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09 April, 2015

मौन कविता

शब्द बिखरे
निवेदित है आस 
मौन कविता 

दिए की बाती 
तिल तिल जलती 
बुझती जाती


टीस जिया की 
जब कह न सकूँ 
आकुल मन 


द्वार तुम्हारे 
उदास खड़ी  रही 
हंस न सकी 


धूल में लिपटी 
अपने में सिमटी 
ज्यों एक बूँद 

मुस्कान मिटी 
क्यों  मन घबराया 
कोई न आया 

खेल तमाशा 
बन गई आशा 
रैन गंवाई 


5 comments:

  1. हार्दिक मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल शुक्रवार (10-04-2015) को "अरमान एक हँसी सौ अफ़साने" {चर्चा - 1943} पर भी होगी!
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. जीवन ऐसी ही विविध रंगों से मिलकर बना है...विरह और प्रेम के तानों-बानों से बुना..

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  3. सुन्दर रचना

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  4. हर एक हाइकू सुन्दर...बहुत सुन्दर!

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