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05 April, 2010

मन की सरिता-1

मन की सरिता है
भीतर बहुत कुछ 
संजोये हुए ..
 कुछ कंकर ..
कुछ पत्थर-
कुछ सीप कुछ रेत,
कुछ पल शांत स्थिर-निर्वेग ....
तो कुछ पल ..
कल कल कल अति तेज ,
 मन की सरिता है ,



कभी ठहरी ठहरी रुकी रुकी-
निर्मल दिशाहीन सी....!
कभी लहर -लहर लहराती-
चपल -चपल चपला सी.....!!
बलखाती इठलाती .. ...
मौजों का  राग सुनाती ....
मन की सरिता है.

फिर आवेग जो आ जाये ,
गतिशील मन हो जाये -
धारा सी जो बह जाए ,
चल पड़ी -बह चली -
अपनी ही धुन में -
कल -कल सा गीत गाती  ...
राहें नई बनाती ....,    
मन की सरिता है -

लहर -लहर घूम घूम--
नगर- नगर झूम झूम
छल-छल है बहती जाती ..
जीवन संगीत सुनाती -----
मन की सरिता है !!!

8 comments:

  1. मन की सरिता का वेग आवेग बहुत पसंद आया

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  2. गुनगुनाने लायक एक बहुत ही अच्छी कविता.


    सादर

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  3. रचना का कल कल ,छल छल प्रवाह और सरिता का छल छल , कल कल प्रवाह मन में मधुर संगीत घोल गया.

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  4. रचना का कल कल ,छल छल प्रवाह और सरिता का छल छल , कल कल प्रवाह मन में मधुर संगीत घोल गया.

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  5. मन की सरिता...मन में बस गई,
    प्यारी सी म्रदुल भावों को छू गई...

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  6. कल 01/11/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  7. man ki sarita aisi hi hoti hai
    aisi hi bahti hai
    nischhal
    nirjhar
    kalkal
    jhamjham
    man ki sarita...

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  8. हलचल के जरिये आया हूँ
    सरिता की लहरों के
    साथ बहता चला गया
    बहुत ही अच्छी रचना... !

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