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10 October, 2014

आज फिर खिलकर, बिखरा पारिजात ....!!


अजस्र सौरभ सहस्त्रधारा ,
लाई वसुंधरा
नवल सौगात !!
मेघ घटाएँ छाई
गगन में
तिरता धवल चंद्रमा,
आई शरद-ऋतु की रात  !!

आज फिर उमगी मंजुल  चंद्रिका ,
बरसे नैसर्गिक आह्लाद ,
उपवन में मेरे
सुरभित दिव्य रास 
 खिलकर निखरा ,बिखरा पारिजात ....!!


11 comments:

  1. अति सुन्दर कविता.

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  2. बहुत सुंदर प्रस्तुति.
    इस पोस्ट की चर्चा, रविवार, दिनांक :- 12/10/2014 को "अनुवादित मन” चर्चा मंच:1764 पर.

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    Replies
    1. सादर आभार राजीव कुमार झा जी मेरी कृति को चर्चा मंच पर लेने हेतु !!

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  3. सुंदर प्रस्तुति।

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  4. बहुत सुंदर

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  5. Bahut hi sunder rachna .... Padh kar bahut accha laga ... Aapko badhaayi !!

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  6. खूबसूरत शब्दों का जादू .. बहुत लाजवाब ...

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  7. प्रकृति रच बस गई है आप में।

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