नमष्कार !!आपका स्वागत है ....!!!

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15 June, 2010

सुकृती----पहचान मेरी -8

देखती थी आइना फिर सोचती थी
कौन हूँ मैं ..?क्या करूँ मैं ....?
कुछ करूँ मैं...... कुछ बनूँ मैं .....!!
कुछ बने पहचान मेरी ......!

खिली -खिली मन की बगिया -
तितली बन जाऊं .....?
अद्भुत सुंदर जीवन ....!!!!
फिर भी चैन न पाऊँ ।

सांझ ढले मंदिर का दीपक
रोज़ जलाऊँ ...
प्रभु चरणों में शीश नवाऊँ -
चैन न पाऊँ...

कर्म रथ पर--
जीवन पथ पर --
कर्म निरंतर करते करते -
धन ये पाया --
देखा मैंने --- आकृती है साथ मेरे --
मेरी छाया.......!!
डोर थी एक मन में मेरे -
जोश था वो साथ देता ...
खींच लाइ मन को मेरे-
बन गयी फिर एक काया ...!!

आकृती से स्वकृति ---
फिर सुकृती ...
बन गयी पहचान मेरी ...!!!
देखती हूँ आइना अब सोचती हूँ ---
सुकृती ---पहचान मेरी !!!!!!!
सुकृती- पहचान मेरी !!!!!!!!!!!

14 June, 2010

सरोज ....खिले कमल सी ..---मेरी माँ -7




तुम को खो दिया तो जाना-
मिट गयी जो -देह थी वो --
छब अभी हैमन में मेरे --
आत्मा है -माँ तुम्हारी --
साथ मेरे


नित नई क्रीडा कराती ---
लिख सकूं जो जी में आये---
गा सकूं जो गीत अब मैं -
छब तुम्हारी साथ मेरे -
नित नयी क्रीडा कराती ..


एक छोटी सी नादान कली थी मैं .
आप ही ने पुष्प भी मुझको बनाया .
पुष्प बनकर भी अगर गंधहीन थी मैं .
आप ही ने सुरभिमय मुझको बनाया .


आप ही ने मेरे पथ के -
अनगिनत कांटे बटोरे .
ज्ञान से आलोकित ह्रदय कर -
अज्ञानता के साए बटोरे.

आपके इस प्रेम को मैं क्या कहूं ?
शब्द नहीं हैं भाव की अभिव्यक्ति के .
आपकी ममता की मैं हूँ चिर ऋणी --
चलती जाऊं बढ़ती जाऊं---
राह में -मैं आपके .


13 June, 2010

जीवन -ज्योत बनी पहचान -6

जीवन पथ पर--
कितना रोका जग ने मुझको -
रुक न पाई--
मैं अलबेली झूम -झूम के -
नाची गाई ॥!!

जीवन की ऋतू बदल बदल कर
चलती जाती--- --
कभी हवा फिर कभी धूप-
पर मैं मुस्काती !!!!

गाने की इच्छा ज्यों बढ़ती
जीवन की लौ आंचपकडती -
वही दिया था मन का मेरा --
जलता जाता---
जीवन ज्योत जलाती जाती -

चलती जाती धुन में अपनी
गाती जाती बढ़ती जाती -

मंद मंद था हवा का झोंखा
हलकी सी थी तपिश रवि की
वही दिया था मन का मेरा -
जलता जाता--
जीवन ज्योत जलाती जाती -
चलती जाती धुन में अपनी -
गाती जाती बढ़ती जाती -


फिर ऋतू बदली ....
जीवन बदला .......
कड़ी धूप....! मैं खडी धूप में .....!!.
मन मुरझाया .........
शीतल जल की चाह को
मेरा मन अकुलाया ....
बिसर गए वो गीत थे मेरे ...
फीकी सी पड़ती मुस्कान ............
धीमा सा सुर धीमी सी गति -
जीवन - ज्योत बनी पहचान -

एक घनेरी छाया ढूँढू -
बैठ करूँ मैं कुछ विश्राम --
मंदिर की घंटी सुन जागी -
जीवन -ज्योत बनी पहचान
श्रवण श्रुति सुन नींद यूँ भागी ....
आ गए फिर मन में प्राण ...!!!!
लौट आई फिर वो मुस्कान ......
साध लिया अब मन को मैंने -
जीवन ज्योत बनी पहचान -

जीवन क्या है ------
रैन बसेरा .........
फिर वो बदला ....फिर वो बदला ...
साध लिया अब मन को मैंने
जीवन ज्योत बनी पहचान!!!!!!!!

गाती जाऊं फिर मैं गुनगुन -
लौट आई है वो मुस्कान---
जीवन ज्योत बनी पहचान !!!!!!!!!!!!!!!
जीवन ज्योत बनी पहचान !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

12 June, 2010

सपनो से है प्यार मुझे -5

पूछ रही थी -
मैं सपनों से-
रोज़ -रोज़ ये क्यों दिखते हो ?
क्यों आते हो रोज़ -रोज़ ये ....
मुझे रुलाने ???
फिर देखे ये नन्हे नन्हे कोमल-कोमल --
पौधे जैसे छोटे छोटे --
कब से मन में थे जो मेरे ---
कब उपजे थे ...........????
बरसों बीते ----
जब उपजे थे ,तब उपजे थे ---
अब अंकुरित हुए हैं !!!!!
खुश हो सोचा --
जो है सो है ----
है तो मेरे ....!!!
इन्हें सुधारूं इन्हें सवारूँ इन्हें सजाऊँ .......
रोज़ रोज़ फिर सीचूं इनको -
इन्हें ही गाऊँ ---
सपनो को गाने लगी जब ----
गाने लगी गीत सपनो में ---
बुनने लगी ख्यालों को मैं ----
गाने लगी गीत सपनो में ....
गीत से प्रीत
प्रीत से रीत
रीत से प्रीत
प्रीत से फिर गीत
दृढ प्रतिज्ञ --
गाते गाते अब मैं समझी -
सपनों से था प्यार मुझे --
सपनो में मैं चलते -चलते कभी न थकती
गाते -गाते कभी न रूकती
दृढ़ प्रतिज्ञ ---
गाते गाते अब मैं समझी ---
वही प्रीत अब रंग लायी है ---
सपनो से हो प्यार अगर तो ---
निश्चित सपना सच होता है!!!!!
सपनो से हो प्यार अगर तो ---
सपना सच हो जाता है !!!!!!!!!

11 June, 2010

एक मुट्ठी आसमान -4


 भर ली मैंने   इस
 उन्मुक्त गगन में --
 एक छोटी सी उड़ान-
 पा लिया मैंने जैसे --
 एक मुट्ठी आसमान --

सपना सा साकार हुआ --
फिर जीवन से प्यार हुआ-
 बीत चली फिर जीवन की विभावरी -
 नन्हें पंछीके मन जागी उतावली-

नन्हे नन्हे पंख जो आये-
छू लूं उड़ उड़ आसमान
भोर भई अब फिर उड़ चलूँ -
छूलूं उड़ उड़ आसमान -



मन पुलकित तन पुलकित-
पुलक उठी ज्यों वसुंधरा-
जैसे खेतों की हरियाली -
मन भी मेरा हरा -भरा ---



ओस की एक बूँद से-
जैसे प्यास बुझीमेरी -
नन्हें पंछी की उड़ान से -
तृप्त हुई मैं -----

सपना है या सच है ये ---
हाँ -हाँ सच में ---
भर ली मैंने --
इस उन्मुक्त गगन में --
एक छोटी सी उडान --
हाँ हाँ सच में ----
पा लिया मैंने एक मुट्ठी आसमान !!!!!!!!!!!
पा लिया मैंने एक मुट्ठी आसमान!!!!!!!!!

24 May, 2010

मुझे भगवन दिखे

पति की मलेशिया पोस्टिंग होते ही दिल्ली में सब छोड़ मैं एक अच्छीपत्नी की तरह उनके साथ चली तो आई पर एक हफ्ते में ही वो सारा खुमारजैसे जाने सा लगा. अनायास ही घर की याद सताने लगी .कभी बच्चे ,कभी पापा , कभी बगीचा ,कभी मेरा कुत्ता-मेरा प्यारा टिम्मी , कभी मेरी संगीत क्लास्सेस ----अब उदास होने के लिए बहुत कुछ था मेरे पास .एक अजीब सी चिढ मेरे अन्दर घर कर रही थी .होटल में रहते हुए बड़ी बेगानी सी ज़िन्दगी लग रही थी घर की तलाश भी जारी  थी .अभी हम होटल में ही रुके हुए थे .परन्तु इन दस -बारह दिनों में ही मेरा स्वाभाव कुछ चिड़चिड़ा  सा होने लगा था.नये लोग ....नयी जगह ...जिससे मिलूँ वही फॉर्मल सी बातें...एक के बाद एक जैसे वही प्रश्न ......और मेरे चेहरे  पर एक फीकी सी  मुस्कान ....

ईश्वर पर बहुत विश्वास है मुझे .और ईश्वर का आभास मुझे हो जाता है.मुझे लगता है कोई शक्ति है जो मुझे दिशा दिखाती है.उस दिन भी एक अजीब सी खीज से घिरी मैं होटल की लोब्बी में बैठी ड्राईवर का इंतजार कर रही थी .समय जैसे काटे नहीं कट रहा था .सोचा चलो किसी मॉल में जा कर ही समय गुज़ारा जाए .लोब्बी में बैठी मैं सोच रही थी दिल्ली में तो समय की इतनी कमी थी यहाँ समय ही समय है . मैं यहाँ आई ही क्यों -मैं यहाँ कैसे रहूंगी -और न जाने कितने ही उलटे विचार मेरे मन में आने लगे .ड्राईवर ने भी मुझे जैसे खिजाने की ही सोच रखी थी .उसका इंतजार करते करते गुस्सा और बढ़ने लगा .तभी देखा एक बड़ी सी बस होटल के बाहर आकर रुकी .उसके पीछे का दरवाज़ा खुला और किसी जादू की तरह एक के बाद एक दस -बारह विकलांग व्हील चेयर पर बस में से उतर कर लोब्बी में आ गए इतने अच्छे से अपनी व्हील चेयर खुद ही चला कर होटल के अन्दर आ गए .अपनी भावना भूल कर हतप्रभ सी मैं उन्ही में खो गयी -वो दृश्य ही ऐसा था .सभी विकलांग--इतने साफ़ सुथरे !!स्वच्छ कपडे पहने हुए ---किसी का एक हाथ काम नहीं करता था तो किसी का एक पैर -कोई मूक कोई बधिर -पर सभी में एक चीज़ समान थी--उनके चहरे के भाव --सभी के चहरों पर एक कोमल मुस्कान विद्यमान थी और एक दूसरे को देख कर बहुत खुश होकर हंस हंस करअपनी अपनी तरह से अपनी  बात कह रहे थे .

साक्षात  इश्वर के दर्शन मैंने उन्हीं लोगों में किये .किसी प्रकार की कोइ कमी का एहसास उनके चहरे पर नहीं था .भरमुठ्ठी ख़ुशी बाँट रहे थे एक दूसरे को .मुझे अपनी कमी  का एहसास हुआ .सब कुछ होते हुए भी मैं विचलित क्यों हूई ?मेरा दृष्टिकोण नकारात्मक क्यों हो गया था ?क्यों शारीरिक स्वास्थ्य भरपूर होने के बावजूद हंस कर दो शब्द बात नहीं कर पाते हम ...?सहज क्यों नहीं रह पाते हम ...?

तब लगा उन्हीं के बीच से उड़ती हुई सकारात्मकता मेरे पास आ गयीहै .उन्हीं के खिले खिले चेहरों की मुस्कान मेरे पास आ गयीहै .मैं सोचने लगी --क्या मैं विकलांग नहीं हूँ --मेरी मानसिक विकलांगता शारीरिक विकलांगों ने दूर की .तभी मुझे लगा हर इंसान के अन्दर एक विकलांग है ------

ईश्वर ने तब ये सन्देश दिया------दुखी रहने का सामान मत एकत्रित करो,खुश रहने के बहाने ढूँढो .और तभी मेरी गाड़ी भी आ गयी .मेरी धरोहर -मेरे अन्दर की खोई हुई कृतज्ञता- मुझे वापिस मिल गयीथी . मैंने ड्राईवर से कहा-"मंदिर चलो!!!!!!!!!!!!...I mean take me to some Indian temple please..!!"

13 May, 2010

नई सुबह -3

  अँधेरे कमरे की
  खिड़की से-
  देख रही थी मैं--
 प्रकृति का करिश्मा....!! ,
 व्योम को निर्निमेष निहारती-
 देख रही थी-
 रात के अंधरे को
  जाते हुए ....
  अरुणिमा को-
पृथ्वी पर आते हुए........!!


भाग रही है पृथ्वी निरंतर 
कुछ पाने को 
क्या पाने को ?
हर पल, पल खोते हुए !!
फिर भी ----
सुबह के आने को
 कौन रोक सकता है ?
सूरज की आभा को
 कौन रोक सकता है ?

बंद हों हृदय के द्वार -
फिर भी ---
सुबह के आने को
 कौन रोक सकता है ?
सूरज की आभा को-
 कौन रोक सकता है ?

सूरज की पहली किरण से
मन की सरिता में
 स्पंदन हो ही जाता है ---!
निष्प्राण निस्तभ्ध शरीर में
 प्राण आ ही जाते हैं .....!!
उठो जागो-
 खोलो मन के द्वार ----
एक नई सुबह ने
घूँघट खोल दिया है-
नई  सुबह का आगमन हो चुका है ......!!!!!!