नमस्कार ....!!आपका स्वागत है ....!!

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26 December, 2010

अर्चना -(२०११ के लिए )

नवल -वर्ष की बात नवल हो -
जीवन में सौगात नवल हो -
नवल प्रभा से खिली हो उषा -
गौरव से मस्तक हो ऊँचा -

 सदा कर्मरत रहें हम सभी -
विजय पताका लहराए -
मधुर -सरस सुर गूंजे चाहूं दिस -
अनहद  नाद मन सुन जाए .

नवल स्पर्श हो खुशियों का -
ये गहराता तम हट जाए -
बंसी की  धुन सुन  कृष्णा की -
राधामय मन हो जाए -

प्रेम -पुष्प की सदा हो वर्षा -
सुरभिमय हो सबका जीवन -
यही अर्चना  प्रभु से मेरी    -
स्वीकार करो प्रभु मेरा वंदन......!!!!!


आप सभी को नव-वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं ..........!!!!

22 December, 2010

स्मृति .....!!

 कैसे कह दूं मन से अपने -
 बीत गयी सो बात गई -
 पड़ी अटल छब मनः पटल पर -
 मैं न जानू बात नई -

 रह -रह कर बीते दिन की जो -
 यादें मन पर छाई थीं-
 खटकाती थीं दरवाजा  -
 यादों का दीपक लायी थीं -
 आती थीं रह जाती थीं -
 न जाने की जिद लायी थीं -

 घने -घने हो जाते थे -
 छाये जो मेघा यादों के -
 छिटक , ढलक ,फिर बरस पड़े -
 जल -नीर नयन की राह लिए -



शीतल पवन भी मर्म पर मेरे -
ठंडक ही दे जाती थी -
मनः पटल पर स्मृति  की छाया -
और सघन हो जाती थी -

जीवन है तो चलना है -
जग चार दिनों का मेला है -
इक रोज़ यहाँ ,इक रोज़ वहां -
हाँ ----ये ही रैन -बसेरा है .....!!

मिलना और बिछड़ जाना -
ये जीवन की सच्चाई है -
अब कोई मिलता --फिर कोई बिछड़ा --
यादों की परछाईं है ...!!

सुख देकर मन दुःख क्यों पाता -
बात नहीं मैं समझ सकी -
कैसे कह दूं मन से अपने -
बीत गई सो बात गई ..........!!!!!!!!!!!!!!!!!!

27 November, 2010

धूप-- छाँव



उल्लासित जीवन जीने का -
सतत प्रयास करती रही -
कभी धूप 
कभी छाँव  के मौसम से -
निरंतर गुज़रती रही -
ज़िन्दगी से प्रीत निभाती रही .


छुप जाती थीं जब सूर्य की -
दिव्य उष्म प्रकाश की
अलौकिक रेखाएं -
आच्छादित थीं रवि -आभ पर -
छाँव  लाती हुई -
अलक सी घटायें -
ठगी सी निर्निमेष निहारती थी -
अपलक मेरी पलक -
वही अलक सी घटायें -
छाई थी मेरे मन पर क्यों -
कारी -कारी अंधियारी लाती हुई -
वही अलक सी घटायें -
उस पर दामिनी -
दमक- दमक कर -
मन डरपा जाती थी -
बीतते न थे-
पल-पल गिनते भी -
दुःख के करील से क्षण .....!!
मनन करता था मन -
करता था पुरजोर अथक प्रयास -
ढूंढता था तनिक आमोद-प्रमोद
आल्हाद और उल्लास ...!!


है यह नियति की परिपाटी -
सुख के बाद -
अब दुःख की घाटी
हर एक मोड़ जीवन का
ले लेता जैसे अग्नि परीक्षा -
पर हो कर्तव्य की पराकाष्ठा -
और अपने ईश पर घनीभूत आस्था -
हे ईश -ऐसा दो शीश पर आशीष
जी सकूँ निर्भीक जीवन -
वेग के आवेग से मैं बच सकूँ -
आंधी औ तूफ़ान से जब-जब घिरुं-
दो अभय वरदान अपराजिता बनू -




जब -जब पा जाता था मन प्रसाद -
विस्मृत हो जाते सारे अवसाद -
आ जाता जीवन में पुनः आह्लाद ,
और फिर जी उठता  प्रमाद ....!!
फिर वही गीत गुनगुनाती रही .........!!
ज़िन्दगी की रीत निभाती रही ..!
कभी धूप कभी छाँव के मौसम से-
निरंतर गुज़रती रही -
उल्लसित जीवन जीने का-
सतत प्रयास करती रही ........!!!
ज़िन्दगी से प्रीत निभाती रही ............!!!!!!

14 November, 2010

मेरा बचपन....!!


चहक उठती है
मन की चिड़िया -
महक उठती है
मन की बगिया-!

खिल उठता है
घर का कोना-कोना
जी उठता है
मन का कोना -कोना
बन जाती हूँ बच्ची मैं जब -
घर आते हैं बच्चे -
लौट आता है बचपन मेरा -
संग होते जब बच्चे -!!

है ये बच्चों का बचपन -
या मेरा बचपन -
या मेरा बचपन दोहराता हुआ -
मेरे प्यारे बच्चों का बचपन --

माँ -माँ करता गुंजित कलरव -
अमृत सा दे जाता है -
पीकर इसका प्याला -
मन हर पीड़ा दूर भगाता है --!

खो जाती हूँ रम जाती हूँ -
छोटी सी इस दुनिया में -
घर फिर घर सा लगता मुझको -
घर आते जब बच्चे-!!


13 October, 2010

पथिकवा रे ...अब कहाँ ...?

जीवन की सूनसान डगर में ..
बसता फिर अनजान नगर में ..
मील के पत्थर अनेकों ..
राह की शोभा बढाते ..
मधुर भावों से सुसज्जित ..
गीत तेरा साथ देते ...!!
बीच काँटों की पड़ी 
इस ज़िन्दगी में ..
फूल की माला बनाते ...!!

ढोल नगाड़े लेकर संग में ...
जंगल में मंगल करता चल ...
आगे ही आगे बढ़ता चल ...!!

जंगल में मंगल हो कैसे ..
गीत सुरीला संग हो जैसे ...
धुन अपनी ही राग जो गए ..
संग झांझर झंकार सुनाये ...
सुन-सुन विहग भी बीन बजाये ..
घिर-घिर बदल रस बरसाए ..
टिपिर- टिपिर सुर ताल मिलाये ...
मन मयुरवा पंख फैलाये ..
पुलकित व्योम सतरंग दिखाए ..
विविध रंग जीवन दर्शाए ...
जंगल में मंगल हो ऐसे ...!!
       धानी सी ओढ़े है चुनरिया ..
       संग तेरे ये कौन गुजरिया ..
        ले कर इसको -
         संग-संग अपने ...
         जी ले तू -
       जीवन  के सपने ..!!

ठौर ठिकाना लेकर अपना ..
बुनता है क्या ताना -बना ..?
मौन उपासना रख ले मन में ..
आग लक्ष्य की प्रज्जवल  उर में .. 
शक्ति है जब तेरे संग में ..
वक़्त की अंगड़ाइयों  को 
देखता क्या ..? 
तम से ही तुझको लड़ना है ..
रैनका सपना बीत चुका अब ..
आगे ही आगे बढ़ाना है ...!!
राह की कठिनाइयों से जूझता  ..
झूमता ..रमता ..चला जाता है ..
ओ  बटोही ..
पथिकवा रे ...कहाँ ...?
अब कहाँ ...?

13 September, 2010

पिया घर आये ......!!!-20



घोर प्रतीक्षा के दिन बीते -
आनंदित पल थे जो रीते --

मुखरित सी अब मूक विधाएं -
स्पंदनरत निस्पंद दिशाएं-



नैनन का कजरा भी बोले -

भेद जिया के पल-पल खोले -
श्लथ था मन अब अति हुलसाये -
धन धन भाग पिया घर आये ........!!!!!!!

08 September, 2010

आंसू या मोती ....!!-19


मीठे सुमधुर थे वो क्षण -
अब पल पल द्रवित होता है मन ....!
भूली बिसरी सी याद -
फिर कर गयी भ्रमण -
और भर आये नयन .......!

मनवा जब जब पीर पड़े-
तू काहे ना धीर धरे .....!
झर -झर असुअन नीर झरे-
इन असुअन का मोल ही क्या -
जब दुःख पड़ता तब-
आँखों से गिर जाते हैं-
नयनी तोरे नयना नीर भरे -
सयानी समझ -बूझ पग धरना -
मोती से इन असुंअन का -
मोल अनमोल समझना
अमिय की इस बूँद को -
नैनन में भर लेना ....!!
ह्रदय पीर बन जाये -
निर्झर नीर ...!!
नैनन से मन की गागर -
गागर जब बन जाये सागर ---
आंसू तब बन जाएँ मोती --
मोती फिर बन जाये माला -
और कविता रस का प्याला......!!

30 August, 2010

मौसम गाए--राग मारवा या मियां मल्हार ....!!!-18


झड़ -झड़ के पतझड़ --
सूना -सूना सा---
नीरव -नीरस सा
-
शांत सा --
कर देता था--

 वातावरण...... -
धरा मौन 
कर लेती थी धारण --
जीवन अग्रसर ....
साँसे फिर भी निरंतर ...
गूंजता था सन्नाटा --
बेचैनी बढ़ जाती थी ....
निराशा छाजाती थी ...
फिर भी ---
एक आवाज़ आती थी ..
पवन के साथ उड़ने की ....

टूटे -टूटेपत्तों के
 गिरने की ...
सूखे -सूखे पत्तों के 

खड़खडाने की ....
हस्ती मिट गयी थी जिनकी -
चिर निद्रा में विलीन -
धरा में लीन-
बन गए थे अवशेष...

रह गयी थी एक खोज --
एक भटकन शेष .....
पतझड़ है या..

 कोई राग मारवा गा रहा है ...!!!!

पतझड़ सावन या बहार -
हर मौसम के दिन

......चार-चार -
स्थिर सी

बाटजोहती थी पृथ्वी -
सगुन मनावत .......

कब नेह बरसेगा..
  मोरे आँगन --
नव पल्लवी का 

होगा आगमन ..
फूट पड़ेंगी

 नवल कोपलें.....
........कब .....................?
पड़ती जब मेधा की

 प्रथम बूँद --
तृषित थी धरा 

अब देख रही
 पलकें मूँद .....
आहा बीत चुका

 पतझड़ का मौसम -
आ गया सावन..
 मन भावन -
बरस पड़ी जब

 सुमधुर घटा--
बिखरी चहुँ ओर..

 मतवारी सी छठा--
रिमझिम रस बहार बरसे ॥
लेकर प्रियतम का प्यार बरसे ॥

भर -भर गीतों की फुहार बरसे ...
गा ले रे मनवा मधुर मधुर गीत ...
ये पल भी जाएँ तोरे न बीत ...
थम जाए बस समय की ये धारा॥
मौसम ने गाया राग मियां - मल्हार प्यारा .....!!!!!!!!!!!!!!!!!

14 August, 2010

दिल्ली का रोया दिल ....!!!!


पांच महीने के लम्बे अंतराल के बाद विदेश से अपने देश लौटने का आभास ही कुछ और था .अपना देश-- --लगता था पवन के झोंके के साथ किसी पुष्प की भीनी सी खुशबू मिली हुई है ...!! अपने लोग --परिचित से जाने पहचाने से चहरे .अपनी भाषा --लगता था बस बेधड़क हिंदी ही बोलती रहूँ .मन का झूला ऊँची ऊँची पींगें भर रहा था ...सभी चीज़ें कितनी सुहावनी लग रही थीं .मन में उमंग लिए गाते -गुनगुनाते मैं पहुँच गयी दिल्ली .परन्तु यह क्या ...?दिल्ली के हालात देख कर घोर आश्चर्य हुआ --पूरी दिल्ली की सड़कें खुदी पड़ी हैं ....ट्राफिक का इतना बुरा हाल ...?जगह जगह जाम ..पीं-पीं ....करता हुआ गाड़ियों का अनवरत शोर ....कैसी आपा-धापी मची हुई है ---हर शक्स आगे से आगे भागना चाहता है ..!!.........इसी पीं -पीं के शोर में दब गयीं हैं हर मनुष्य की भावनाएं ..........
पहुंची जब परदेस से अपने देस -
लागी मनवा को ये कैसी ठेस ....
मन मेरा --जीवन मेरा --
पीड़ा भी मेरी ही --!!
धर ली फिर एक गठरी -
सोच की सर पर --
बोझिल सा हो गया ह्रदय --
दिल्ली की हालात को देख देख मन रोया -
खुदा पडा सारा शहर - जाने फिर क्या क्या खोया --

कहाँ गए वो लोग ....?कहाँ गयी वो सभ्यता जिसका डंका पुरे विश्व में बजता है .क्या अपनी मातृभूमि की इस दशा के लिए हम स्वयं ज़िम्मेदार नहीं हैं ...??बचपन में कहीं पढ़ी हुई एक कविता की चन्द पंक्तियाँ याद आ गयीं --

''ये गंगा और यमुना नर्मदा का दूध जैसा जल-
हिमालय की अडिग दीवार और ये मौन विन्ध्याचल-
बताती है आरावली की हमें यह शांत सी चोटी-
यहीं राणा ने खायी देश हित में घांस की रोटी -
अगर इन रोटियों का ऋण चुकाना भी बगावत है -
तो मैं एलान करता हूँ की मैं भी एक बागी हूँ ................!!''

आज के परिपेक्ष में यही बात खरी उतरती है .कुछ बागी लोगों की ही अब देश को ज़रुरत है ..मौन रह कर सहन करना उचित नहीं है ....जन जन में जागरूकता लानी चाहिए ....!!!
जय हिंद .

02 August, 2010

अनुभूती-17

बढ़ता जाता धीमे -धीमे -
जीवन ऐसे ----
अनुभूती --शबरी के खट्टे -मीठे
बेर हों जैसे ॥





सर-सर करती-
सन-नन चलती -
तेज़ हवाएं --
यूँ सम्हल न पायें
मन का घूंघट -
उड़ा ले जाएँ --
चेहरा सबका साफ़ दिखाएँ --

दृष्टि मेरी जीवन पूँजी -
सृष्टि की नवरचना देखूं -
बंद नयन था जीवन सपना -
खुले नयन -जीवन सच देखूं ....
कोई अपना सा बनता पराया -
कोई पराया सा बनता कुछ अपना --
बढ़ता जाता धीमे धीमे जीवन ऐसे -
अनुभूती शबरी के खट्टे मीठे बेर हों जैसे

23 July, 2010

झर- झर ......मनहर ..!!-16

झर -झर प्रमोद -
कल -कल निनाद --
झिमिर -झिमिर मन --
तिमिर तिमिर तोड़ --
झर -झर मनहर
झरता ये झरना -
प्रकृति की अनुपम रचना ॥

झुरमुट सी झाड़ियों में -
सूनी सी वादियों में -
झर -झर मनहर ---
हर्षित प्रफुल्लित मुदित --
गुंजित अद्भुत संगीत --

जल की कल -कल करती -
मचलती सी राग --
भर अतुलित अनुराग --
है सुर -ताल का सुमधुर संवाद -
या कृष्ण -गोपियों का --
रसिक रास ..........!!
झर- झर मनहर --
बूँद -बूँद प्रेम -रस विभोर .....!
किलक-किलक थिरकत --
नाचत मन मोर --झर झर मन हर -
झरता ये झरना ----
प्रकृति की अनुपम रचना .....!!!!



16 July, 2010

वट-वृक्ष-15





अडिग अटल विराट -
वृक्षों का सम्राट ...!!
सदियों से -धरा पर मौन खड़ा  -
जीवन चलचित्र देखता -
यह वट वृक्ष ...!!!





घनी -घनी छायाहै इसकी -
आस्था सा पक्का चबूतरा -
आशा और विश्वास के-

कच्चे धागों से लिपटा ....!!

वक्त का चक्र चलते -चलते ,
कहाँ से कहाँ तक -------

पर कहता सदियों पुरानी-
अपनी वही कहानी .....

कैसे आज भी --
सुहाग की थाली सजाये -

नैनन में कजरा - माथे पे बिंदिया -
मांग में प्रियतम का सिन्दूर --

अपर्णा के साथ वटवृक्ष पूजन ...!
नाक में छोटी सी नाथ --
सर लिहाज़ से ढका हुआ --
अलबेली नार कर श्रृंगार--
सकुचाई सी खड़ी--
वट पूजने को ..........!!!!!

सावित्री का तप उज्जवल -सार्थक है ..
सत्यवान का सत्य -जीवन शाश्वत है ...!!!!

14 July, 2010

जियरा -14



उड़ता -फिरता बादल की तरह -
फैला जीवन है कठिन बड़ा -

रागों की माला मैं कैसे गाऊँ ?
लोरीकी धुन भूल न जाऊं -

मोम सा पिघलाव ह्रदय में -
विस्तृत अम्बर ममता का आंचल-

लालन निहारन तरस रहा जियरा -
नैना बदरी बन बरस रहा जियरा -

08 July, 2010

सागर की व्यथा ...!!-13


एक बूँद पहुंची सागर घर -
हाल-चाल सागर का लेने -
देख- अचंभित ..!!खड़ी मूर्तिवत -
सोच रही यूँ मन में अपने -
बूँद- बूँद से तो सागर बनता -
बनकर सागर भी सागर-
फिर व्यथित क्यों रहता ....?

कहने लगा हंसकर सागर फिर -
विस्तार तुमने देखा -
विस्तार तुमने जाना -
विस्तार तुमने लिया -
सभ्यता तुमने पाई  -
व्यथा भी तो देखो ......
प्रकृति के नियम का -
परिणाम भी तो देखो --

बूँद एक पल को मुस्कुराई -
जब बात समझ में आई -
कहती है सागर से फिर वो-
बुलबुला है मन का -उठता है -
फूट जाता है ----
क्षण भर का आवेग है -
आता है चला जाता है --
सागर सा विस्तार अगर है --
फिर सागर को क्या डर है ॥?

सह जाए प्रारब्ध --
उसे तो सहना है --
मंथन कर ढेरों विष -
फिर अमृत ही बहना है --
अमृत ही बहना है ........!!!!!!

30 June, 2010

सागर सा विस्तार ...! -12


दूर -सुदूर ...क्षितिज तक व्यापक ---
सागर का विस्तार .....!
लहर -लहर लेहेरों में छिपाए -
अनगिनत मोतियों के हार ....!!

तट पर खड़ीखड़ी मैं देखूं -
उद्वेलित चंचल लहरें --
दौड़ -दौड़ कर भाग -भाग कर --
जीवट जीवन जी ही लें....!!!!!


दूर से दिखती हुई ..आती हुई .....
भर भर के उन्माद ..उत्साह ,उल्लास....
फिर आकर मेरे पास ....
ले जातींहैं ,

तलुए के नीचे की ,
वो ठंडी ठंडी रेत .......!
दे जाती हैं -उसी स्पर्श से -
जीवन जीने का सन्देश .....!!

देने की भावना से ओतप्रोत -
लेने की भावना से भी ओतप्रोत -
ले जाती हैं उसी स्पर्श से-
कटु अनुभवों का -
जीवन का एहसास --
दे जाती हैं उसी स्पर्श से -
उन्माद,उत्साह , उल्लास ....!!

रहे सदा ही प्रभु -कृपा --
यही रूप सागर का देखूं --
इतना ही बल देना प्रभु -
बल सबल बने --
क्रंदन न बने --
किसी की मुस्कान बने -
आंसू न बने ....
गुण सद्गुण बने अवगुण न बने --
जोश छल कर ..आक्रोश न बने ....
यही रूप सागर का देखूं --
देखूं सागर का विस्तार --
सागर का विस्तार -
मैं ले लूं सागर से विस्तार --
ले जाऊं मैं विस्तृत नभ से
विस्तृत सागर सा विस्तार ...!!!!!!
सा...गर...सा.....विस्तार..........!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

24 June, 2010

जीवन उत्सव .....!! -11

बुरा न देखूं --बुरा न सोचूँ ॥
मीठा बोलूँ --सुमधुर गाऊँ ॥
अच्छा ही लिख लिख कर -
अपना मन बहलाऊँ ॥

राम -राम रट -रट कर -
मरा -मरा पर विजय पा जाऊं ॥
मन का रावन मार गिराऊँ -
विजया दशमी रोज़ मनाऊँ ॥

मंगल गान मैं नित -नित गाऊँ
जीवन उत्सव की कामना तो-
जीवन उत्सव ही कहलाये -
जीवन उत्सव ही बन जाए ॥

20 June, 2010

मृगमरीचिका नहीं --मुझे है जल तक जाना -10


दूर दीखता निर्मल पानी
चमक देख मन में हैरानी
चमकीला सा पानी
जाकर झट पी जाऊं
अटक -भटक थी मेरे मनमे
प्यास बुझाऊँ --


पृथ्वी की गति -वेग न पाऊँ---
भाग भाग फिर मैं थक जाऊं-
मैं रुक जाऊं -
चंचल मन में मोह था मेरे -
फिर उठ जाऊं -


पृथ्वी की गति -वेग न पाऊँ -
भाग- भाग फिर मैं थक जाऊं-
मैं रुक जाऊं  .....!!!!
जीवन का यह चक्र -
समझ में पल ना आता -
काम -क्रोध-मद -लोभ से --
मेरा मन भरमाता --

 मित्थ्या पीछे चलते- चलते  -
जब मैं थक कर   हार गयी -
तब समझी मैं--- मार्ग मेरा क्या -
निश्चित अब पहचान गयी -


जाग गयी चेतना --
अब मैं देख रही प्रभु लीला --
प्रभु लीला क्या -जीवन लीला ....
जीवन है संघर्ष तभी तो --
जीवन का ये महाभारत --

युध्ह के रथ पर --
मैं अर्जुन ...तुम सारथी मेरे ..
मार्ग दिखाना -
मृगमरीचिका नहीं ---
मुझे है जल तक जाना ...!!!!!!

17 June, 2010

सावन रीता .....बीतत जाए ...!!!!!-9











छाई चहुँ ओर घोर- घोर --
घन घटा निराली --काली काली ॥
उमड़ घुमड़ कर --गरज -गरज कर
बरस पड़ेंगे घनघोर -मृत्यु के बादल -
जाने किस पल किस पर.......?
क्षणभंगुर जीवन ..........!!!!!!!
भोला मानुस उछल पडा -
मौसम मनमोहक देख कर -
काले बादल को देख कर -

सावन की थी छटा निराली -
जीवन सावन था उसका ---
प्रीत पिया संग ऐसी उसकी --
कोमल यौवन --उज्जवल सा मन था उसका ....


चेहरा अंचरा बीच छिपा के ॥
जाने ढूंढे कौन पिया के -
नैना रो-रो नीर बहाए -
सावन रीता बीतत जाये .......
बी ....तत.........जाये .......बी ..........तत ................................................................................................................

15 June, 2010

सुकृती----पहचान मेरी -8

देखती थी आइना फिर सोचती थी
कौन हूँ मैं ..?क्या करूँ मैं ....?
कुछ करूँ मैं...... कुछ बनूँ मैं .....!!
कुछ बने पहचान मेरी ......!

खिली -खिली मन की बगिया -
तितली बन जाऊं .....?
अद्भुत सुंदर जीवन ....!!!!
फिर भी चैन न पाऊँ ।

सांझ ढले मंदिर का दीपक
रोज़ जलाऊँ ...
प्रभु चरणों में शीश नवाऊँ -
चैन न पाऊँ...

कर्म रथ पर--
जीवन पथ पर --
कर्म निरंतर करते करते -
धन ये पाया --
देखा मैंने --- आकृती है साथ मेरे --
मेरी छाया.......!!
डोर थी एक मन में मेरे -
जोश था वो साथ देता ...
खींच लाइ मन को मेरे-
बन गयी फिर एक काया ...!!

आकृती से स्वकृति ---
फिर सुकृती ...
बन गयी पहचान मेरी ...!!!
देखती हूँ आइना अब सोचती हूँ ---
सुकृती ---पहचान मेरी !!!!!!!
सुकृती- पहचान मेरी !!!!!!!!!!!

14 June, 2010

सरोज ....खिले कमल सी ..---मेरी माँ -7




तुम को खो दिया तो जाना-
मिट गयी जो -देह थी वो --
छब अभी हैमन में मेरे --
आत्मा है -माँ तुम्हारी --
साथ मेरे


नित नई क्रीडा कराती ---
लिख सकूं जो जी में आये---
गा सकूं जो गीत अब मैं -
छब तुम्हारी साथ मेरे -
नित नयी क्रीडा कराती ..


एक छोटी सी नादान कली थी मैं .
आप ही ने पुष्प भी मुझको बनाया .
पुष्प बनकर भी अगर गंधहीन थी मैं .
आप ही ने सुरभिमय मुझको बनाया .


आप ही ने मेरे पथ के -
अनगिनत कांटे बटोरे .
ज्ञान से आलोकित ह्रदय कर -
अज्ञानता के साए बटोरे.

आपके इस प्रेम को मैं क्या कहूं ?
शब्द नहीं हैं भाव की अभिव्यक्ति के .
आपकी ममता की मैं हूँ चिर ऋणी --
चलती जाऊं बढ़ती जाऊं---
राह में -मैं आपके .


13 June, 2010

जीवन -ज्योत बनी पहचान -6

जीवन पथ पर--
कितना रोका जग ने मुझको -
रुक न पाई--
मैं अलबेली झूम -झूम के -
नाची गाई ॥!!

जीवन की ऋतू बदल बदल कर
चलती जाती--- --
कभी हवा फिर कभी धूप-
पर मैं मुस्काती !!!!

गाने की इच्छा ज्यों बढ़ती
जीवन की लौ आंचपकडती -
वही दिया था मन का मेरा --
जलता जाता---
जीवन ज्योत जलाती जाती -

चलती जाती धुन में अपनी
गाती जाती बढ़ती जाती -

मंद मंद था हवा का झोंखा
हलकी सी थी तपिश रवि की
वही दिया था मन का मेरा -
जलता जाता--
जीवन ज्योत जलाती जाती -
चलती जाती धुन में अपनी -
गाती जाती बढ़ती जाती -


फिर ऋतू बदली ....
जीवन बदला .......
कड़ी धूप....! मैं खडी धूप में .....!!.
मन मुरझाया .........
शीतल जल की चाह को
मेरा मन अकुलाया ....
बिसर गए वो गीत थे मेरे ...
फीकी सी पड़ती मुस्कान ............
धीमा सा सुर धीमी सी गति -
जीवन - ज्योत बनी पहचान -

एक घनेरी छाया ढूँढू -
बैठ करूँ मैं कुछ विश्राम --
मंदिर की घंटी सुन जागी -
जीवन -ज्योत बनी पहचान
श्रवण श्रुति सुन नींद यूँ भागी ....
आ गए फिर मन में प्राण ...!!!!
लौट आई फिर वो मुस्कान ......
साध लिया अब मन को मैंने -
जीवन ज्योत बनी पहचान -

जीवन क्या है ------
रैन बसेरा .........
फिर वो बदला ....फिर वो बदला ...
साध लिया अब मन को मैंने
जीवन ज्योत बनी पहचान!!!!!!!!

गाती जाऊं फिर मैं गुनगुन -
लौट आई है वो मुस्कान---
जीवन ज्योत बनी पहचान !!!!!!!!!!!!!!!
जीवन ज्योत बनी पहचान !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

12 June, 2010

सपनो से है प्यार मुझे -5

पूछ रही थी -
मैं सपनों से-
रोज़ -रोज़ ये क्यों दिखते हो ?
क्यों आते हो रोज़ -रोज़ ये ....
मुझे रुलाने ???
फिर देखे ये नन्हे नन्हे कोमल-कोमल --
पौधे जैसे छोटे छोटे --
कब से मन में थे जो मेरे ---
कब उपजे थे ...........????
बरसों बीते ----
जब उपजे थे ,तब उपजे थे ---
अब अंकुरित हुए हैं !!!!!
खुश हो सोचा --
जो है सो है ----
है तो मेरे ....!!!
इन्हें सुधारूं इन्हें सवारूँ इन्हें सजाऊँ .......
रोज़ रोज़ फिर सीचूं इनको -
इन्हें ही गाऊँ ---
सपनो को गाने लगी जब ----
गाने लगी गीत सपनो में ---
बुनने लगी ख्यालों को मैं ----
गाने लगी गीत सपनो में ....
गीत से प्रीत
प्रीत से रीत
रीत से प्रीत
प्रीत से फिर गीत
दृढ प्रतिज्ञ --
गाते गाते अब मैं समझी -
सपनों से था प्यार मुझे --
सपनो में मैं चलते -चलते कभी न थकती
गाते -गाते कभी न रूकती
दृढ़ प्रतिज्ञ ---
गाते गाते अब मैं समझी ---
वही प्रीत अब रंग लायी है ---
सपनो से हो प्यार अगर तो ---
निश्चित सपना सच होता है!!!!!
सपनो से हो प्यार अगर तो ---
सपना सच हो जाता है !!!!!!!!!

11 June, 2010

एक मुट्ठी आसमान -4


 भर ली मैंने   इस
 उन्मुक्त गगन में --
 एक छोटी सी उड़ान-
 पा लिया मैंने जैसे --
 एक मुट्ठी आसमान --

सपना सा साकार हुआ --
फिर जीवन से प्यार हुआ-
 बीत चली फिर जीवन की विभावरी -
 नन्हें पंछीके मन जागी उतावली-

नन्हे नन्हे पंख जो आये-
छू लूं उड़ उड़ आसमान
भोर भई अब फिर उड़ चलूँ -
छूलूं उड़ उड़ आसमान -



मन पुलकित तन पुलकित-
पुलक उठी ज्यों वसुंधरा-
जैसे खेतों की हरियाली -
मन भी मेरा हरा -भरा ---



ओस की एक बूँद से-
जैसे प्यास बुझीमेरी -
नन्हें पंछी की उड़ान से -
तृप्त हुई मैं -----

सपना है या सच है ये ---
हाँ -हाँ सच में ---
भर ली मैंने --
इस उन्मुक्त गगन में --
एक छोटी सी उडान --
हाँ हाँ सच में ----
पा लिया मैंने एक मुट्ठी आसमान !!!!!!!!!!!
पा लिया मैंने एक मुट्ठी आसमान!!!!!!!!!

24 May, 2010

मुझे भगवन दिखे

पति की मलेशिया पोस्टिंग होते ही दिल्ली में सब छोड़ मैं एक अच्छीपत्नी की तरह उनके साथ चली तो आई पर एक हफ्ते में ही वो सारा खुमारजैसे जाने सा लगा. अनायास ही घर की याद सताने लगी .कभी बच्चे ,कभी पापा , कभी बगीचा ,कभी मेरा कुत्ता-मेरा प्यारा टिम्मी , कभी मेरी संगीत क्लास्सेस ----अब उदास होने के लिए बहुत कुछ था मेरे पास .एक अजीब सी चिढ मेरे अन्दर घर कर रही थी .होटल में रहते हुए बड़ी बेगानी सी ज़िन्दगी लग रही थी घर की तलाश भी जारी  थी .अभी हम होटल में ही रुके हुए थे .परन्तु इन दस -बारह दिनों में ही मेरा स्वाभाव कुछ चिड़चिड़ा  सा होने लगा था.नये लोग ....नयी जगह ...जिससे मिलूँ वही फॉर्मल सी बातें...एक के बाद एक जैसे वही प्रश्न ......और मेरे चेहरे  पर एक फीकी सी  मुस्कान ....

ईश्वर पर बहुत विश्वास है मुझे .और ईश्वर का आभास मुझे हो जाता है.मुझे लगता है कोई शक्ति है जो मुझे दिशा दिखाती है.उस दिन भी एक अजीब सी खीज से घिरी मैं होटल की लोब्बी में बैठी ड्राईवर का इंतजार कर रही थी .समय जैसे काटे नहीं कट रहा था .सोचा चलो किसी मॉल में जा कर ही समय गुज़ारा जाए .लोब्बी में बैठी मैं सोच रही थी दिल्ली में तो समय की इतनी कमी थी यहाँ समय ही समय है . मैं यहाँ आई ही क्यों -मैं यहाँ कैसे रहूंगी -और न जाने कितने ही उलटे विचार मेरे मन में आने लगे .ड्राईवर ने भी मुझे जैसे खिजाने की ही सोच रखी थी .उसका इंतजार करते करते गुस्सा और बढ़ने लगा .तभी देखा एक बड़ी सी बस होटल के बाहर आकर रुकी .उसके पीछे का दरवाज़ा खुला और किसी जादू की तरह एक के बाद एक दस -बारह विकलांग व्हील चेयर पर बस में से उतर कर लोब्बी में आ गए इतने अच्छे से अपनी व्हील चेयर खुद ही चला कर होटल के अन्दर आ गए .अपनी भावना भूल कर हतप्रभ सी मैं उन्ही में खो गयी -वो दृश्य ही ऐसा था .सभी विकलांग--इतने साफ़ सुथरे !!स्वच्छ कपडे पहने हुए ---किसी का एक हाथ काम नहीं करता था तो किसी का एक पैर -कोई मूक कोई बधिर -पर सभी में एक चीज़ समान थी--उनके चहरे के भाव --सभी के चहरों पर एक कोमल मुस्कान विद्यमान थी और एक दूसरे को देख कर बहुत खुश होकर हंस हंस करअपनी अपनी तरह से अपनी  बात कह रहे थे .

साक्षात  इश्वर के दर्शन मैंने उन्हीं लोगों में किये .किसी प्रकार की कोइ कमी का एहसास उनके चहरे पर नहीं था .भरमुठ्ठी ख़ुशी बाँट रहे थे एक दूसरे को .मुझे अपनी कमी  का एहसास हुआ .सब कुछ होते हुए भी मैं विचलित क्यों हूई ?मेरा दृष्टिकोण नकारात्मक क्यों हो गया था ?क्यों शारीरिक स्वास्थ्य भरपूर होने के बावजूद हंस कर दो शब्द बात नहीं कर पाते हम ...?सहज क्यों नहीं रह पाते हम ...?

तब लगा उन्हीं के बीच से उड़ती हुई सकारात्मकता मेरे पास आ गयीहै .उन्हीं के खिले खिले चेहरों की मुस्कान मेरे पास आ गयीहै .मैं सोचने लगी --क्या मैं विकलांग नहीं हूँ --मेरी मानसिक विकलांगता शारीरिक विकलांगों ने दूर की .तभी मुझे लगा हर इंसान के अन्दर एक विकलांग है ------

ईश्वर ने तब ये सन्देश दिया------दुखी रहने का सामान मत एकत्रित करो,खुश रहने के बहाने ढूँढो .और तभी मेरी गाड़ी भी आ गयी .मेरी धरोहर -मेरे अन्दर की खोई हुई कृतज्ञता- मुझे वापिस मिल गयीथी . मैंने ड्राईवर से कहा-"मंदिर चलो!!!!!!!!!!!!...I mean take me to some Indian temple please..!!"

13 May, 2010

नई सुबह -3

  अँधेरे कमरे की
  खिड़की से-
  देख रही थी मैं--
 प्रकृति का करिश्मा....!! ,
 व्योम को निर्निमेष निहारती-
 देख रही थी-
 रात के अंधरे को
  जाते हुए ....
  अरुणिमा को-
पृथ्वी पर आते हुए........!!


भाग रही है पृथ्वी निरंतर 
कुछ पाने को 
क्या पाने को ?
हर पल, पल खोते हुए !!
फिर भी ----
सुबह के आने को
 कौन रोक सकता है ?
सूरज की आभा को
 कौन रोक सकता है ?

बंद हों मन के द्वार -
फिर भी ---
सुबह के आने को
 कौन रोक सकता है ?
सूरज की आभा को-
 कौन रोक सकता है ?

सूरज की पहली किरण से
मन की सरिता में
 स्पंदन हो ही जाता है ---!
निष्प्राण निस्तभ्ध शरीर में
 प्राण आ ही जाते हैं .....!!-
उठो जागो-
 खोलो मन के द्वार ----
एक नई सुबह ने
घूँघट खोल दिया है-
नई  सुबह का आगमन हो चुका है ......!!!!!!

22 April, 2010

पलट गए पन्ने-2

पलट गए पन्ने -
और ....
आगे बढ चला जीवन -
जैसे रेत पर बने-

पैरों के निशान मेरे -
पलट कर देखती हूँ ....

सोचती हूँ -
क्या दिया क्या लिया ....-
क्या कुछ छाप छोड़ी ?
क्या पलभर भी 

कोई मुझे -
याद रख पायेगा ?
या सदियों से -

आ रही परंपरा 
कायम रह जायेगी -
विस्मृत सी पड़ जायेगी 

मेरी स्मृति -
धूमिल सी पड़ जाएगी

मेरी छब........!!!

05 April, 2010

मन की सरिता-1

मन की सरिता है
भीतर बहुत कुछ 
संजोये हुए ..
 कुछ कंकर ..
कुछ पत्थर-
कुछ सीप कुछ रेत,
कुछ पल शांत स्थिर-निर्वेग ....
तो कुछ पल ..
कल कल कल अति तेज ,
 मन की सरिता है ,



कभी ठहरी ठहरी रुकी रुकी-
निर्मल दिशाहीन सी....!
कभी लहर -लहर लहराती-
चपल -चपल चपला सी.....!!
बलखाती इठलाती .. ...
मौजों का  राग सुनाती ....
मन की सरिता है.

फिर आवेग जो आ जाये ,
गतिशील मन हो जाये -
धारा सी जो बह जाए ,
चल पड़ी -बह चली -
अपनी ही धुन में -
कल -कल सा गीत गाती  ...
राहें नई बनाती ....,    
मन की सरिता है -

लहर -लहर घूम घूम--
नगर- नगर झूम झूम
छल-छल है बहती जाती ..
जीवन संगीत सुनाती -----
मन की सरिता है !!!