उद्भव से अग्रसर होते हुए
शैवालिनी के प्रवाह का और
बहते हुए मन के भावों का
अद्भुत तालमेल है...
दोनों में तिरते हुए
समन्वित अनुरक्त प्रकृति का
चेतनामय खेल है...
शब्द की चेतना में उर्जित
भाव बहते हैं प्रबल
ऊर्जा से आसक्त होते
लहराते हैं प्रतिपल...
वायु का संवेग निर्धारित करता है दिशा दिशा
बढ़ती जाती तरंगिणी
झूमती लहराती
निखरती जाती
सागर से मिलने की
उसकी ह्रदयाशा !!!
अनुपमा त्रिपाठी
'सुकृति '
कल-कल करती तरंगिणी की भाँति
ReplyDeleteभाव नदी भी बहती जाती,
एक समाती सागर में एक अनंत में खो जाती
सुंदर रचना !
सादर धन्यवाद!!🙏
Deleteशब्द की चेतना में उर्जित
ReplyDeleteभाव बहते हैं प्रबल
ऊर्जा से आसक्त होते
लहराते हैं प्रतिपल...
गहन चिंतन ....
आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में शनिवार 18 जनवरी 2025 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
जी ज़रूर सादर धन्यवाद मेरी कविता चयनित करने हेतु!!🙏
Deleteआपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में शनिवार 18 जनवरी 2025 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
ReplyDeleteसुन्दर
ReplyDeleteसादर धन्यवाद 🙏
Deleteसुंदर सृजन!
ReplyDeleteसादर धन्यवाद 🙏
Deleteबहुत सुन्दर
ReplyDeleteसादर धन्यवाद 🙏
Deleteवायु का संवेग निर्धारित करता है दिशा दिशा
ReplyDeleteबढ़ती जाती तरंगिणी
झूमती लहराती
निखरती जाती
सागर से मिलने की
उसकी ह्रदयाशा !!!
बहुत सुन्दर
https://vivj2000.blogspot.com/
वाह! पढ़कर सच में मन प्रसन्न हो गया! आपने प्रकृति और मन के भावों को जिस तरीके से मिलाया है, वह बहुत खूबसूरत है। शैवालिनी, लहरें, हवा और मन, सभी का तालमेल पढ़ते समय ऐसा महसूस होता है जैसे हम भी उस प्रवाह में बह रहे हों।
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