नमष्कार !!आपका स्वागत है ....!!!

नमष्कार !!आपका स्वागत है ....!!!
नमष्कार..!!!आपका स्वागत है ....!!!

04 November, 2013

नित नया किनारा ...??


''हौसले अंतरनाद भी करते हैं .....अपनी चीख़ों की प्रतिध्वनि की शून्यता  मेँ अपनी पूरी ज़िंदगी का हिसाब किताब करते हैं .....''
रश्मी दी के विचार बहुत गहन सोच दे रहे थे .....उसी से आगे बढ़ते हुए मेरे मन के भाव ..............कुछ इस प्रकार ......आभार रश्मि(प्रभा) दी गहन चिंतन देने के लिए जिसने कविता का रूप लिया .....!!


वेग से उत्फुल्ल  ह्रदय  में
उछलती थीं प्रबल
मचलती ...उमड़ती ...घुमड़ती
जीवट   भावों सी तरंगें
जिस धुरी को छू जाती
.बस वहीं  तक  किनारा ......!!!
फिर धूमिल सागर मेँ...!!

सागर के अथाह
सुनील विस्तार में सिमटी
उसके   फेनिल   उज्ज्वल  स्पंदन  में
पाती जब विस्तार 
होती गति पूर्ण 
करती है उन्मत्त नर्तन 
भावना लेती  है हिलोर 
अंतर्नाद का बुलंद होता है हौसला 
इसी हौसले की प्रतिध्वनि से 
हुंकार करती हुई 
आकार लेती है 

उठती है....मिटने को
 प्रत्येक समुज्ज्वल उत्ताल लहर
क्यों बनाती है ...स्वनिर्मित
नित नया किनारा ...??


क्षणभंगुरता  जीवन की
जानती है सब
फिर भी ..मानती नहीं
जिजीविषा से भरी
ओज से  उल्लसित
समुज्ज्वला ... रुकती नहीं ....!!


प्रत्येक लहर का बनता ही है
अपना किनारा
फिर धूमिल ..सागर में ...!


फिर मिटने को उठती है
प्रत्येक समुज्ज्वल उत्ताल  लहर
पाती है सागर से ही विस्तार
 होता है सागर में ही विस्तार
जब देती है सागर को विस्तार
 बनाती जाती है ...स्वनिर्मित
नित नया किनारा ...!!
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''उदास आँखों से साहिल को देखने वाले .....
हर इक मौज की आगोश में किनारा है ....''



इसी बात पर आज ये गीत भी सुनिए ........






'गर्भनाल' पत्रिका के नवम्बर २०१३ अंक में प्रकाशित हुई है और
इसी कविता का प्रसारण आकाशवाणी दिल्ली से भी आ चुका है। 

25 October, 2013

स्वप्न न बुनूँ ....तो क्या करूँ ....??


ताना बाना है जीवन का
भुवन की कलाकृति
आँखें टकटकी लगाए ताक रही हैं
अनंत स्मिति.....!!

घड़ी की टिक टिक चलती
समय जैसे  चलता चलता भी ...रुका हुआ

शिशिर की अलसाई हुई सी प्रात
झीनी झीनी सी धूप खिलती शनैः शनैः
शीतल अनिल  संग संदेसवाहक आए हैं
सँदेसा लाये हैं
उदीप्त हुई आकांक्षाएँ हैं
......ले आए हैं मधुमालती की सुरभि से भरे
कुछ कोमल शब्द मुझ तक
...अनिंद्य आनंद दिगंतर
तरंगित भाव शिराएँ हैं  ....!!

गुनगुनी सी धूप और ये कोमल शब्द-
सुरभित अंतर
कल्पना दिगंतर
भाव  झरते निरंतर
स्वप्न न बुनूँ ....तो क्या करूँ ....??




19 October, 2013

क्या कहता है मन .....

बांधता है वक़्त  सीमा में मुझे ......
भावों की उड़ान तो असीम  है ....
अनंत  है .....
तो फिर ...  क्या है जीवन  ....??
चलती हुई सांस .....
अनुभूत होते भाव  ....
बहती सी नदी ...
सागर सा विस्तार ....
आज शरद पूनम की रात
 झरता हुआ चन्द्र का हृदयामृत ...
या रुका सा मन ....
जो मुसकुराता हुआ ....
खोज लाता है गुलाबी सुबह का एक टुकड़ा .....
अपनी किस्मत सहेज ...
मुट्ठी में भर कर ....!!

भरी दोपहर  भी  ढूंढ लेता है मन  ....
पीपल की छांव ....
वो अडिग अटल विराट वृक्ष के तले ....!!
घड़ी भर बैठ ....
मिल जाता है .........
ज़िंदगी के गरम से एहसासों को आराम ....
फिर कुछ गुनगुनाती हुई .....शाम की ठंडी बयार । ....

और फिर पहुँच जाता है मन .....
अम्मा (दादी)के चूल्हे के पास ...
हाथ से सेंकती हैं अम्मा ....
एक एक फूली फूली रोटी ....
चूल्हे पर ...
 बुकनू ...शुद्ध घी और गुड़ ....!!

और माँ भी तो आस पास ही हैं ....
चौका समेटतीं ....!!!!!!
जब माँ की आवाज़ कानो मे गूँजती है .....
परों से भी हल्का मन ....
कब नींद से  घिर जाता है ...
पता ही नहीं चलता ....!!
सुबह उठती हूँ फिर .....
जब  गुनगुनाता है जीवन ....!!!!!!
यही तो ज़िद है मेरी .....
जब तक जीवन गुनगुनाता  नहीं ....
मैं सोती ही रहती हूँ ....!!
देखो तो .....गुनगुनाने लगी है ....
गुलाबी शिशिर   सी प्रात की धूप अब ......!!



15 October, 2013

हाइकु ...संवेदना ....

ज्यों टूटकर ...
गिरती पीली पात  .....
बीतते लम्हें ...


 रैन  न बीते ....
ये  क्षण रहे रीते ....
आस न जाए ...

कुछ तो कहो ....
ऐसे चुप न रहो ....
नदी से बहो .....



संवाद से ही ....
मुखरित  होती है ...
संवेदनाएं ....


ठिठक गई ....
मूक सी हुई जब ...
संवेदनाएं ....



संवेदना ही ..
ज्योति है जलाये ...
जीवन खिले ....

मानवता ही ...
परम दया धर्म .....
एक मुस्कान ...


तरंग जैसी .....
छू जाती हैं  मन को .....
संवेदनाएं ....


सृजन खिला ... ..
संवेदनशील हो .....
तरंग बना ...





05 October, 2013

माँ मुझे आने तो दो ....

आद्या  शक्ति माँ सुखदायिनी ...!!
हे माँ मुझे आने दो ....
अपने  संसार में ...
नव राग प्रबल गाने दो ....

शक्ति दायिनी...
 माँ तुम  हो मेरी ...
आस मेरी ...मुझमें  उल्लास भरो ....!!

भाई जैसा ...
मेरी शिराओं में भी ....
चेतना का  संचार करो .....
माँ मुझसे भी तो प्यार करो ....!!

छल छल कर दुनिया छलती है ....
तुम तो न जग का हिस्सा बनो .....
मुझे जीवन दो पालो-पोसो ....
नव-शक्ति का किस्सा बनो ...


जब तुम जग से भिड़ पाओगी .....
अपनी छाया फिर देखो तुम ...
जग से मैं भी लड़ जाऊँगी ...
पोसूंगी तब अपने सपने .....
और एक उड़ान पा जाऊँगी ....!!

माँ मुझे आने तो दो ....
अपने संसार में ....
नव राग प्रबल गाने तो दो ...!!
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29 September, 2013

झरने लगे हैं पुष्प हरसिंगार के....................!!

पुनः शीतल चलने लगी  बयार  ....
झरने लगे हैं पुष्प हरसिंगार ...........
आ गए फिर दिन गुलाबी ....
प्रकृति करे  फूलों से  श्रृंगार ………….!!

नवलय भरे किसलय पुटों में........
सुरभिमय रागिनी के ....
प्रभामय नव छंद लिए कोंपलों में.............
अभिज्ञ  मधुरता हुई दिक् -शोभित….
सिउली के पुष्पों से पटे हुए वृक्ष .............!!

सुरभि से कृतकृत्य हुई  धरा..............
पारिजात  संपूर्णता  पाते जिस  तरह ......
जब खिलकर झिर झिर झिरते हैं ...
धरा का ..प्रसाद स्वरूप आँचल भर देते हैं ..
और अपना सर्वस्व समर्पित कर देते हैं ....
पुनः धरा को ही ....इस तरह ....!!!

....................................................................................................


24 September, 2013

जीवन की मौलिकता .....!!


''महुआ ले आई बीन के -
और तिल्ली  धरी है कूट -
आज सजन की आवती -
सो कौन बात की छूट .......!!

 गुड़ होतो तो
 गुलगुला बनाती  ....
तेल   लै आती उधार...
मनो का करों जा बात की ..
मैं आटे से लाचार ........!!!!''



ये  बुन्देलखंडी कहावत, अम्मा (मेरी दादी ) बहुत सारी  चीज़ों में अपनी लाचारगी को छुपाते हुए, बहुत खुश होकर कहा करती थीं |उनकी लाचारगी अब समझ में आती है |

कितना कुछ करना चाहते हैं हम इस जीवन में !!और ज़िन्दगी के इस घेरे में बंध कर क्या - क्या कर पाते हैं ...!!


स्वप्न और यथार्थ के बीच की कड़ी ही जीवन है ...!!
भले ही हम तरक्की कर चाँद पर ही क्यों न घर बना लें ,कुछ मौलिक बातों से दूर हम कभी ....कभी नहीं जा पाते  !!यही शाश्वत सत्य से जुड़ाव ही, हमें जीवन को जीने का कोई संदर्भ ,कोई कारण  भी  देता है !!

  समय के साथसाथ पुरानी कहावते ,मान्यताएं सभी तो दम तोड़ रहीं हैं |अम्मा की दी हुई इस धरोहर को आप सभी तक पहुंचा कर उनको एक भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करती हूँ |वो क्या गयीं मेरा बुन्देलखंडी भाषा से जैसे नाता ही टूट गया |
मेरा वो --''काय अम्मा ?''पूछना और उनका वो --''कछु नईं बेटा ....''कहना बहुत याद आ रहा है | आज उन्हीं की यादों  के साथ पुनः जी ले  रही हूँ अपना बचपन थोड़ी देर के लिए ....!!

''धीरे गूँद  गुंदना री गूँदना......धीरे गूँद गूँदना री .....''
ये गीत भी अम्मा गाती थीं |
और इसे  लिखते लिखते भी मन मुस्कुरा  रहा है |याद आ रहा है उनके हाथ पर बना वो गूँदना |आजकल के बच्चे जिसे टैटू कहते हैं ,अम्मा उसे गूँदना कहती थीं |सच है न .........कुछ तो है जो कभी नहीं बदलता .....जैसे जीवन की मौलिकता .....!!या हमारा माटी से जुड़ाव ....

''मन क्यूँ नहीं भजता राम लला .....
कृष्ण नाम की माखन मिसरी ....
राम नाम के दही बड़ा ...
मन क्यूँ नहीं भजता राम लला ....!!''

अम्मा काम करती जाती थीं और गाने गुनगुनाती जाती थीं !!
''छोटी-छोटी सुइयां रे ....जाली का मेरा काढ़ना ....!!''
अब समझ में आता है ये सब रियाज़ होता था उनका ...!!
''संजा के मिसराइन के इते बुलौआ  आए |सोई आए गाना चल रओ''(शाम को मिसराइन याने -श्रीमति मिश्रा ,के घर गाने का बुलावा है ,इसलिए गाने का रियाज़ हो रहा है ...!!):))

और फिर शाम को मिसराइन के घर ढोलक  की धमक और गीतों भरी वो शाम .....
कितनी सादगी से ,परम्पराओं से जुड़ा सार्थक सुंदर जीवन ...........