19 August, 2021

बैरी सावन बीतत जाये


चेहरा अंचरा बीच छिपा के 
जाने ढूंढें कौन पिया के 
नैना रो रो नीर बहाये 
बैरी सावन बीतत जाये 


अंखियन  कजरा बोल रहा है 

सजनी का जिया डोल रहा है 

हिरदय की पीड़ा कहती है 

नैनं से नदिया बहती है 


दामिनी दमक दमक डरपाए 

कोयलिया की हूक सताए 

झड़ झड़ लड़ी सावन की लागि 

आस दिए की जलती जाये 

बैरी सावन बीतत जाये 


अनुपमा त्रिपाठी 

"सुकृति "


13 comments:

  1. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार (20-08-2021) को "जड़ें मिट्‌टी में लगती हैं" (चर्चा अंक- 4162) पर होगी। चर्चा में आप सादर आमंत्रित हैं।
    धन्यवाद सहित।

    "मीना भारद्वाज"

    ReplyDelete
    Replies
    1. बहुत-बहुत धन्यवाद मीना जी 🙏🙏❤

      Delete
  2. सावन को बिम्ब बनाकर बहुत भावपूर्ण विरह-गीत रचा है अनुपमा जी आपने।

    ReplyDelete
  3. सब जल झर झर बरसत जाय,
    बैरी सावन बीतत जाय।

    सुन्दर पंक्तियाँ।

    ReplyDelete
  4. सुंदर गेय रचना।गुनगुनाने का मन कर गया।

    ReplyDelete
  5. बहुत सुंदर सृजन

    ReplyDelete
  6. बहुत अच्छी रचना

    ReplyDelete
  7. मुग्धता बिखेरती हुई एक सुन्दर रचना।

    ReplyDelete
  8. बहुत ही सुंदर सृजन।
    सावन की फ़ुहार-सा।
    सादर

    ReplyDelete
  9. अहा! अति सुन्दर ।

    ReplyDelete

नमस्कार ...!!पढ़कर अपने विचार ज़रूर दें .....!!