नमस्कार ....!!आपका स्वागत है ....!!

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31 May, 2012

मैं बूँद ... कहाँ जाऊं ...?

जब तक सांस चलती है तभी तक जीवन है ....!!हम चाहें तो सार्थक  कर्म कर उसे सवाँर  लें और प्रभु के चित्त में स्थान पा लें  या ....पछताते रहें .....समय तो निकल ही जायेगा ...रुकेगा तो नहीं ............

                                 
आँख से  
छूट कर ...
पात सी टूट कर ....
गिर क्यूँ गई ....?
मैं बूँद ...कहाँ जाऊं ...?
चैन न पाऊँ ...अकुलाऊँ .!!
प्रभु चित्त ही मेरो देस ..
अब   पछताऊँ .....

नयन नीर ..धर धीर ..
पी लिए होते ...!
मन का -
मध्यम  तीवर स्वर(तीव्र म) ..
बाँध लिया होता ....
स्वर कोमल रे मन रिषभ (रे)-
साध लिया होता ....
तब गाती गुण ...
प्रभु सुन-सुन ....
हर्षाते ...चित्त  लगाते .....!!
अब आँख से 
छूट कर ...
पात सी टूट कर ....
 झर गयी ...!
मैं बूँद ...कहाँ जाऊं ...?


*रिशभ -रे स्वर का संगीत शास्त्र में नाम है ..!
*तीव्र सुर मध्यम ..अर्थात तीव्र म और रे कोमल यानि ''मारवा '' राग गा रही थी .....सब कुछ व्यवस्थित ...जगह पर ...फिर कैसी बेचैनी ...?
.........राग मारवा बेचैनी ही देता है ....!!कभी सुन के देखें ....!!

27 May, 2012

कलापि...

बिना स्वरों के ...
जनम जनम से ...
रिक्त सी थी ..
प्यासी काया ..,
तपते  सूर्य की ज्वाला में ..
जन्मों से तन जलाया ...!!

पूरिया कल्याण ...
हुई अर्हणा  ...
आज तो ....
बरसे प्रभु कल्याण ...!!
दे रहे ..ज्ञान ..
अमृत वरदान ...!!

अदृश्य   झरता है ....
श्रुति का दान ...
स्वरों  का ..गान  ......!!
रिस-रिस भरता  मन प्राण ...!!


सप्त  स्वरों  की  मायावी ...
माया नगरी में अहर्निश ......
विस्मृत सी ऐसी खो गयी ....
जैसे चाँद की चकोर हो गयी ....

मोरनी बनी उस  मोर की ...
स्वरों की सरगम सा ....
सातों रंगों में डूबा ...
मेरा  चितचोर ...
निहारूं नयनाभिराम कलापि ...
झूम झूम जब नाच रहा मोर ....!!
*************************************************************************************
*श्रुति- स्वरों का सुरीलपन |स्वर का वो नाद जिस पर वो सबसे सुरीला होता है |
* पूरिया कल्याण-राग का नाम है .
* अर्हणा-सम्मान
*अहर्निश -रात और दिन .
मोर के फैले हुए पंख कलापि  कहलाते हैं ...!
बड़े गुनी गायकों का कहना है ...कि साधना जब एक अवस्था से आगे बढ़ जाती है तो राग के स्वर दिखने लगते हैं ....हमें वो राग अपना रास्ता खुद बताती है ....यही तो  परमानन्द की स्थिति होती है .....यही शास्त्रीय संगीत का आनंद है ...!!
ऐसे ही कुछ भावों को लिए है ये रचना ....!!

23 May, 2012

चल मन ....लौट चलें अपने गाँव .....!!

जेठ कि तपती है..
 जब दुपहरी ....
कहीं झिर झिर..
 कुछ झरता है ..
बिन बदरा भी बरसता है .....
पारदर्शी कर्मरत  मन ,
लिए झीने आवरण ,
दिनचर्या ..शुश्रुशण...!!

युगों युगों से अनवरत ...
पौराणिक,प्राचीन ...
या समकालीन ...
हर युग में ..
यही तेरा अस्तित्व ....
जिससे निखरता जाता -
तेरा व्यक्तित्व ...
ममता की -
वटवृक्ष सी छाया  देता  ...
साक्षात् रूप तेरा ..
मानवता के -
शाश्वत प्रश्नों का-
करता  साक्षात्कार ...
अलंकृत ...सुसज्जित ...
क्षमाशील वात्सल्य तेरा ...
प्रतिकूलता को अनुकूलता  में ..
परिवर्तित करने की
शक्ति देता है ...
स्वजनों  से घिरी ....
सुघड़ वत्सला ......क्या सोचे ...?

माथे पर जीवन  की -
दिव्य आशाओं का...
दमकता ..चमकता ....
लाल सिंदूरी सूरज ...
ह्रदय से उठती ....
आँखों में रूकती ...
कुछ अनकही सी व्यथा ...
तेरे रूप का-
निरूपण कर रही हैं ...!!
कह भी दे री-
मन कि कथा ...
अब क्या है-
तेरी मनोव्यथा ....?
..आज  मुड़कर  क्यूँ  देखे  ...
क्या  कहता है -
ठहरा ठहरा ...सा
शांत सा मन .....?

भीगी सी पलकें ....
बिखरी सी अलकें ...
समेटती ...
धीमे से मुस्काती ...
मन टटोलती ...कहती है ...............

''कुछ यादें मन पर यूँ छाई हुई है ...
आज  मन बहलाने आई हुई हैं ...
जैसे कह रही हों ...कुछ पल को ...
 ...चल मन लौट चलें अपने गाँव ....
अकेली है ...उदास सी ...पीपल की ठंडी छाँव ....
कुछ पल को ...
चल मन .....लौट चलें अपने गाँव .....!!''
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बड़े चाव से नारी अपना घर बसाती है ....!कुछ पल को सब कुछ भूल जाती है ..!उन्हीं में रची-बसी रहती है ...!जब धीरे धीरे जिम्मेदारियां बढ़ने लगतीं हैं ....,एक दिन के चौबीस घंटे भी कम पड़ते हैं अपने कर्तव्य और अभिलाषाओं के बीच झूलते ....!मन  उलझने लगता है ...,जेठ का सूरज सर पर चमकने लगता है .....,उस वक्त कौन सी ऐसी स्त्री है जिसे अपने मायके  की ,वो पीपल की ठंडी छाँव याद नहीं आती .....?हमारे पूर्वजों ने हमारे समाज कि रचना कितनी खूबसूरती से ....गहन विचार कर की थी !समय-समय पर स्त्री का मायके जाना ज़रूरी होता था |समाज से डर कर भी हम ,कुछ मान्यताओं का पालन करते थे जो कि हमारे ही भले के लिए हुआ करती थीं |अब हम अज़ाद हैं पर अपने  ही बंधनो से घिरे हुए ........................................... ...?
अब ज्यादा याद आती है .....पीपल की  ठंडी छाँव ....कुछ  पल को ....चल मन ...
लौट चलें अपने गाँव ....!!!!


***

18 May, 2012

अरूप सर्वव्यापी तुम्हारा रूप ... !!

 अरूप ... सर्वव्यापी  तुम्हारा रूप..
 अनेक रंग रंगे -
पाखी पंख  में  भरे ......!!


विविध  रंग रंगी  जल मीन ....
Regal angel fish.
है मन आसीन ....!!
rainbow parrot fish .
दिव्य अनेक रूप में तुम ...
सृजनकर्ता ...!!
Spectacled parrot fish.
नयन में बैठते ...
ह्रदय में पैठते ...
मन में भर भर देते कृतज्ञता...!!
स्मित चितवन लीला निहारूं ....
अमृत वर्षा ..भीग-भीग  जाऊं ...
सिक्त होती जाऊं ...
गुणन के गुण रुच रुच गाऊँ ...
रग-रग ..रंग रंग जाऊं ..
रूप सवारूँ ...
दीजो अलख ज्ञान ...
छोड़ अभिमान ...!!
संवर जाऊं ...
श्रुति प्रज्ञ करूँ ...
गहन अर्थ गहूं ....!!
लीन तुम में हो जाऊं ...!!
प्रभु तुम में खो जाऊं ...!!

*Regal angel fish ---Pygoplites  diacanthus.
*Rainbow parrotfish ----Scaus gaucamaia.

15 May, 2012

चली.... मैं अब अपने देस चली .......!!

मैया   प्रथमेश पूजे ....
सखियाँ गायें  मंगल गान ....
पुलकित मन छेड़े सुख तान ...!!
धन-धन भाग जागे ......
सजन संग ऎसी लगन लागे  ........
छूटी बाबुल की गली ......
सखियाँ ...सब छोड़  चलीं .......
मैं पियु की पियु मेरे .......
झूमे रे मन सांझ-सवेरे ...!!

मनभावन की रस-बतियाँ ...
मैं डूबी री दिन-रतियाँ ...
लाज  की ओढ़े चुनरिया ...
हवा से  सुरभि लिए  ..
महकूँ मन भीतर ..बह चली ..
जग से ही नाता तोड़ चली ...!!

कर सोलह सिंगार ....
खिला -खिला  लागे संसार ..
नैन भरे प्रेम नीर ....
ह्रदय कोई देखे चीर ....
बिदाई देता मेरा वीर ...

मन में संस्कार ...
प्रभु  से मनुहार .......
सर पर हाथ प्रभु का .....
काँधे पर हाथ पिया का .....
हाथ भर अंजुरी ...
चावल,हल्दी,सुपारी,छुहारा,मखाने ,रूपया,चवन्नी .....
ममता भरी ओली ...
आली ..अब तो ...चली ....
मैं  अपने देस चली .......!!

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छोटी बहन के विवाह उपरान्त मन में उपजे भाव ...............!!
लिखे बिना मन  न हीं माना  ........!!
कैसी विचित्र बात है ...यही भाव प्रभु से भी मन जोड़ते हैं ....!!

13 May, 2012

ये जीवन की अनगिन कहानी गहूँ मैं ...!!

13thMay ..माँ आसपास ही हैं आज ....!
१३ मई....:)  खुश होने की बहुत सारी  वजह हैं आज .......!
*मदर्स डे
*गुरु जी ,श्री श्री जी ,का जन्मदिन
*एक और है जो आप पोस्ट पढ़ कर अंदाज़ा लगा लेंगे ....!


........आज सोच रही हूँ ,समय किस रफ़्तार से भागता है ..?
जितना गुजार गया अब उतना तो बाकी नहीं है |जो भी जीवन दिया माँ  ,तुमने  ......भरपूर जिया है अभी तक ....!विभिन्न घट जीवन के ,सुख के ...दुःख के ...हँसी के ..आंसू के ......भर रही हूँ  ...धीरे धीरे ...!
बस ....कृतज्ञ हूँ ...!!
सच कहूँ तो ....मन तो बच्चा ही है अभी  भी ...!अभी  तो बहुत कुछ करना है .....अभी तो बहुत दूर जाना है ............जीना है जीवन भरपूर ...स्वयं और स्वजनों के लिए भी ..........अगला जन्म लेने से पहले .....अलंकृत करना है ...... नेह से स्वयं को और स्वजनों को भी ......तुम्हारी तरह बनना है माँ ...!!इसलिए प्रभु से हर पल प्रार्थना करती हूँ ...उजला कर देना , प्रभु मन ....यही कामना है ...!ताकि तुम्हारे पास आऊँ तो तुम्हें शिकायत का मौका न मिले ....!!


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                                       ये जीवन की अनगिन कहानी गहूँ मैं ...!!

स्वर की कल्पनातीत  उड़ान .....
एक आशातीत  मुस्कान ...
यही है   जीवन  ..!

 इक पल , इक बूँद सी बन ...
देती स्पंदन .....!
या सूरज की स्नेहिल  किरण ....
 बनी नारंगी रंग ...
रंगे   जीवन ....
रंगे   तन-मन ....!!

कभी मन जो डोले ..
हवा सी उडूँ मैं ......!!

कभी मन जो उमड़े ...
घटा सी घिरूँ मैं ...
बरसती झमाझम ..
कभी मन जो बोले ...!!
ये भेद जिया के ...
यूँ हंस-हंस के खोले ...!!


मरू में बनाऊं..
मैं अपना ठिकाना ...
तरू में समाऊँ ...
मैं दूं आशियाना ...
है आकाश मेरा ..
मैं उन्मुक्त पाखी ...!!
उडूँ यूँ मैं देखूं ..
धरा की ये झांकी ....

ये जीवन बसा है ,
समाया है मुझमे ...
बहूँ बन के नदिया..
 रवानी बनू मैं ...
ये जीवन की अनगिन
कहानी गहूँ मैं ...!


08 May, 2012

अनंत...अंतहीन यात्रा मेरी ........!!

गुलमोहर की छाँव

दूर ..सुदूर पहाड़ी पर ...
मेरा मन मंदिर ...
दिखता है तुम्हारा 
आलीशान  मंदिर .....
चढ़ रही हूँ ....
लीन तुम में ...
एकाग्रचित्त ....!!
सुरों की माला जपती ...
कितने सुंदर रस्ते से -
गुज़र रही हूँ मैं .......!!
राह पर भरे   हुए ..
झरे हुए  गुलमोहर....!!
बन बन भरे हुए लाल-लाल  ...
जलते हुए ..पलाश ...!!


अमलतास के झूले ....मन झूम-झूम झूले ...
झूलते पीले-पीले अमलतास  ........
चमेली की महक से ..
भरता जाता मन ..!!
गुनगुनाता ...
खुशबू  लुटाता ..
सुरों का सम्मोहन ......!!
पराग के अनुराग  से 
लदा -लदा  हरसिंगार ...
हरसिंगार .....प्रभु चरणों में ...
भर-भर  अंजुरी उड़ाती  चलूँ ...
मन  बसंत   बहार ....!!
प्रभु ...तुम हो साथ मेरे ...
और चल रही है ...
अनंत...अंतहीन यात्रा मेरी ....!!




अथक परिश्रम ....
टप टप गिरतीं हैं पसीने की बूँदें ....
कैसा आश्चर्य है ...
जितना चलती हूँ .......
हलकी होती जाती हूँ ...
ऊर्जा बढ़ती जाती है ...
जिजीविषा मुस्काती जाती है ...
उड़ने सी लगती हूँ ....
झूमने सी लगती हूँ ...
खिलता जाता है ...कोमल ..
मन का नील  कमल ...!!
खिलता सरोज .....माँ  जैसा ...!!
प्रभु ...तुम हो साथ मेरे ...
और चल रही है ...
अनंत..अंतहीन यात्रा मेरी ....!!


इस अनुनेह में ....
अनुपम  अनुभूति है ....
शंख नाद सी ...
अनुगूंज उस अनुनाद की ..
सतत ही  वो नाद सुनना ....!
मेरा मन  भी गूंजता है ...
तानपुरे की उसी नाद से ....!
नित-नित मेरा ह्रदय झंकृत करता हुआ ...!!
सुर अलंकृत करता हुआ ....!!
प्रभु ...तुम हो साथ मेरे और ...
चल रही है ...
अनंत...अंतहीन यात्रा मेरी .....!!


जीवन  की इस धूप-छाँव में ...
जीवन में धूप भी..छाँव भी ....
अनेक रूप में ,
मंदिर की घंटी,
चर्च की चाइम या,
मस्जिद  की अजान हो-
आँख बंद करके जब सुनती हूँ,
सुरों में छुपे सेदिखतेहो..
प्रभु हर पल मेरे साथ ,ब्रह्म स्वरुप -नाद में,
अनेकों रागों के प्रारूप में,
स्तब्ध हूँ ...चाहे चंद्रकौंस हो  ...या गोरख कल्याण,तृप्त कर देते हो मुझे ....
प्रभु ...तुम हो साथ मेरे और ...चल रही है ..अनंत...अंतहीन यात्रा मेरी .....!!




*चंन्द्रकौंस और गोरख कल्याण -रागों के नाम हैं ....

03 May, 2012

मुस्कुराती छवि तुम्हारी ...!!


तुम्हें अप्रतिहत  निर्निमेष निहार ....
भर- भर लिए  नयन ...
फिर मूँद कर पलक ...
जब-जब भी तुम्हें परखा ,देखा .........!!
दिखी ,मनः पटल पर .....
एक सुस्मित ..अमिट सी.....
बस मुस्काती सी रेखा ..........!!



तुम आये थे याद ...
यकायक जिस पल ...
कुछ पल को उद्वेलित ...
बुझ सा गया था मन .................!!
है दिव्य सी स्वानुभूति ....
अब मुस्काती छवि तुम्हारी ...
भर गया मेरे जीवन का सूनापन ...!!

बह गई काजल के संग .....
श्यामल मन की...
घन-घोर ,कारी-अंधियारी ....!!
कर  गयी उजियारी ....
मेरे क्लांत से मन को  ....
मुस्कुराती छवि तुम्हारी ...!!


प्रतिक्षण प्रतिपन्न ...
तुम्हारी संविद श्रेयमयी आभा....
जो मुझे भी प्रभासित कर देती है ...!!
वो  उज्जवल आकृति तुम्हारी ...
मरुभूमि मेरे मन की ...
किसलय सी कर देती  है ....!!
और ...अन्तः प्रज्ञा  उन्मीलित कर देती  है ....!!


*अप्रतिहत-बिना रोक टोक
*निर्निमेष -अपलक ,या बिना पलक झपके
*प्रतिपन्न-अवगत,जाना हुआ
*संविद-चेतनायुक्त
*श्रेयमयी -मंगलदायक.
*सुस्मित-मधुर मुस्कान
*उन्मीलित-विकसित 

01 May, 2012

रेंगती सी मानवता ...!

 सदा तेज ताप का प्रताप ...
आग  बरसाती ग्रीष्म ....
   टप-टप टपकता पसीना ....
इसके अलावा जानती ही नहीं क्या है जीना ...!!

इस जहाँ में कब आई ...पता नहीं ...
क्या है ध्येय वो नहीं जानती ,
कहाँ जाना है ...पता नहीं ...
पति का नाम ...?
हंसकर ...शरमाकर ...कहती है ...
ले नहीं सकती ...
न अक्षर ज्ञान .....
न  कुछ भान  ...
क्या कोई मान ...?
फिर भी इंसान की ही  संतान ....
कईयां(गोदी ) पर टाँगे ..
अपनी अनमोल पूंजी  ...
कृष्ण हों, बुद्ध हों ...गाँधी हों ...
मेरे लिए किसी ने क्या किया ...?
मैं हूँ भारत कि माटी  पर....
चीथड़े लपेटे ....
 रेंगती सी मानवता ...!

आज एक मई है .....मजदूर दिवस ......पिछले दिनों एक महिला मजदूर से बस दो शब्द बात  की .....मन व्यथित हो गया .......!!!बस एक बात समझ में आई .........ईश्वर का दिया हुआ बहुत कुछ है हमारे पास ....बस हम कृतज्ञ हों और कुछ सकारात्मक कर सकें ऐसे लोगों के लिए .....तभी जीवन सार्थक होगा .....!!