नमस्कार ....!!आपका स्वागत है ....!!

नमस्कार ....!!आपका स्वागत है ....!!
नमस्कार ....!!आपका स्वागत है ....!!

10 October, 2012

कविता सी गुन गुन गाये ......!!

मंगल दिन .....
उज्ज्वल मन कहे ....
अनुभास सो प्रकाश छायो.......

मन रमायो.......
अनुराग है  छायो......
ले  हरी नाम ......
मन मनन गुनन की बेला ....

काहे निकला अकेला ....?




हरी मूरत जिस मन मे ...
मन कहाँ अकेला ......??
मन पंछी बन गाये ......
मन सरिता बन बह जाये .....
मन फूल बने  खिल जाये ............
मन सूरज सा ...मन रश्मि सा ....मन तारों  सा ....मन चन्दा सा .....
झर झर झरते उस अमृत सा ....!!!!!

मन मे तरंग  जब  जागे .......
कुछ स्पंदन जो  दे जाये .....
मन झूम झूम रम जाये ....
उर सरोज सा दिखलाए ......!!
कविता सी गुन गुन  गाये ......!!
कविता सी गुन गुन गाये .....!!

06 October, 2012

श्यामल यवनिका उठ चली ..

श्यामल यवनिका उठ चली ..




 


 प्राची पट खोल रही  ...

श्यामल यवनिका उठ चली ..
 जागी उषा की स्वर्णिम लाली ...
नभ नवल नील मस्तक सजाती ....  ....
 मुस्काती .. आशा की लाली ...!!
छलकाती नवरस की प्याली .....!!



कुछ अनहद नाद सी श्रुति ....
अमर भावना सी लगी ...
अद्भुत भोर हुई ...!!




मंगलाचरण  गाते विहग ....
दूर क्षितिज पर  ....
रेखा सी कतार कहीं ...
कहीं भरते छोटी सी उड़ान ...!!
सभी का  स्मित विहान.......!!
नील नवल वितान ...
खिल रहा आसमान ....!!
छा जाती मन पर......वो आकृति ...
जो देती नहीं दिखाई ....पर देती है सुनाई ...




ॐ सा ओंकार सुनाते ....

मंगलाचरण गाते विहगों की ....
अनहद नाद सी मन दस्तक देने आई ....
आई ...मन भाई ......
नभ मुख मण्डल..
अरुणिमा  छाई ...
 ....अब ले अंगड़ाई ...
पुनि भोर भई  ....!!  ...
अद्भुत भोर भई ....



02 October, 2012

टिमटिमाता हुआ ... एक दिया ..

जीवन की काल कोठरी में  ....
मन की काल कोठारी में ....
कुछ प्रकाश तो था ...
क्षीण   होती आशाओं में ....
फिर भी विकीर्ण होता हुआ ..
कुछ उजास तो था ...!!

उठता है सतत ...
जो धुंआ इस लौ से ..
स्वयं की भीती से-
स्वयं ही लड़ता....
प्रज्ज्वल ..कांतिमय ..
भय से निर्भीक होता हुआ..
भोर के विश्वास का प्रभास देता हुआ .....
शंका का विनाश करता हुआ ..
सत्य की टिमटिमाती सी लौ ....
प्रकाश पुंज अविनाशी ....!!

उच्छ्वास  को उल्लास में बदलता हुआ ...

नित नवल नूतन विभास
 प्रस्फुटित करता  हुआ ..
टिमटिमाता था ..
स्वयं जलकर भी ...
प्रकाश ही देता था ..
छोटी सी लौ ...आरत ह्रदय .. .....
जलता हुआ ..टिमटिमाता हुआ ...एक दिया ..




एक विश्वास है मन में .......आस्था है ....बापू ....इस  नव भारत में ,इस भारती में  .....कुछ सत्य  अभी बाकी है ..........!!!!!!!!!और उसी पर अडिग अविचल अपनी सभ्यता संस्कृति से जुड़े रहकर ही हम कर रहे हैं नव भारत का निर्माण ....!!!!!!!
जय हिन्द ।




आइये बापू को ,शास्त्री जी को श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए ये गीत सुनते हैं .......................................