नमस्कार ....!!आपका स्वागत है ....!!

नमस्कार ....!!आपका स्वागत है ....!!
नमस्कार ....!!आपका स्वागत है ....!!

27 December, 2012

कुछ कहूँ .....??

कह तो लूँ .....
पर कोयल की भांति कहने का ...
अपना ही सुख है ...

बह तो लूँ ......
पर नदिया की भांति बहने का .....
अपना ही सुख है ...


सह तो लूँ ....
पर सागर की भाँति सहने का ....
अपना ही सुख है ....

सुन तो लूँ ....
पर विहगों के कलरव  सुनने का ...
अपना ही सुख है ...

गुन  तो लूँ .....
पर मौन दिव्यता गुनने का ....
अपना ही सुख है ....



हँस तो लूँ ...
आँसू पी कर भी  हंसने का ....
अपना ही सुख है ....


जी तो लूँ .....
पर रम कर के जीने का ...
अपना ही सुख है ...


रम तो लूँ ...
हरि भक्ति में  रमने का ....
अपना ही सुख है ....


है न ...??



19 December, 2012

प्रस्तार कहाँ से लाऊँ ...

आज फिर चली जा रही हूँ ...
बढ़ी जा रही हूँ .....
आस से संत्रास तक .....
खिँची खिँची ...
नदिया किनारे ....
कुछ यक्ष प्रश्न लिए ...
डूबता हुआ सूरज देखने ....
पंछी लौटते हुए .. ...अपने नीड़....
मेरे हृदय  में भरी जाने क्या पीर ....
कहाँ है  मेरी आँखों में नीर ....??

जवाब नहीं देती ....
दग्ध ....
सुलक्षण बुद्धि भी ..
जैसे कुछ पल ....
आराम करना चाहती है .....!!

धीरे धीरे डूब गया है सूरज .....
भावनाओं का ......
गहन अंधकार से घिरी मैं ...
तम की शैया पर सोचूं ...
पलक कैसे झपकाऊँ ...?
दुस्तर   प्रस्तार कहाँ से लाऊँ ...?
गहन अंधकार को भेद ...
संत्रास कैसे मिटाऊँ ....??

जीवन ज्योति किस विध पाउँ ..?
धीर धरूं ...धैर्य कि माला जपूँ..
गहन आराधन समय बिताऊँ ...
जो होगा  प्रार्थना में दम ....
समय के साथ ...
मिट ही जायेगा .... ये तम.... !!
आस मैं मिटने नहीं दूँगी ....
संत्रास मैं रहने नहीं दूँगी .

होगी ही ...फिर होगी भोर ....
संस्कृति ...सभ्यता पर छाया घना कोहरा छंट जाएगा ...
विवेक    हृदय   द्वार  खटखटाएगा .....
यदा यदा ही धरमस्य ग्लानिर्भवति भारत .....
जन जन मानस मे कृष्ण बन ...
आएगा आयेगा पुनः ....
 सवेरा ज़रूर आयेगा .....!!

13 December, 2012

कल्पना सी साकार हो रही ...!!




स्निग्ध उज्जवल चन्द्र  ललाट  पर .....
विस्तृत  सुमुखी सयानी चन्द्रिका ....भुवन  पर ....



निखरी है स्निग्धता ..
बिखरी है   चन्द्रिका .........



पावस ऋतु  की मधु बेला ...

  बरस रहा है मधुरस ...
सरस हुआ   है मन ..
बादल की घनन घनन ...
झींगुर की झनन  झनन ..
जैसे लगे बाज रही ... ...
  किंकनी  की खनन खनन ..
मन करता  मनन  मनन...
धन्य हो रहा जीवन प्रतिक्षण..



चांदनी स्निग्ध स्वर्ग सी ...
विभा बिखेर  रही ..
डाल-डाल झूल रही  ...
 बेलरिया फूल रही....
पात पात झूम रही ....
झूम झूम लूम रही ....
 प्रीति  मन चहक रही ..
रात रानी महक रही ....


शीतल  समीर साँय  साँय डोले ..
धरा चाँदनी की चाँदी सी चमकती चंदरिया ओढ़े....
मन गुन गुन बोले .......
तन्द्रा तिर तिर जाए ........
 हाय...ऐसे में ..
कहीं निशा बीत न जाए ..

जीवन की जय करती ..
प्रकृति सजीव हो रही .
भर भर गागर ..
अद्भुत प्रेम उँडेल रही  ....

कल्पना सी साकार हो रही ...!!


 O Mother nature .. ....!!!
Can I see YOU with the eyes that I have ...?
Can I pray to YOU with the hands that I have ....?
Can I worship YOU with the mind that I have ...?
I know not much .....in fact nothing ....!!O GOD .....!!
Hold me and behold me as I tread THE PATH ...IN PURSUIT OF EXCELLENCE ...towards YOU ...THE OMNIPOTENT ...AND THE OMNIPRESENT ......!!!!!!



08 December, 2012

धार बनी नदिया की .......

नदी की यात्रा ....समुद्र की ओर .....आत्मा की यात्रा, परमात्मा की ओर ....इसी भाव से पढ़िये ....धार बनी नदिया की ......


छवि मन भावे ...
नयन   समावे ..
सूरतिया पिया की ...

बन बन .. ढूँढूँ ..
घन बन  बिचरूं .....
धार बनी नदिया की .......


कठिन पंथ ...
ऋतु  भी अलबेली ....
बिरहा मोहे सतावे ...

पीर घनेरी ...
जिया नहीं बस में ...
झर झर झर अकुलावे .....


 विपिन घने ,
मैं कित मुड़ जाऊँ ...
कौन जो राह सुझावे .....?

डगर चलत नित
 बढ़ती हूँ........
 निज वेग मोहे हुलसावे ...

अब..कौन गाँव  है ....
कौन देस है ..
कौन नगरिया  पिया की ....


बन बन .. ढूँढूँ ..
घन बन  बिचरूं ...
धार बनी नदिया की .......


धार बनी नदिया की ....!!

मैं इक पल रुक ना पाऊँ....
मैं  कल  कल बहती छल छल बहती .....
बहती बहती जाऊँ....!!!!!!

I know not much .....in fact nothing ....!!O GOD .....!!Hold me and behold me as I tread THE PATH ...IN PURSUIT OF EXCELLENCE ...towards YOU ...THE OMNIPOTENT ...AND THE OMNIPRESENT ......!!!!!!



03 December, 2012

बेला उषा की आई .....

बेला हेमंत उषा की आई .....!!
पनिहारिन मुस्काई  ...
ओस झरी प्रेम भरी ...
रस गागर भर भर लाई ....!!
चहुँ ओर जागृति छाई ....
बेला उषा की आई ...!!

सर पर गगरी ...
मग चलत ...डग भरत....
मुड़त -मुड़त  हेरत   जात ...
हिया चुराए ...पग डोलत जात ....
वसुंधरा भई नार नवेली ....
 हँसत-मुस्कात ....
राग *'भिन्न षडज' गात  चलत जात  ....
नित प्रात ......रसना ......
प्रेम सागर सों भर-भर गागर ...
कैसी नभ से जग  पर छलकाई ....!!

आनन स्मित आभ सरस छाई .......
......प्रेम धुन धूनी रमाई ...
...बेला उषा की आई ...!!

मोद मुदित जन जन .....
धरा खिली कण कण ....
आस मन जागी ...
ओस से भीगी ....
श्यामा सी छवि सुंदर ....
श्याम मन भाई ...
बेला उषा की आई ....!!!

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भिन्न षडज -हेमंत ऋतु  में गाया जाने वाला राग है ..!!