and the reminiscences left behind
    great work mam
    thanks a lot

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  38. क्षमाशील वात्सल्य तेरा ...
    प्रतिकूलता को अनुकूलता में ..
    परिवर्तित करने की
    शक्ति देता है ...
    स्वजनों से घिरी ....
    सुघड़ वत्सला ..

    हृदयस्पर्शी अभिव्यक्ति...
    सादर
    मधुरेश

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  39. पीपल की ठंडी छाँव सा सुख
    बीते दिनों की बात लगती है !
    फिर भी यादों में दिन सुहाने ही लगते हैं !

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  40. आप सभी का हृदय से आभार प्रकट करती हूं|मार्ग दर्शन देते रहें|शुक्रिया ...!!

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  41. श्श्कुछ यादें मन पर यूँ छाई हुई है ...
    आज मन बहलाने आई हुई हैं ...
    जैसे कह रही हों ...कुछ पल को ...
    ...चल मन लौट चलें अपने गाँव

    सुंदर भावों से संयुक्त बहुत अच्छी रचना।

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  42. कितनों के मन की बात कही है आपने इस कविता में...बहुत बहुत सुन्दर है कविता!!!

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नमस्कार ...!!पढ़कर अपने विचार ज़रूर दें .....!!