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12 September, 2012

शब्द रह गए अनकहे ....!!


हर व्यक्ति एक मूर्तिकार है ....स्वयम को तराशता हुआ ...!!
बीतता ही जा रहा है ये जीवन ....साल दर साल ...उम्र का एक बड़ा हिस्सा बीत जाने पर भी ...आज सोचती हूँ .... क्या जीवन हमें वो सब कुछ दे देता है जो हम चाहते हैं ....हम लाख खुशी ही खुशी बिखेरना चाहें ....सिर्फ एक पल में जीवन क्यों बदल जाता है ...????
निश्छल निष्कपट निर्द्वन्द्व निर्भीक जीवन जीना कठिन क्यों है ....?????

यकायक वो मुस्कान कहाँ खो जाती है ...????? मन में रह जाता है कुछ .....अनकहा ....अनगढ़ा ...एक पत्थर सा ...जो बिन तराशा ही रह गया ....हृदय  के भीतर .....इक बोझ सा .....बेचैन करता है कई बार ....!!बस यही सोचता रह जता है मन ....अब और कैसे तराशूँ ...??


हजारों ख्वाइशें ऎसी ......रह ही जातीँ  हैं न .........
पिछले चौबीस घंटों से लगातार बारिश ....
क्षमायाचना के साथ .......आज कुछ निराशावादी भाव हैं ....और आज बूँदें कुछ और ही कह रही हैं ....

                                                  **************

कभी कभी वेदना...
 अश्रु सी  यूं...
बह नहीं पाती  ....
रह जाती  ...
बस जाती ..
तह में हृदय  के  ....
पीड़ा मन की...
छलक ना यूं पाती  ...!!

आज जब ..सुप्त सुसुप्त  हृदय के ...
खोलें हैं  द्वार ....!!
अब ....देखती हूँ ...
झमाझम पड़ती बारिश...
................मूसलाधार ...!!
हृद  भीतर भी ,...
हिय बाहर  भी .....
बरबस अंसुअन से भीगता है .....
और भीगता ही जाता है ...
मेरी भावनाओं का ................
........................वो ..सैलाब ....!!
...................वो लाल गुलाब ...!!
अभिव्यक्ति तक नहीं  पहुंचा  पाई जिसे ...!!
मूक ही रह गई कृति मेरी ...
धूमिल हुई आकृति मेरी ...

बीत गया जीवन ...
रीत  ही गया  मन ...
अकथनीय रहा सृजन ....
झर-झर   बरसते रहे  नयन .. .... .........?
उन्माद में भीगी इस रुत में ..
मोद मनाते इस जग से ...
हिय की पीर कहूं भी तो कैसे ...?


वो शब्द कुछ फिर भी रह ही गए .......
अनकहे अनसुने ..
अनगढ़े अनपढ़े  से ....
टूट के बिखर जाएंगी पंखुडियां  ......
सुबह होने तक ............
अब  कोई भी सूरज....
खिला नहीं पायेगा......
उसकी कोमल मुस्कान फिर दुबारा ......!!

46 comments:

  1. वो शब्द कुछ फिर भी रह ही गए .......
    अनकहे अनसुने ..
    अनगढ़े अनपढ़े से ....
    टूट के बिखर जाएंगी पंखुडियां ......
    angadhe anpadhe se sabdh...
    sab kuchh kah jate hain..
    bahut hi behtareen.. rachna..!!

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  2. वो शब्द कुछ फिर भी रह ही गए .......
    अनकहे अनसुने ..
    अनगढ़े अनपढ़े से ....
    टूट के बिखर जाएंगी पंखुडियां ......
    सुबह होने तक ............
    अब कोई भी सूरज....
    खिला नहीं पायेगा......
    उसकी कोमल मुस्कान फिर दुबारा ......!!
    निश्छल निष्कपट निर्द्वन्द्व निर्भीक जीवन जीना कठिन क्यों है ....?????
    ये सवाल इन क्षणों में बरबस ही आता है पर ... मन शीघ्र ही इन पर विजय पाये शब्‍दों के साथ जीवन में फिर नित नया उल्‍लास आये ... अनंत शुभकामनाओं के साथ ...

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  3. कभी - कभी अनकहे शब्द भी कर जाते है सृजन .... सुन्दर रचना

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  4. हजारों ख्वाइशें ऎसी ......रह ही जातीँ हैं न ......
    कुछ अनकहा ....अनगढ़ा सा
    ............................
    जीवन इन्ही वेदनाओं के बीच छिपा है...
    हम तो इस बारिश में सराबोर हो गए..

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  5. बहुत सुन्दर अनुपमा जी....
    आपकी लेखनी का ये रंग भी भाया....
    सुन्दर रचना...

    सादर
    अनु

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  6. बहुत सुंदर रचना

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  7. भाव निराशा लिए हुए हैं ..फिर भी सुन्दर लगी रचना.

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  8. आपकी कवित्त मुझे दिल के बहुत करीब महसूस हुआ. जाने क्यू मुझे आंसू की पंक्तिया याद आई . जो घनीभूत पीड़ा थी मस्तक में स्मृति से छाई ,दुर्दिन में आंसू बनकर वो आज बरसाने आई. बहुत सुन्दर ,

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  9. अनकहे अनसुने ..
    अनगढ़े अनपढ़े से ....
    टूट के बिखर जाएंगी पंखुडियां ......
    सुबह होने तक ............
    अब कोई भी सूरज....
    खिला नहीं पायेगा......
    उसकी कोमल मुस्कान फिर दुबारा .....

    आशा और निराशा के भाव लिये उत्कृष्ट रचना,,,,,

    RECENT POST -मेरे सपनो का भारत

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  10. jivan ki kuch vedna andar hi rah jati hai anupma ji ........bahur sundar rachna

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  11. मृत्यु तक स्वयं को गढ़ते रहना चाहिये, कहीं ईश्वर को कुछ खटक न जाये।

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  12. .वो ..सैलाब ....!!
    ...................वो लाल गुलाब ...!!
    अभिव्यक्ति तक नहीं पहुंचा नहीं पाई जिसे ...!!
    मूक ही रह गई कृति मेरी ...
    धूमिल हुई आकृति मेरी ...

    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

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  13. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 13-09 -2012 को यहाँ भी है

    .... आज की नयी पुरानी हलचल में ....शब्द रह ज्ञे अनकहे .

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  14. हमारी ख्वाहिशें तो इतनी होती हैं अनुपमा जी कि कुछ तो अनगढ रह ही जाती है । वो कहा है न गालिब जी ने
    बहुत निकले मेरे अरमान
    मगर फिर भी कम निकले ।
    भावपूर्ण रचना ।

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  15. अंतर की हर भावना कला में ढल नहीं पाती ,बिन बरसी बदली सी बार-बार घिर आती है !

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    1. कविता का मर्म पहचान लिया आपने ....बहुत आभार ...!!

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  16. pichle dino jab bangalore jaa raha tha, do din ka safar aur do din baarish hote rahi, man koi khaas achha nahi tha...bahut kuch soch raha tha, mobile se aapki ye kavita padhi....kya mahsus kiya us waqt kya kahun!!

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    1. क्या कहूं अभि ...अभिभूत हुई ...!!:)))

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  17. पीर की बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति पर अनुपमा जी , चाह है तो वो फूल भी अवश्य खिलेगा .

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    1. आपकी दुआ साथ रहे ज़रूर खिलेगा ...कभी कभी उदास भी तो होता ही है मन ...!!

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  18. सुंदर !!

    शब्द कुछ फिर भी रह ही गए .......
    अनकहे अनसुने ..
    अनगढ़े अनपढ़े से ....

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  19. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति अनुपमा जी ...

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  20. anupma ji lekhak ke pas to aisa brahmaastr (lekhni) hai jiske prayog se vo apne to kya sansaar ke aasmaan par faile nirashaon k baadlo ko bhi hata sakta hai. kuchh bhi likh kar apne santap ko abhivyakti de kar is dukh ko har sakti hain.

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    1. बहुत आभार अनामिका जी ....!!आपकी सलाह सर आँखों पर ...!!आप मेरी सबसे पुरानी पाठक हैं ....!!आपको नाराज़ नहीं करूंगी ...!!आपसे वादा रहा अब निराशा के भावों पर नहीं लिखूंगी ...!!आपका आदेश प्रभु का आदेश जैसा है मेरे लिए ...!!अच्छा लगा आपने मुझे निराशा से ऊपर खींच लिया ..!!आपका हक बनाता है ...!!यही प्रेम हमेशा बनाये रखियेगा ...!!
      बहुत आभार ...!!

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  21. मूर्तिकार,रचनाकार,कलाकार,सृष्टिकर्ता,भाग्यविधाता,...कहीं न कहीं है बाध्य,रह जाती है सूक्ष्म कमी और वहीँ से आरम्भ होता है शब्दों के यज्ञ में भी एक मौन

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  22. आशा और न्राषा के बीच झूलते भाव ...
    गहरी अभिव्यक्ति ...

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  23. बहुत कुछ रह जाता है अनकहा , अनगढ़ा और ये एहसास मन को भिगो जाता है .... बहुत खूबसूरती से इन भावों को गढ़ा है ...

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  24. बहुत उम्दा प्रस्तुति.

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  25. भाषा सरल,सहज यह कविता,
    भावाव्यक्ति है अति सुन्दर।
    यह सच है सबके यौवन में,
    ऐसी कविता सबके अन्दर।

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  26. bhasha,bhav aur samvedva ki gahantao se paripurit kvita,

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  27. मर्मस्पर्शी..... संवेदनशील भाव

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  28. बहुत सुंदर भाव -बहुत ही सुंदर कविता

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  29. माई री !मैं कासे कहूं पीर अपने जिया की ...अंडर टोंन का अपना आकर्षण होता है अनकहे का आवेग और फिर सब कुछ कहा भी कहाँ जाता है जब पीड़ा होती है सान्द्र ,मन सुन्न टों हो जाता है ,भाव रीत जाता है ,सावन बीत जाता है आलोड़ित करती है आपके रचना मन को .अवसाद के क्षण भी तो होतें ही हैं .कुछ भी नहीं रहता है जब अवसाद क्या कर लेगा -सुसुप्त शब्द ही है वह (सुशुप्त अशुद्ध है कृपया सुधार कर लें ....
    आज जब ..सुप्त सुशुप्त हृदय के ... ).बढ़िया आवेग है मनोभावों का रचना में .

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    1. बहुत आभार आपका ...!!
      इसी प्रकार अपना स्नेह एवं आशीर्वाद बनाये रखें ...!!!

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  30. http://vyakhyaa.blogspot.in/2012/09/blog-post_14.html

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    Replies
    1. आभार दी कितनी सुन्दर व्याख्या कर रचना को शामिल किया है ...!!ईश्वर का प्रसाद मिल गया ...!!!

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  31. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ...हिंदी दिवस की बहुत बहुत शुभकामनायें ...

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  32. अगर निराश मन से इतने खूबसूरत शब्द निकलते हैं तो ....बहुत खूब

    बेहद खूबसूरत रचना

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  33. सच पूछिए तो कुछ भावनाएं जो अभिव्यक्त हुए बिना रह जाती हैं.. लगता हैं वे उपेक्षित हैं.. लेकिन वही सच्ची भावनाएं हैं... कहते हैं ना कि जब कह दिया तो क्या किया...
    स्व. भूपेन हजारिका का गीत याद आ गया
    दिल हूम हूम करे घबराए
    घन धम धम करे गरजाए
    एक बूंद कभी पानी की
    मोरी अंखियो से बरसाए... (गुलज़ार)

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  34. jo abhivyakt na ho paai un bhavnao ko abhivyakt karti kavitaa -bahut sunder anupama

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नमस्कार ...!!पढ़कर अपने विचार ज़रूर दें .....!!