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22 November, 2011

तुम मेरी पहुँच से दूर क्यों हो ..?

प्रभु मैं हूँ -
तुम्हारी ही कृति  .. ..
मनुष्य रुपी ये तन ..
और गुण- अवगुण से भरा मन .......
तुम्हीं ने तो दिए ...
प्रसाद रूप मैंने ग्रहण किये ...!


इन्हीं को साथ ले कर...
चलती हूँ मैं......
तुम्हारे पास पहुँचने  का...
मन है ...मेरा ...
और अब यह भी प्रण है मेरा .. 
तुम्हारी इस कृति से ...
सुकृती बनना है मुझे ... 
तुम तक  पहुँचना है मुझे ..!!

राह दिखती है ..
तुम तक पहुंचती हुई..
और फिर मुड़ जाती है ... !!
ये कैसे असत्य के
घेरे से घिर गयी हूँ मैं ... .....
कितनी ही कोशिश कर लूँ ..
तुम तक पहुँचने की ...!!
तुम मेरी पहुँच से दूर क्यों हो ..?
क्या  पात्रता  नहीं  है मुझमे ..?
मेरी आहत नाद की अर्चना ...
मेरी अनाहत नाद की आराधना ...
शायद मेरे सत्य में...
मेरे कत्थ्य में ..
अभी भी वो 
तत्थ्य नहीं ..वो सत्य नहीं ...
जो तुम तक पहुँच सके......!!
मोड़ बढ़ते ही जाते हैं ..
जीवन यात्रा चलती ही जाती है ..
अंतहीन ...अनवरत ..निरंतर ...
किन्तु अटल विश्वास है ..
तुम पर ...स्वयं पर भी ..
खोज लूंगी वो निधि एक दिन ...
तुम तक पहुँचने की विधि एक दिन ...!!


मन  चिंतन ...
घिरी हुयी विचारों से ...
अब सोचती हूँ...
दीन हीन मलिन ...
शबरी में थी ..
कैसी ..भक्ति..आसक्ति ...
कैसी वो अदम्य शक्ति ....!!
खिला सकी प्रेम वश ..
अपने जूठे बेर भी तुम्हें ...
आज ..
भले ही वो युग नहीं है ...
पर सबकुछ तो झूठ
अभी भी  नहीं है ...
दमकती है ..चमकती है ...
दूर ....एक किरण ...

अभी भी दिखती है-
निश्छल मुस्कान...
कुछ चेहरों पर...
कुछ सत्य बाकी है ..
निश्चित ही धरा पर ... 
देता है नवचेतना ..
ये उगता हुआ सूर्य मुझे ...
चलना है चलना है ...
चलते ही जाना है ...
 जीवन पर्यन्त..
प्रयत्न करते रहना है ....
त्याग  कर असत्य का ..
ये  ताना-बाना...
सशक्त सत्य को खोजते हुए .. 
तुम तक पहुँचना ही है एक दिन ...!!


कुछ  समय  पूर्व परिकल्पना पर छपी थी ये कविता आज इसे ब्लॉग पर डाल रही हूँ | 

36 comments:

  1. तुम्हारी इस कृति से ...
    सुकृती बनना है मुझे ...
    तुम तक पहुँचना है मुझे ..!!
    usi raah per ho, prabhu ne kaha , use suna

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  2. ये चिंतन कितना सुन्दर है!
    दूर नहीं वो भीतर ही हैं!

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  3. इन्हीं को साथ ले कर...
    चलती हूँ मैं...... तुम्हारे पास पहुँचाने का...मन है ...मेरा ...और अब यह भी प्रण है मेरा ..

    ...भावयुक्त प्रणय निवेदन!! खूबसूरत रचना!!

    संजय भास्कर
    आदत...मुस्कुराने की
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  4. निश्चित ही धरा पर ...
    देता है नवचेतना ..
    ये उगता हुआ सूर्य मुझे ...
    चलना है चलना है ...
    चलते ही जाना है ...
    जीवन पर्यन्त..
    प्रयत्न करते रहना है ....

    बहुत ही खूबसूरत।

    सादर

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  5. मन में रहते, कुछ न सहते,
    भीषण पीड़ा, कैसे सहते।

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  6. || गुण अवगुण सत्यासत्य, मेरे ज्ञान अज्ञान
    सब कुछ अर्पित है प्रभू, तुझ पर पुष्प समान ||


    बहुत भावमयी सुन्दर रचना...
    सादर बधाई...

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  7. देता है नवचेतना ..
    ये उगता हुआ सूर्य मुझे ...
    चलना है चलना है ...
    चलते ही जाना है ...
    जीवन पर्यन्त..
    प्रयत्न करते रहना है ...

    आह! अनुपम सुकृति.
    आपके निर्मल हृदय से प्रस्फुटित
    सुन्दर भाव भक्ति पूर्ण इस अनुपम
    सुकृति को सादर हार्दिक नमन.

    बहुत सौभाग्यशाली हूँ मैं, जो आप जैसी अनुपम
    भक्त का अनुसरण करने का मौका मुझे ईश्वर ने प्रदान किया है.

    बहुत बहुत आभार,अनुपमा जी.

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  8. तुम्हारी इस कृति से ...
    सुकृती बनना है मुझे ...
    तुम तक पहुँचना है मुझे ..!!गहन चिंतन.....

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  9. bhaut hi sundar bhaavpurn abhivaykti....

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  10. तुम्हारी इस कृति से ...
    सुकृती बनना है मुझे ...
    तुम तक पहुँचना है मुझे ..!!

    अनुपमाजी.....पता नहीं इन शब्दों की क्या प्रशंसा की जाये ..
    अद्भुत लिखा है.....

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  11. जब प्रण दृढ़ हो
    और हो मन में विश्वास
    उस तक पहुंचने का रास्ता हो जाता सुगम

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  12. Hi..

    Sarahneeya kavita...
    Eshwar se prrem se janmi es kavita ka pravaah, prabhav avam bhav sahaj, sukhad aur sundar hain..

    Shubhkamnaon sahit..

    Deepak Shukla..

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  13. अनुपम है आपकी रचना अनुपमा जी , मन को अति सूक्ष्म कर जाती है. आपको कितनी बधाईयाँ दूँ ...

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  14. ये उगता हुआ सूर्य मुझे ...
    चलना है चलना है ...
    चलते ही जाना है ...
    जीवन पर्यन्त..

    सत्य वचन!

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  15. हृदय की गहराइयों से निकली प्रार्थना ! जिस क्षण यह भीतर जगी उससे पूर्व ही उस तक पहुँच गयी.. बहुत बहुत शुभकामनायें!

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  16. सच और सुन्दर.......ज़रूर हम ही अभी पात्र नहीं हुए अन्यथा वो तो वरण करने को कबसे उत्सुक है......ह्रदय से निकली ये प्रार्थना ज़रूर स्वीकार हो|

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  17. बहुत सुन्दर चिन्तन को दर्शाती प्रबल भावना फिर कैसे वो दूर रह सकते हैं।

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  18. सुन्दर प्रस्तुति.

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  19. बहुत सुन्दर प्रस्तुति ||

    बधाई ||

    dcgpthravikar.blogspot.com

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  20. अनेक अलंकारो से सजी ..एक खुबसूरत कृति . ..

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  21. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल आज 24-- 11 - 2011 को यहाँ भी है

    ...नयी पुरानी हलचल में आज ..बिहारी समझ बैठा है क्या ?

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  22. दिलबाग जी आभार ..मेरी कविता को चर्चा मंच पर लेने के लिए ...

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  23. संगीता जी बहुत आभार ....आज मेरी कविता हलचल का सिस्सा बनी....

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  24. देता है नव चेतना
    यह उगता हुआ सूरज '
    बहुत अच्छी पंक्ति लगी |इस रचना के लिए मेरी बधाई स्वीकार करें |
    आशा

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  25. लाजवाब चिंतन ... प्रभु की कृति को प्रभु के पास जाने की चाह ...

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  26. आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    चर्चा मंच-708:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

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  27. यह पोस्ट संगीता जी की हलचल का खूबसूरत नगीना है.
    आपकी इस अनुपम सुकृति ने दिल मेरा छीना है.
    प्रभु की राह जो पहचाने वही जीना ही तो जीना है.
    साहस से जो निरंतर चले उसी का असली सीना है.

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  28. 'क्या पात्रता नहीं है मुझमे .'
    - पात्रता न होती तो यहाँ तक कैसे पहुँच पातीं-साक्षात्कार के ये क्षण भी बहुत दुर्लभ होते हैं .बधाई !

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  29. क्या बात है अनुपमा जी ....... हर मन में उठने वाले इस प्रशन को कितने सुन्दर शब्द दिए हैं आपने .

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  30. प्रभू-स्तुति भावमई ्लगी.

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  31. मन के इस चिंतन को या जीवन में प्रखरता पाने की चाह को आपने सराहा ...आभार ...!!
    The road to perfection...never ends.Nevertheless ...keep walking........

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  32. bahut hi sundar rachana hai,,,pratyek kadi me bahut hi sundar bhavo ka ahsas hota hai...

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  33. bahut achcha laga pad kar… bahut hi sunder chah… zaroor kamyaab hogi!

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  34. मित्रों चर्चा मंच के, देखो पन्ने खोल |
    आओ धक्का मार के, महंगा है पेट्रोल ||
    --
    बुधवारीय चर्चा मंच

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