नमस्कार ....!!आपका स्वागत है ....!!

नमस्कार ....!!आपका स्वागत है ....!!
नमस्कार ....!!आपका स्वागत है ....!!

31 December, 2014

चल मन उड़ चल पंख पसार ....!!

शब्द अपने कितने स्वरूपों में
अवतरित ,
खटखटाते हैं 
मन चेतन द्वार ,
लिए निष्ठा अपार ,
झीरी से फिर चली आती है
धरा के प्राचीर पर
रक्तिम .....
पलाश वन सी .... 
रश्मि  की कतार
नवल वर्ष  प्रबल  विश्वास
सजग  है मन
रचने नैसर्गिक उल्लास,
हँसते मुसकुराते से
 भीति चित्र ,
प्रभात का स्वर्णिम  उत्कर्ष,
शबनमी वर्णिका का स्पर्श ,
एक विस्तृत आकाश का विस्तार ,
बाहें पसार ...
चल मन उड़ चल पंख पसार ....!!
***********************************


आप सभी को नव वर्ष 2015 की अनेक अनेक मंगलकामनाएं !!सभी के लिए यह वर्ष शुभ हो ऐसी प्रभु से प्रार्थना है !!

20 November, 2014

सुरलहरी ...

शीत का पुनरावर्तन ,
जागृति प्रदायिनी ,
उमगी सुनहली प्रात,.....!!

अलसाई सी ,गुनगुनी धूप ,
गुनगुनाती हुई स्वर लहरियाँ,
शब्दों की धारा सी ...
शांत बहती नदी ...
और ...
 हृदय में अंबर का विस्तार ,
मेरे मन के दोनों किनारों को जोड़ता
एक सशक्त पुल .....
नयनाभिराम सौन्दर्य देते पल...!!

और कुछ शब्दों की माला पिरोता....
गाता मेरा मन ...
आओ री आओ री आली
गूँध गूँध लाओ री ,
फूलन के हरवा ....!!''



10 October, 2014

आज फिर खिलकर, बिखरा पारिजात ....!!


अजस्र सौरभ सहस्त्रधारा ,
लाई वसुंधरा
नवल सौगात !!
मेघ घटाएँ छाई
गगन में
तिरता धवल चंद्रमा,
आई शरद-ऋतु की रात  !!

आज फिर उमगी मंजुल  चंद्रिका ,
बरसे नैसर्गिक आह्लाद ,
उपवन में मेरे
सुरभित दिव्य रास 
 खिलकर निखरा ,बिखरा पारिजात ....!!


03 October, 2014

प्रगाढ़ हरित अवलंब की छत्र छाया में......



इस  विराट वटवृक्ष के   ....
प्रगाढ़ हरित अवलंब  की छत्र छाया में
सत्व पूर्ण एक नीरवता है,
अविच्छिन्न .....!!

हथेलियों पर आक्रोश
ग्रहण करती  हुई,
सायास  प्रकाश बचाने के प्रयास में 
अकंपित अविचलित रहती हूँ मैं
प्रलयकारी  इस वेग में भी .......!!

और इस तरह बचा ले जाती हूँ 
तूफान के बीच भी
अंजुरी में सँजोयी
 वो दिये की लौ
                                        जो अंततः 
उज्ज्वल कर देती है  
हमारा जीवन .......!!

*********************************************

सभी का जीवन उज्ज्वल प्रकाशमय हो ....विजयदशमी की अनेक शुभकामनायें !!                                                                                   

19 September, 2014

क्षणिकाएं.....!!

रे मन
प्रेम पर  ठहरी हैं
झील  सी गहरी हैं
तोरे मन की बतियाँ ......
********************
प्रवृत्ति है ये जल की ,
जल  भी
जब कभी नदी सा
कल कल कल कल ....
बह नहीं पाता
तब भी रुका हुआ .....
यह जल ,
सरोवर में,
ठहरा हुआ ,
शब्दों    के  हृदय कमल
  है खिलाता !!

06 September, 2014

तुम्हारे मेरे बीच की कड़ी

तुम्हारे मेरे बीच की कड़ी
सिर्फ एहसास ही नहीं है,
सिर्फ शब्द ही नहीं है,
सिर्फ प्रेम ,ईर्ष्या ,द्वेष या
सिर्फ  आक्रोश  भी नहीं है
बल्कि संकुलता से  परे ,
तुम्हारा वो सशक्त मौन है ,
मेरे चारों तरफ ,
जो तुम्हारे होने का प्रमाण  देता है
अपनी ऊर्जस्वितता में,

और बांधे रखता है सदा ,
दुख सुख में ,
हमे इस अटूट  बंधन में...!!

28 August, 2014

प्रीतिकर झरे प्रतीति !!!!!!

दादुर ,मोर ,पपीहा गायें,
...रुस रुस राग मल्हार सुनायें ,
बूंदों की लड़ियों में रिमझिम ,
गीत खुशी के झूमें आयें

टप टप गिरती,झर झर झरतीं
रिमक झिमक पृथ्वी पर पड़तीं
आयीं मन बहलाने लड़ियाँ
जोड़ें जीवन की फिर कड़ियाँ...!!

चलो बाग हिंडोला  झूलें
दिन भर के दुख फिर से भूलें...!!
ऊंची ऊंची लेकर पींगें,
मन मोरा रसधार में भींगे...!!

छम छम पैजनियाँ सी बजतीं
आहा ,  प्रीतिकर झरे प्रतीति !!!!!!

26 August, 2014

हर साल इसी तरह ....!!


बूंद बरसती ,
भर आह्लाद  ,
अमोघ प्रेम मीमांसा बरसाती ,
धरा पर बूंद बूंद
शब्दातीत भावातीत
श्रवणातीत,
(कहने सुनने से परे)
और लहलहा उठता है प्रेम,
सृष्टि की हरीतिमा में
हरित मन की हर्षित प्रतिमा में
मेरे अंगना में
मेरी बगिया मे ,
मेरी हरी चूड़ियों में,
कुछ तुम्हारे शब्दों  में,
बज उठी हो जैसे बूंदों की ताल,
धिनक धिन
किंकिणी झंकार
जीवंत  है प्रेम
पावन सा ...
पावस ऋतु की वर्षा में भीगा ,
हर वर्ष  इसी तरह ....!!


******************************************************
बारिश का रास्ता देखते देखते अब ब्लॉग पर ही बारिश डाली है .........शायद ईश्वर दिल्ली में कुछ बरसात भेज दें .....!!

22 August, 2014

तपन .....हाइकु ...



तुमरी ठौर....
ढूँढे वही ठिकाना ...
मनवा मेरा ....


तपन बढ़े ...
कैसे दुखवा सहूँ ...
जियरा  जले ...

जलता जल .. .
तपन अविरल  ....
करे श्यामल ....


उड़ता  जल ...
तपिश सूरज की ..
बुझता मन ...


जल जलता ....
जलती भावनाएं ...
सूखती नदी  ..



चाहे मनवा .....
आस घनेरी जैसी  ...
शीतल छाँव ...


मन बांवरा ....
तपन जले जिया ....
मन सांवरा ...

नीरस मन  ...
जलती भावनाएं ....
दग्ध ह्रदय ...


देखो तो कैसी ...
तपती  दुपहरी ....
सूनी हैं  राहें ...........


ए री पवन ...
भर लाई तपन ...
जियरा जले ....



जलता मन ...
मैं क्या करूँ जतन...
जल न पाऊं .....!!

धू धू करती ...
तपती दोपहर ..
चलती हवा ...


18 August, 2014

हे कृष्ण कृष्णा.....!!





हे कृष्ण कृष्णा,
अब दूर करो मेरी तृष्णा,
विभूषित प्रमुदित मन करो,
मन वीणा को स्वरों  का
अलंकार दो,
संवेदना का जीवन में
व्यवहार दो ,
इक बूंद गिरे
और,
मुझ चातक का,
सोया जीवन
 झंकार दो ....!!



16 August, 2014

जीवन में फिर आस जगाओ .....!!

जल जल के जलता है जल
कैसे बीतेंगे ये पल ,
जल बिन निर्जल नैन  हुए ,
नीरस मन के बैन हुए

मेघ घटा आई घन लाई
उमड़ घुमड़ चहुं दिस अब छाई-
बरसो मेघा मत तरसाओ ,
झर झर बुंदियन रस बरसाओ...!!

बूंदों में सुर-ताल मिलाओ ,
राग मियां मल्हार सुनाओ,
जिया की मोरे प्यास बुझाओ,
जीवन में फिर आस जगाओ ....!!

11 July, 2014

धनक की आस बरसाओ ...!!

धनक की आस बरसाओ ,
मेघा बरसो सरसो
धिनक धिन 
बूंदों का ताल सुनाओ ,
धन धन भाग हमरे हो जाएँ 
धरा पर धान का धन बिखराओ 
आ जाओ जीवन हर्षाओ ....!!
मेरी धरा धारण करे धानी धनक ...!!

बेर भई अब ,
मेघा बरसो सरसो
धनक की आस बरसाओ ...!!

04 July, 2014

बरसो रे मेघा बरसो ....!!


बरसो रे  मेघा बरसो ....

धूप घनी ,
और
पीड़ा घनीभूत  होती है जब  ,
जीवन की

तपती दुपहरी में,
छाया भी श्यामल सी
 कुम्हलाती हुई ,

मन उदास करती है जब ,

अतृप्त प्यास से
तृषित है ....
धरणि  का हृदय जब ....
जल की ही आस
जीवित रखती है
हर सांस
तब,

कोयल की कूक में
हुक सी ......
अंतस  से
उठती है एक आवाज़  ...
बिना साज़....

बरसो रे मेघा बरसो ...!!




30 June, 2014

ओ मासूम ज़िन्दगी। ....!!

समय जब भी असमय
 छीन  लेता  है
कुछ मासूम चेहरों से
मुस्कराहट,
आवृत सा कुछ  होता है,
जो बनता है मौन ताकत   …… !!

धीरे धीरे कड़ी जुड़ती है ,
इस मौन ताकत में ,
प्राची के पट खुलते  ही ,
होने लगता है शोर
 इस ताकत का
तब टूटने लगता है मौन   …
उदासी का ...!

आहत  मन सुनता है
आहट जीवन की  …!!
और चल पड़ती है  ज़िन्दगी फिर......!!

तब सुनाई देती है ,
वही प्रार्थनारत आवाज़ें ,
अगर मेरे शब्दों में ताकत है
अगर मेरी प्रार्थना में बल है
तो दर्द लेकर भी ह्रदय में अपने,
सुनकर मेरे शब्दों की सदा ,
तुम्हें फिर उठना होगा ,
तुम्हें फिर हँसना होगा  …
ओ मासूम ज़िन्दगी। ....!!

30 May, 2014

राह कठिन ,है बिपिन घना ......!!




Ignite the lamp of my heart ....my soul .....!!O Lord .....don't let my prayers go unheard ....!!just hold me before I fall ......!!

राह कठिन ,है बिपिन घना ......!!
कोयल की कूक में कामना,
मोरी प्रीत का सेतु प्रार्थना ,
आरत का सेतु अराधना
साधक का सेतु साधना
श्याम  तुम तक पहुँचूं  कैसे  .... ?
मीरा की पीर झरे झरना ,
मन की हूक रचे रचना
राह कठिन ,है बिपिन घना ......!!

05 May, 2014

शाश्वत अस्तित्व जीना है .......!!

धूप और छांव
दो पहलू  जीवन के
 सुख और दुख जैसे
दो पहलू प्रत्येक  मन के,
संपूर्णता या समग्रता हेतु,
कोई मिथ्या बोध नहीं,
कोई अनुमान  भी नहीं ...!!
चिर स्थाई  सद्भावना के लिये
आवश्यम्भावी है ,
अत्यंत धैर्य से सुख को जीना ,
उतनी ही प्रबुद्धता से ,
प्रचुरता से ,
दुख की सतह तक पहुंचना ,
दोनों को जीना ,
दोनों का सत्य जानना,
समझना ...अनुभूत करना ,
और फिर
बिना परखे साथ चलना ,
सत्पथ पर हर पल ,
जैसे वायु  सदा साथ रहती है
पृथ्वी की सतह पर
जीवन देने हेतु ,
नदी की सतह पर
दिशा देने हेतु ,
एक सशक्त शक्ति  लिए,
न दुख में मुख मोड़ना है,
न सुख मे प्रभु भजन  छोड़ना है ,
...बस इसी तरह
साथ चलते हुए ,
आभास से प्रभास तक
प्रत्येक प्रात की  उजास सा
मेरी अनुभूति को
प्रकृति के प्रेम की तरह ,
अपना  शाश्वत अस्तित्व जीना  है .......!!


22 April, 2014

संवेदनाओं का पतझड़ है.…??

अडिग अटल विराट
घने वटवृक्ष तले
स्थिर खड़ी  रही
एक पैर पर
तपस्यारत
पतझड़ में  भी
एक भी शब्द नहीं झरा,
प्रेम से घर का कोना कोना भरा ,
मेरे आहाते में .....
मेरी ज़मीन पर ,
सारे वृक्ष हरे भरे,लहलहाते
चिलचिलाती धूप में भी कोमल छांव ,
यहीं तो है मेरे मन की ठाँव
हरीतिमा छाई ,
निस्सीम कल्पनातीत वैभव,
मन ही तो है-
तुम्हारा वास है यहाँ ,
समृद्ध है ........
कैसे कह दूं मेरे घर में
संवेदनाओं का पतझड़ है.…??

29 March, 2014

अनुकृति ...!!


आप सभी को बताते हुए अत्यंत हर्ष हो रहा है कि मेरा द्वितीय काव्य संग्रह पुस्तक मेले में ही बाज़ार में आ चुका है |प्रकाशन संस्थान ने छापा है |

इसमें प्रारम्भ में ही मैंने  बुआ जी की कविता दी है |
कवयित्रि -कुमारी लक्ष्मी वर्मा मेरी बुआ सम हैं । उन्होने शादी नहीं की |नेक दिल अपने उसूलों पर स्थिर ...!!इतना कुछ है उनके पास जो उनसे लेने का मन करता है |उनके पास बैठ कर ही कितनी ऊर्जा मिलती है !!
एम ए (हिन्दी)
जन्म-1 जून 1926 ।आर्य समाज मंदिर भोपाल में शिक्षिका थीं !
सिर्फ 12 साल की उम्र में बुआ जी ने यह कविता लिखी थी जब उनके गुरु जी ने कहा था स्मृति पर निबंध लिख कर लाओ और उन्होने कविता लिख डाली |
जब भी बुआ से मिलती हूँ ,हमारा आदान प्रदान का सिलसिला शुरू हो जाता है । मुझसे फरमाइश कर कर के ढेर सारे छोटे ख्याल सुनतीं हैं । राग काफी सुनाओ ,राग तिलक कामोद सुनाओ ,होरी सुनाओ। …!!

फिर वे अपनी कवितायेँ ज़रूर सुनाती हैं । और ख़ास तौर पर ये वाली कविता सुनाना कभी नहीं भूलतीं ।जब भी वे कविता सुनाती हैं ,उनकी आँखों की चमक देखने लायक होती है। ।!!एक बच्चा मन दीखता है आज भी उनके अंदर!!
इस बार जब बुआ से मिली ,लगा उम्र कुछ हावी हो रही है । बार बार पूछतीं ....''मैंने तुमको कविता सुना दी …?'' उन्हें याद दिलाना पड़  रहा था ''बुआ जी आप कविता सुना चुकीं हैं ।''फिर संतुष्ट होकर ,थोड़ी उदास होकर ,चुप हो जातीं । 
आज  भी बुआ जी की  दमदार आवाज़ में यह कविता सुनकर मन मौन से भर जाता है |उनके आशीर्वाद स्वरूप  यह कविता मैंने अपनी किताब ''अनुकृति '' में भी दी है। ।!!और अपने ब्लॉग पर  भी हमेशा हमेशा के लिए रखना चाहती हूँ |जिससे जब भी मन करे पढ़ सकूं।कविता पढते हुए उनके व्यक्तित्व को याद कर सकूं और उनसे अपने लिए भी उससे शक्ति लूं .!! ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ ,उनको लम्बी आयु दें ताकि बुआ जी का शुभाशीष  हम पर बरसता रहे । 
इस कविता में मेरी आदरणीय बुआ जी के भाव हैं जो मैंने  बड़े सम्मान से सँजोने की कोशिश की है !
हालाकि  ये भाव उदास करते  हैं मन को |किन्तु ये कविता उनकी सबसे पसंदीदा कविता है और इसको सुनाते वक़्त उनके चेहरे के भाव भी  पुरानी यादों से भरे चमक रहे होते हैं |इस कविता से बुआ जी को विशेष लगाव है |
उन्होने  अपनी माँ व भाई कि स्मृति में यह रचना लिखी !!


स्मृति ॰


तुम पूछ रहे थे मुझसे
जब मधुर याद बचपन की 
मैं ढूंढ रही थी मन में
दुख भरी घड़ी जीवन की 

भूले अतीत की स्मृति 
सोयी सी आज जगी सी 
मैं खोल रही थी निज को 
कुछ खोयी हुई ठगी सी 


वे दुर्दिन दुखमय रातें 
शशि तारे भी मुसकाते
अंकित हो मानस पट पर 
थे चित्रपटी से जाते 

क्योंकर वे याद मधुर हैं 
कैसे मैं आज बताऊँ 
क्या सोयी हुई व्यथाएं 
फिर से मैं इन्हें गिनाऊँ 


मैं नहीं बता सकती हूँ 
क्यों याद दुखती मुझको 
पर नहीं गिना सकती हूँ 
क्योंकर वे प्रिय हैं मुझको 

अस्फुट सी धुंधली  रेखा 
माँ तेरी खिंच जाती है 
नन्हें भाई की छवि तब 
हिय पट पर छा जाती है 

भाई का देख किलकना 
लख नभ पर शशि को हँसते 
झट मृदुल कारों का बढ़ना 
रो रो कर ऊपर तकते 

जब मचल गोद में आता 
मैं झट से उसे उठाती 
बहला मीठी बातों से 
मैं सुख विभोर हो जाती 

सरिता की मृदु लहरों में
पग पुलक पुलक कर धरना
शंकित हो मन में डरते 
माँ तेरा उसे झिड़कना 

बचपन की ये क्रीड़ायेँ
भाई की सुध मैं पाती 
सरिता की कल कल ध्वनि में 
अब उसकी सुधि है आती 

दो ही इन मधुर क्षणों में 
मैं तन्मय सी हो जाती 
निर्दय विधि की वे यादें 
माँ स्वप्ना भंग कर जातीं 

सुंदर सुकुमार अनुज का 
था रुक्म क्षीण मुख जिस दिन 
भय से शंकित थे हम सब 
माँ तू आदिर थी उस दिन 

वह शून्य रात्रि की बेला 
उर में थीं  कंपन करतीं 
निस्तब्ध नियति की घातें 
बन अश्रु दृगों में भरतीं

भाई का क्षीण मलिन तन 
था श्वेत शुभ्र शैया पर 
तू चौंक उठी मृगनी सम
छू घोर व्याधि का कटु क्षण 

उस बुझते से दीपक की 
उन तीव्र प्रकाशित रो में 
पागल सा तुम को लख कर 
रह गए अश्रु नयनों  में 

तेरे मूर्छित होने से 
क्या काल हृदय फटता है 
तुझको पागल ही सा लख 
क्या विश्व नियम टलता है 

भाई को खोकर भी यदि 
तू रखती जीवन अपना 
पर हाय तुझे भी खोकर 
हो गया आज सुख सपना 

उस कुटिल कराल करों नें 
तुझको ही आज जब लूटा 
रह गए चकित से तकते 
था हाय वज्र क्या टूटा 

शशि किरणे भी अब आकर 
सोयी वह व्यथा जगातीं 
पावस की झरती घालें 
मन अश्रुमेघ बरसातीं 

मैं रुष्ट कभी हो जाती 
अपने ही इस जीवन पर 
मन रो रो कर थक जाता 
अपने एकाकी पल पर 

मैं बचपन भूलूँ कैसे 
जब तेरी ही सुधि आती 
निस्संग और श्रत मन को 
माँ तेरी याद भुलाती 

बचपन की याद मधुर है 
पर है यह घोर मधुर पन
उस मधुर असीम मिलन में 
हैं चिर वियोग के कण कण ....

******************************



प्रकाशक महोदय  ने मुझसे कहा भी कि इसे आप इस कविता को आशीर्वाद स्वरूप न देकर अंतिम पृष्ठ पर दीजिये !!मर्मस्पर्शी कविता है |पर मेरा मन नहीं माना !मेरे भाव कुछ अलग सोच रहे थे !मुझे तो कविता कहती हुई बुआ जी कि वो झलक याद आती है ,उनका वो चमकता चेहरा याद आता है !!उस बुढ़ापे से झाँकता हुआ उनका  वो बचपन दिखता है  ....!!
कविता सुनाता हुआ उनका वो बच्चा मन दिखता  है !!
अब मैं ध्यान ये दिलाना चाहती हूँ कि ,ये कविता के भाव मेरे नहीं हैं |इसकी रचयिता मैं नहीं हूँ |कहीं कुछ गलत न समझ लीजियेगा!! मेरे पाठक ,मेरे प्रशंसक ,मेरे अपने भाई बंधु मुझे बहुत प्रिय हैं !और उनके कुशलक्षेम की मैं ईश्वर से सदा प्रार्थना करती हूँ |उनका मंगल ही मेरा हित  है !!सभ्यता, संस्कृति और भावना पर लिखने वाला कवि किसी का अमंगल नहीं चाह सकता !!कृपया मेरे भावों को अन्यथा न लें !मुझे ''अनुकृति "के लिए अपना स्नेह दें !!अपनी बात स्पष्ट करने का मन कई दिनों  से था जो आज फलीभूत हुआ !!इस कविता को मेरी बुआ जी की  कविता के रूप में  ही पढ़ें !!वे इसके लिए आदर और सम्मान की  पात्र हैं !
समय समय पर आप सभी की प्रतिक्रियाएँ मिलती रहती हैं जिससे लेखन समृद्ध होता है !जिसके लिए आप सभी का हृदय से आभर !!
मेरे भाव समझने के लिए पुनः आप सभी का हृदय से आभार !!


25 March, 2014

जय भारती के पूत आज !!


असंख्य दिव्य रश्मियाँ
खिली हुई प्रभास सी ,
हैं दिव्य यूं दिशाएँ भी
कि माँ तुम्हें पुकारती ,


फ़लक पे छा रहा है नूर
लक्ष्य भी खिले हुए

उठो सपूत बढ़ चलो
ये  पग हैं क्यों रुके हुए

माँ शारदा का हस्त भी
वृहद है यूं सपूत पर
कि गाओ मन के राग यूं
उदीप्त हों निखर ये स्वर....

खिले हुए कमल सी आज
खिल रही दिशा दिशा,
है ज्योत्सना प्रकाशिनी
सुदीप्त  है प्रखर निशा

के बढ़ चलो तरंग सी
निसर्ग की है रागिनी
के बढ़ चलो उमंग सी
देती है वीणा वादिनी ...!!

प्रबुद्ध मन का मार्ग है ,
खिला हुआ प्रशस्त भी
है सुरभि पुष्प की बही
समीर में उराव भी !!

धरा पे स्वर्ग लाने की
जो हमने तुमने की थी बात
है अब समय रुको नहीं
जय भारती  के पूत आज


है अब समय रुको नहीं
जय भारती  के पूत आज !!

21 March, 2014

कुछ पलाश के अनमोल पल दे जाता है ……!!

अबके बसंत बरसा है फाग ……
पलाश के रंग में भीगी हूँ इस तरह ,
लगता है शब्दों के अंबार पर बैठी हूँ मैं
यहाँ सब कुछ मेरा है
रूप अरूप स्वरुप ……
सब कुछ,
तुम्हारे शब्द भी मेरे हैं अब ,
तुम्हारे भाव भी मेरे हैं अब ,
 मेरा अपना एकांत,
और तुम से मिले मेरे अपने शब्द ...!!
किन्तु  बोध मेरा अपना ही ...
और तुम से सजी
मेरी प्रिय आकृति
आकाश  पर चलचित्र की भांति
छाया सी उभरतीं ,
खिल जाता है मेरा  एकांत ,
बरसाता है मुझ पर
मेरी ही पसंद के अनेक शब्द
पंखुड़ियों से
यूं करता अठखेलियाँ ,
छुप छुप कर झाँकता  है,
कभी पहुँच जाता है मुझ तक
कभी फिर छुप जाता है   ....
फिर कभी चुपके से आता है  …
कुछ सपनो के ,कुछ भावों के
कुछ पलाश  के अनमोल पल दे जाता है    ……!!


15 March, 2014

अबकी होरी ....(हाइकु )



प्रेम की बोली ,
रंग रंगीली होली
चन्दन रोली

सूर्योदय सी
उदित प्रमुदित
खिली आशाएँ

शुभ जीवन
राग अनुराग सा ,
खिला है मन

लाई प्रभास
किरणों की टोली
आई है होली

मन पलाश
ज्यों  अबीर गुलाल
है लाल लाल

शील संतोष
केसर रंग घोरी
अबकी होरी


शुभकामना
रंग माथे लगाऊँ
होरी रचाऊँ


है रंग रंग
सतरंग उमंग
बाजे मृदंग

रंग अबीर
गुलाल लाल लाल
मचा धमाल

भई पलाश
रंग गई मनवा
अबकी होरी


मन रसना
रंग भरे सपने
नैन बसना

रंग लगाऊँ
पलाश बोरी घोरी
अबकी होरी

भव सागर
पार करो श्यामा
भरो गागर

प्रीत चढ़ाऊँ
संग श्यामा के नाचूँ
फागवा गाऊँ

मन मोहन
मैं बांस की बांसुरी
उर आनंद

रंगी गुलाबी
ओढ़ी प्रीत पिया  की
खिला जीवन


बरस रहा
बादलों से फागुन
शुभ सगुन

गावन गुण
बरसता  फागुन
सरस मन  

13 March, 2014

तुम मुझे बहुत अपने से लगते हो

रुके हुए से शब्द
ढलक जाते हैं ...
अनायास ...
बिन मौसम भी
बरस जाते हैं नयन कभी ..
फिर भी क्यूँ
झरती हुई बारिश
आँख के कोरों पर रुकी हुई
नहीं दिखा  पाती है
हृदय के समुंदर में छुपे
कुछ  अनमोल  मोती ........!!
*************************************

अपने ही भीतर ढूंढती हूँ खुशी जब ,
तुम मुझे बहुत अपने से लगते हो ,
बंद है मुट्ठी मेरी,
सम्बल  है मेरे पास तुम्हारा ,
मेरे सभी अपनों  का ,
और बढ़ता  जाता है
रोज़ इसका दायरा ,
तभी तो 
दुख में भी
होती तो है बिन मौसम बरसात
फिर भी 
गिरते नहीं आँख से आँसू 
और सुख में 
हँसते हँसते 
आँख छलछला जाती है ...!!

..

25 February, 2014

मेरी पहचान ...!!



दीनता नहीं
ये पलायन का समय भी नहीं ...
ये समय है कर्मठता का
निर्भर हैं हम सब की आशाएँ तुम पर ...
निर्भर हैं हम सब की मुस्कान तुम पर ..
आश्रित ही हैं मेरी उपलब्धियां तुम  पर ,
तुम   संतति मैं प्रकृति ,
माता तुम्हारी ,
मुझमे ही हो तुम ,
और मुझमें ही दिखते हो कितने रूप में तुम ,
उठो अब वक़्त है ,
ऊंची भरो उड़ान .
परवाज़ दो अपने पंखों को ,
भरो उड़ान इस तरह ,
मेरे  बच्चों ,
गूंज उठे भारत का गौरव इस युग में ऐसे
कि  सृजन जीवित रहे  तुम्हारा सदा सदा ,
आँधी और तूफान से भी लड़ सको
कि हौसला बुलंद  रहे तुम्हारा सदा सदा !!




15 February, 2014

पलाश वन सा मन .....!!

याद आती है आज से कई साल पहले की वो दोपहर |मैं जबलपुर से सिहोरा जाती थी वहाँ के महाविद्यालय में अर्थशास्त्र  पढ़ाने !!शटल से सुबह सिहोरा जाना और दोपहर ढाई बजे की (मेल)ट्रेन से लौटना !सिहोरा जा कर पढ़ाना बहुत आसान तो नहीं था  ...!!बहुत छोटा शहर सिहोरा ,जबलपुर से 40 किलोमीटर !शटल से जाते थे और मेल ट्रेन से लौटते !!
घर लौटते हुए किसी न किसी बात पर कुछ चिड़चिड़ाहट सी बनी रहती थी |लेकिन ट्रेन में लौटते हुए दिखते थे ये पलाश के जंगल ....सुर्ख लाल रंग क्या होता है तभी जाना !नयनाभिराम सौन्दर्य आज भी बसा हुआ है आँखों में  |इतने सुंदर दिखते हैं और कुछ ईश्वरीय शक्ति भी निहित है इनमें .....मन का सारा क्लेश हर लेते हैं !!पलाश के दिन आते ही वही रंग याद आता है और लेखन उसी रंग में रंग जाता है ....!!कितना सुखद होता है कर्तव्यों को निभाते हुए भी अपने चंचल स्वत्व को बचाए रखना !!शायद पलाश की छवि अमिट  रह गई मेरे मानस पटल पर ......!!
अब सोचती हूँ ...,प्रेम में अधिकार न हो तो प्रेम निरर्थक  है .....!!ओ पलाश सच बताओ अगर तुम पलाश नहीं होते तो कैसे तुम्हारे प्रेम में रगती ...?... तुम्हारे प्रेम में बंधी ,कितने अधिकार से तुम्हारे सर पर अर्थशास्त्र का सारा बोझ रखकर ...रंगी रही पलाश के रंग में ....लिख पाई कुछ पलाश से रंगी रचनाएँ ...!!गा पाई कुछ पलाश में रंगे गीत ....!!बह पाई कुछ पलाश से भावों में बरसात के इन बादलों  की तरह ......जैसे मेरी बात ये प्रकृति समझ रही है और  रात भर से बरस रही है अपने प्रेम में फिर सबको भिगोने ....
पलाश तो रंग ही प्रेम का है

बहती हवा के संग उमंग
छा रही है मन पर ऐसी
घनीभूत पीड़ा हर जाती है
ये तरंग कैसी
रंग की बहार है
खिल गए असंख्य सुमन ,
आज है गगन मगन ........

ऐसा नहीं कि प्रेम मेरे लिए एक दिन का विषय है .....पर किसी भी बहाने से प्रेम की बात हो ,ज़रूर करनी चाहिए .......

13 February, 2014

हर रूप तुम्हारा ,मन भाया हुआ.....!!


पतझड़ में आस सा
भरमाया  हुआ
बसंत में पलाश सा
मदमाया हुआ
ग्रीष्म में प्यास सा
अकुलाया हुआ
वर्षा में उल्लास सा
हुलसाया  हुआ
शरद में उजास सा
फैला हुआ
शीत में उदास सा
अलसाया  हुआ
हर  मौसम में ,
हर रूप तुम्हारा,
मन पर छाया हुआ ,
मन भाया हुआ.....!!

05 February, 2014

मदमाया है अब बसंत ........!!


मन ने उमंग भरी ,तूलिका ने भरे रंग,
कोयलिया कूक रही ,बाजे है मन मृदंग ||

फूलों की चिटकन है ,रंगों की छिटकन है,
भँवरे की गुंजन है, छाया जो रंजन है !!

धूप में निखार आया रंग की बहार छाई ,
अमुआ की मंजरिया  देखो कैसी बौराई !!


पीत वसना धरती है ,धरती जो पीत वसन ,
धरती से अम्बर तक आया है अब बसंत !!

कंचन सी धूप खिली छाया है अब बसंत !!
सतरंगी चूनर, लहराया है अब बसंत
छाया है अब बसंत ....!!

राग है बहार संग मनवा है यूं मगन !
छेड़ो अब तान कोई ,लागी कैसी लगन,

प्रकृती में बिखरा चहुं ओर उन्माद है ,
हरस रही सरसों है प्रीति का आह्लाद है,

रंग है बहार है रूप का श्रृंगार है ,
खिलती हुई कलियों पर आया जो निखार है ...!!


सतरंगी ...पुष्पों  पर छाया है अब बसंत
मदमाती सुरभि लहराया  है अब बसंत ......!!

रोम रोम  पुलकित  ,मदमाया है अब बसंत ........!!