नमष्कार !!आपका स्वागत है ....!!!

नमष्कार !!आपका स्वागत है ....!!!
नमष्कार..!!!आपका स्वागत है ....!!!

28 August, 2012

ऊषा की ओ स्वर्णिम ललि ......!!




 धनघड़ी  आई .....
ब्रह्ममुहुर्त लाई ....!!
अब शुभ संकेत सी ...
बिखरने  लगी लालिमा ...
ऊषा  की आहट  से ही ...
घुल गई  रात्रि की   कालिमा ...!!

 नतमस्तक  हूँ ...प्रभु द्वार .....!!
वृहद  हस्त हो ...
तुम्हारा प्रभु  हर बार ....!!
इस जीवन में सौभाग्य ही है मेरा ....
ज्ञान के इस अखण्ड मान   सरोवर में ....
प्रभु अर्हणा प्राप्त ...
मैं वो रक्त कमल हूँ ...
प्रत्येक  प्रात निज आभ से ...
चूमती हो   मस्तक मेरा ....
ऊषा की ओ स्वर्णिम ललि ...!!
और सुप्तप्राय सा ...  मैं ...
खोल तंद्रिल चक्षु..
अनुरक्त  हो .....
सुध-बुध खो .....
तत्क्षण  तत्पर जागृत हो...
स्फूर्त हो   उठता हूँ .....
अपनी पंखुड़ियों सी कृति लिये ..
किंजल्क लिए ..
खिलने के लिये ...
सँवरने के लिये ...
बिखरने के लिये .....................................................................................................!

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अर्हणा --सम्मान
अनुरक्त--वशीभूत हो ...
किंजल्क -कमल का पराग

आज सुबह से ही इस कविता को पोस्ट करने की कोशिश कर रही थी .....पता नहीं क्यों पोस्ट ही नहीं हो पा रही थी ।अब अलग पोस्ट बना कर ड़ाल रही हूँ ...आशा है सफलता मिलेगी ...!!

24 August, 2012

बूंदों का रंग ...

बुरा मत बोलो ,बुरा मत देखो,बुरा मत सुनो ...


नकारत्मक को नकार कर सकारत्मक को साकार कर पाना मुश्किल तो है ...किंतु ज्ञान ही हमारे मन को समृद्धी देता है ...!!हम कहीं  भी जायें हमरा मन हमसे आगे आगे ही चलता है ,दिशा दिखाता हुआ ......जो दिखाता है ....वही देखते हैं हम ....जो समझाता है वही समझते हैं हम ....
 सावन के आते ही लालित्य से धरा सराबोर ....जहाँ देखो वहाँ ...प्रकृति का सौंदर्य जैसे अटा पड़ा है ...!!वही सौंदर्य का,वही बरसात का वर्णन कर पाया मन ...!!

बीत  गया सावन ......ऐसी बरसात के बस बूंदों की आवाज़ खनखनाती है कानों मे ...... ...एक शाश्वत सत्य सा .....कुछ संदेश है ...निश्छल बूंदों में.....

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बरस रहा था ...
पुरज़ोर सावन ...
निश्छल निर्झर ...
सोचा ..देखूँ तो कैसा है ...
बूंदों का रंग..
अंजुरि भर हाथ मे ..!!
जब  देखा ...तब जाना ..
कोइ रंग नहीं...?
बस ...
 मन के भावों मे छुपा हुआ ...
एक  ही रूप जाना पहचाना .. ..
मेरे  भावों  का रंग ही  तो  है ...
 इस बरसात मे ...

उछाल देती हूँ भरी अंजुरि ..
भीग जाती हूँ उन्हीं बूंदों मे फिर ...
उमड़ घुमड़ घन ..
गरज-गरज बरस रहे ...
खन खन कुछ कहती हैं  बूंदें..
कानो में.....
राग गौड़ मल्हार के सुर आज छेड़े  हैं ..
हृदय से ...
पहुंच ही गई  श्रुति मुझ तक ...
इन्हीं संचित पावन  बूंदों से ....
भिगो गयी अंतस ...
सच मे ...
मेरे भावों में भीगा ...
सप्त स्वरों का ....
सतरंगी ..रंग ही तो है ...इस बरसात में ...!!


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गौड़ मल्हार -राग का नाम है ,



25 July, 2012

मौन सी एक सुबह .........................!!





मेरी चूड़ी   सी ...
वर्षा की बूंदो मे है खनखनाहट ....
मेरी बिंदिया सी ..
तुम्हारे चेहरे  पे है मुस्कुराहट...
अदरक की चाय सी ....
सुबह  में है  खुश्बू....
खड़खड़ाता हुआ अख़्बार ...
सुर लहरी छेड़ रहा है ...
तुमसे  रौशन है मेरा जहाँ ...

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20 July, 2012

श्याम भजन ....

वैसे तो गीत को स्वर देना एक अलग ही विधा है ..!कभी इससे  पहले कोशिश नहीं की थी किसी गीत को स्वर देना की ...पर आज समझ मे आया प्रोत्साहन क्या होता हैऔर क्या कुछ कर सकता है .. ...!मुझे कभी विश्वास नहीं था मैं कर पाउँगी पर आप सभी के कहने पर ही आज मैंने  अपने  लिखे एक श्याम भजन ..रीत रही मोरी प्रीत .....को स्वर्बद्ध किया और स्वयम ही इसे संगीत्बद्ध   भी किया  है ...!!इसका छायांकन  भी मेरी ही कोशिश है  ...मेरे जीवन की एक श्रेष्मठतम  उपलब्द्धी है ये ...!और श्रेय जाता है ...आप सभी को ....
मधुरेश ,सलिल जी ,मनोज जी,अशीष जी ,प्रवीण जी ,यशवंत ,मुकेश ,अरविंद जी ,संगीता दी अनमिका जी ,अनु,दिगम्बर नासवा जी,रमाकांत जी ,शिखा जी,रश्मी दी ,अमृता जी,बाबुषा ,धीरेंद्र जी ,सतीश जी, शास्त्री जी,रविकर जी ,ललित जी ,शिवम ,अभि,वीरुभई जी ,संजय भास्कर जी ,हिमांशु जी ,...
समय समय पर आप सभी मुझे बहुत प्रोत्साहित करते रहे हैं कि मैं अपनी  रचना स्वयम स्वर बद्ध  करूं.....वैसे तो और भी बहुत नाम हैं लिखती जाउँ तो उसी से पोस्ट भर जायेगी ......

आप सभी का स्नेह और आशिर्वाद भरपूर  मिला है ....तभी  ये प्रभु कृपा भी हुई है ...लीजीये ये विरह गीत सुनिये .....



18 July, 2012

जड़ से चेतन की ओर .........!!


जग त्यक्त  कर ही ....
तुममें अनुरक्त हुई  ...
तुम्हारी छब  हृदय  में रख  ..
स्वयं से भी प्रेम में ..
आसक्त हुई ......


 प्रेम का वर्चस्व  ...
है तुममे ही सर्वस्व .....
प्रसन्नता से चहकती ...
अल्हड़ सी ..खिलखिलाती ...
वर्षा  की झमाझम  में भीगती ....
जीवन का राग गाती ....
जीवन मार्ग पर ...
मदमाती ..चलती  रही ...........उनमत्त ......
जीवन की राह कठिन है ...
.....छप ....छपाक ...
कुछ कीचड़ सा उछला ...
कुछ छींटे  पड़े ....
औचक भयासक्त हुई .. ......!
रे मन .....चंदरिया मैली  क्यों हुई ...?

 हे ईश्वर ...मन मे तुम हो ...
फिर ये डर  कैसा ...???


इक पल को भ्रमित  हुई ...
क्रोध से आक्रोश से भरमाई भी ...
डगमगाई  भी ...
लगा ...
 ईश प्राप्ति का लक्ष्य ......
कहीं बिसर  ना जाऊँ ..
 रम ना जाऊँ...
दुनिया के इस मेले  में ...!!


चलते-चलते ....
अब इस निर्मल बारिश मे ....
धुल गया है कीचड़...
और ...टूटने लगा है भरम  ...
अब जान गयी हूँ ....
राग की आत्मा सरगम में ही है ......
समर्पण प्रभु चरणों में ही है  ....!!

निष्ठा और आस्था ...
हरि दर्शन में ही है  ...
भीगना ही है ...
सराबोर होना ही है ...
कोई भरम ...भ्रम भी नहीं .. . ..
हृदय  में तुम ही तुम हो ...
हे प्रभु ......आश्वस्त हूँ ..
प्रशस्त है मार्ग अब ....
चलती जाती हूँ ..
अपने आप में लीन  ...
बजता है मन का इकतारा ..
वर्षा के निर्मल जल में  भीगती ...
उज्ज्वल जल की ओर ...
ये मार्ग  जड़ से चेतन की ओर  जाता है ....!!
चल मन ....गंगा -जमुना तीर ...
गंगा जमुना निर्मल पानी ...
शीतल होत शरीर ...

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लगातार हो रही है बरसात ......
ये कविता लिख कर भी ...
और भीग रहा है मन ...
जाने कैसे समुंदर मे डूब गयी हूँ मैं ...
हे कृष्ण .....भव पार करो .....!!

ये भजन ज़रूर सुनिये ...


14 July, 2012

भुवन की मैं हूँ नीली सी धरा ....

ओ पथिक ...
क्या ज्ञान है .......कौन हो तुम ....?
कहाँ से आये हो..?
माया में  ...क्यों इतना भरमाये हो ...?
किस बात की शीघ्रता  है ...?
कुछ साथ नहीं जायेगा ...
मुझ माटी में  ही तो मिलना है ...
अरे ...रुको ......रुको ...
सुनो तो ....
माटी में मिलने से पहले ..
माटी को ही  कुछ दान देते जाओ ...
और कुछ नहीं ..
बस ...थोड़ा सा मान देते जाओ ...

रंग दो मुझे इस सावन हरा ...
पंच तत्व से बनी ...
भुवन की मैं हूँ नीली सी धरा ....


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अगर सम्भव हो इस वर्ष कुछ वृक्ष ज़रूर लगायें........!!!

13 July, 2012

निकला है चाँद......!!

पूनम का निकला  है चाँद...
थम गई है रात ...
चांद को निर्निमेष निहार ...
भीग रही है रात ....

लहरों सी लहरें ...
मन मे उठती हैं ......
तरंगों सी उमंगें ....
सींचती है रात ....

ये कैसा सन्नाटा  है ...
के गाती है प्रीत ...
ख़्वाहिशों  का दामन ..
भिगोती है रात ....!!


कल कल बहता नदिया का जल ..
तिस पर गिरती ...टिपिर टिपिर ...
बूंदों की ये आवाज़ ....
जैसे बज रहा हो  कोई साज़ .....!!

मूंद कर पलकों को...
चांद भर  नयनों मे ..
भीगी भीगी सी ..
प्रीत भर लेती है रात ....!!

स्निग्ध चांदनी में डूबी ...
भीनी  चंदरिया ओढ़े ...
कैसी खिलती है रात ..
कैसी भीगती है रात ...!!