नमस्कार ....!!आपका स्वागत है ....!!

नमस्कार ....!!आपका स्वागत है ....!!
नमस्कार ....!!आपका स्वागत है ....!!

27 December, 2011

नैहरवा हमका न भावे ....!!

कबीर पढ़ना और गाना अपने आप में एक आलौकिक आनंद देता है .....!!उनके भाव गाते वक़्त मैं इस दुनिया में होते हुए भी नहीं होती .....!!


जब ज्योति जलती है ... हमारे बीच  ...प्रेम की ...ज्ञान की ...भक्ति की ...हमारे अंदर ....
जब हम वेद-पुराण की बात करते हैं ....अपनी सभ्यता संस्कृति की बात करते हैं ...अपनी भावनाओं की बात करते हैं ...तो सहज ही ध्यान आता है कबीरदास जी का ...उनके दोहों को पढ़ना और सुनना अपने आप में एक अद्भुत अनुभव है ...!
पहले हम जीवन में भोग और विलास के  पीछे भागते हैं एक अंधी दौड़ में ..जो हमें चाहिए उसके पीछे ....जब वो सब हमें मिल जाता है ...तब एक अजीब से खालीपन का एहसास होता है ...और याद आते हैं वो प्रभु जिन्हें हम अपने व्यस्त जीवन में....भूले- बिसराए बैठे हैं ...प्रभु से एकाकार होने का मन करता है ....और लगता है ...

साईं की नगरी परम अति सुंदर ...
जहाँ कोई जावे  न आवे ...

उस नगरी तक ....उस प्रभु तक मैं अपना संदेस ...कैसे पहुँचाऊँ ...?

बिन सतगुरु आपनो नहीं कोई .....कहत कबीर सुनो भाई साधो ....सपने में प्रीतम आवे ...
जी हाँ अगर गुरु कृपा हो तो रास्ता आसान हो जाता है ....
कबीरदास जी कहते हैं ....

नैहरवा हमका न भावे ....

साईं की नगरी परम अति सुंदर ...अति सुंदर ...
जहाँ कोई जाए न आवै ..
चाँद सूरज जहाँ पवन न पानी ...
को संदेस पहुँचावे ...
दरद यह साईं को सुनावे ...
नैहरवा ....

बिन सतगुरु आपनो नहीं कोई ...
आपनो नहीं कोई ...
जो यह राह बतावे ...
कहत कबीरा सुनो भाई साधो ..
सपने में प्रीतम आवै ...
तपन यह जिया की बुझावे ...
नैहरवा .... 



इस गीत पर अन्य कलाकारों का सहयोग इस प्रकार है ...

हारमोनियम पर -नयन व्यास जी
सिंथ पर हैं -डॉ.मुकुल आचार्य जी
तबले पर -हामित वालिया जी
होस्ट हैं -डॉ पूनम कक्कड़  जी.


24 December, 2011

दीप प्रज्ज्वलन ....!


एक गणेश स्तुति 
व दीप प्रज्ज्वलन का गीत आपको सुना रही हूँ .आशा है आप पसंद करेंगे ....!!

Merry chritmas....!!



दीपो ज्योति परब्रम्ह ,
दीपो ज्योति जनार्दना ,
दीपो हरतु में पाप,
संध्या दीपो नमस्तुते ...

शुभम करोतु कल्याणं ,
आरोग्यं सुख  सम्पदाम ,
मम बुद्धि प्रकाशस्च
दीपो ज्योति नमोस्तुते ... ....!!


20 December, 2011

कुछ मुस्काने की बात करो .....!!

चलते चलते इन राहों पर ...
 कुछ रुकने की भी बात करो..
तूफानों का मौसम है ..
कुछ थमने की भी बात करो ...!

चुप चुप से क्यों बैठे हो ...
खुशियों का तराना छेड़ भी दो ..
अंदाज़ ए बयाँ अब बदलो भी .. ..
ये बुत सा नखरा छोड़ भी दो ..!

आओ कुछ गाठें  खोल भी दें ...
कुछ मन की बातें बोल भी लें ..

भूलें-बिसरें बीती बातें ...
वो सोच में डूबी सी रातें ..!

यादें  मन को जो देतीं शूल...
एक पल में उनको जाएँ भूल...


ये मौन धरा का देता है ....
झींगुर की सुमधुर तान छेड़ ..
नदिया की कल-कल देती है ..
सुर को एक सुंदर ताल मेल...!

कुछ लहरें .. लेकर लहरों  से
ये पवन दीवाना  बहता  है ..
लहर-लहर लहराए यहाँ ...
है आज यहाँ ,कल  जाये कहाँ ..
हमसे-तुमसे ये  कहता  है ..!


हम साथ जो ऐसे बैठे हैं ..
यही आज ख़ुशी का है अवसर .. ..
वो गीत मेरे जो तुम से हैं ...
वो प्रीती मेरी जो तुमसे है ..
वही  राग पुराना  छेड़ो भी ..
कुछ मुस्काने की  बात करो .....!!

चलते चलते इन राहों पर..
कुछ रुकने की भी बात करो ......!!!!

10 December, 2011

भव सागर पार लगाओ ...!!!!!!

सर्वप्रथम ...अपनी सौ वीं पोस्ट पर प्रभु का आशीष चाहती हूँ ...


बंसी धुन मन मोह लई..
सुध-बुध मोरी बिसर गई ...
राह कठिन कान्हां.....
तुम बंसी नाहीं बजाओ ...
मग रोकत मोरी सास ननद ...
तुम काहे मोहे सताओ ...

डगर चलत अब बेर भई ...
बंसी धुन कित  टेर रही ...

नटखट श्यामा ...
मन अभिरामा...
छल कीन लियो  ...
मन मोह लियो ...
मैं राह भटक ...
सखी गयी री अटक ...
जल की मटकी ...
अंसुअन से  भरूँ..
हृद की पीड़ा ..
मैं कैसे सहूँ ..?
अब कासे कहूँ री आली ...?
अब कौन सुने री मोरी ...?
तुम  मान भी लो ....
छल  छांड भी दो ..
बिनती सुनलो  मोरी ...
लो हाथ पकड़ मेरा ...
गरवा मोहे लगाओ ..
ओ श्यामा ...
भव सागर पार कराओ... ...!!!!!!

06 December, 2011

चंद्रमुखी ...........मधुरिमा ...मनोरमा हो तुम ...!!

मैं टकटकी लगाये ताकती  रही ..
चंद्रमुखी के फूल....मेरे आँगन में ...
निरपेक्ष लहलहाती हुई ..  ... 
प्रेम ही प्रेम छलकाती हुई ..
हर आगंतुक का 
स्वागत करती हुई ...
प्रभास का आभास कराती हुई ....
ये चंद्रमुखी की कतार ...!!

ऐसे ही तो नाम तुम्हारा
 नहीं पड़ा चंद्रमुखी ...
कोमलान्गिनी ..सुहासिनी ..
स्पर्श करने से डरती हूँ ..
कहीं तुम मैली न हो जाओ ..!

कितना  खिलखिलाती  हो ....
खिली-खिली तुम्हारी खिलखिलाहट से
खिल कर झूम  रही है बगिया मेरी ...
अपने बाग में  तुम्हें निर्निमेष निहार ..
बाग-बाग..है ...मेरा  ह्रदय ...!!


भीनी भीनी सी खुशबू से ..
हृद भर गया है अब लबालब ..
और ..
तुम्हारे होने का प्रमाण ....!!
मौन ..आकर्षण ......तुम्हारा ...
जब खींचता है मुझे ..अपनी  ओर...
टहलते हुए अपने बाग़ में चहुँ ओर ...
खुलते खुलते खुल ही जाते हैं ...
झीने झीने से मेरे मन के आवरण ...
और अपने भीतर देखती हूँ ....
चारू ..अप्रतिम प्रतिमा  तुम्हारी ...
जैसे खुल गए हों ..
स्वर्ग के  ये द्वार ..
Chrysanthemums ....इन्हें ही शेवंती भी कहते हैं..

देख  कर ही तुम्हें.. 
एहसास होता है  ...
तुम्हारी मौन व्यग्रता का ...
खिली सी ..चंचलता का ...


अरी ओ चंद्रमुखी ...
सगुना सुगुना ..
सच्चंद्रिका समेटे ..
सद्गति की ओर ले जाती हुई ...
सुंदर रंगों में साकार ..
 मेरी सुकल्पना ..
सुघड़ मन अल्पना ...
हर जन्म  की मेरी प्रेमिका  ..प्रियतमा  .....
सुहासिनी ....स्वस्ति ..सुमंगला ............................................................................................
चंद्रमुखी ...मधुरिमा .. मनोरमा  हो तुम ...!!



01 December, 2011

तो जी लूँ कुछ दिन ...!!

 मैं ...अभी तो ..
 लेने का हिस्सा  हूँ ..
लेती ही रहती हूँ..
जग  से ...!!

जग  में रहकर ...
जग  से हटकर ...
जग  को  देकर ...
कुछ देने का किस्सा बनूँ....
तो जी लूँ कुछ दिन ...!!

अरुण की स्वर्णिम आभा  सी
 निखर  सकूं ..
गुलमोहर  के मोहक  रंगों  सी ..
निखर  सकूँ ..

कल-कल , सरिता के शीतल  जल सी..
 बिखर  सकूँ...
मदमाती, मस्त पवन के  झोंखे सी ..
बिखर सकूं ..

रेगिस्तान में फैली हुई स्वच्छ  रेत सी
बिखर सकूँ ..
नम आँखों में बसते ख्वाबों सी ..
बिखर सकूँ..

सप्त सुरों के सरगम सी ..
निखर सकूँ ...बिखर सकूँ ...
कुमुदिनी की पंखुड़ी सी ..
निखर सकूँ..बिखर सकूँ..


निखर सकूँ ..बिखर सकूँ ..इस तरह तो ......?

 .....तो जी लूँ कुछ दिन ...!!

I know not much.....in fact nothing...............!
O GOD...!!Hold me and behold me as I tread ..THE PATH ...IN PURSUIT OF EXCELLENCE ...towards ...
YOU....THE OMNIPRESENT.....!!!!!!

27 November, 2011

एक दिन................!!

इस  धरा पर ....
कई साल पहले ...
जन्मी थी एक   दिन  ...

माँ का स्पर्श ..याद है मुझे ...
आया आया ..दही वाला आया ..
सुन सुन कर ...
थाम कर उंगली उनकी ..
खिलखिलाकर ...
चली थी एक  दिन....

माँ ने चलाना ही सिखाया ...
और  कुछ ...
और बहुत कुछ ..पा जाने की इच्छा जब जागी ....
दौड़ना ..मैंने सीख ही  लिया ..
एक दिन..!!

छोटी सी ललक थी ..
बढ़ते बढ़ते ..
अपने अधिपत्य की कामना बनने लगी ......
और  कुछ ...
और बहुत कुछ पा जाने की इच्छा जब जागी ...
 अंधी दौड़ में भागते हुए ...
जग से प्रेम त्याग ..
अपनाया ..द्वेष ..इर्ष्या...छल ..राग ..
 फिर ..कपट  करना..मैंने  सीख ही  लिया ..
 ...एक दिन........!!

भागते भागते इस दौड़ में ..
 दौड़ को जीतने  की लालसा....
जब जागी ......
साम,दाम,दंड भेद ...
झूठ पर भी हो न खेद ...
और ..फिर ...
जग से मुखौटा लगाना भी ...
मैंने सीख ही लिया...
एक दिन....  ..!!

जीतने  लगी  मैं ...
लगते रहे मुखौटे ...
भरते रहे भण्डार ...
सूर्यास्त की बेला हुई .....
छाने  लगा अन्धकार ...
छूट जाने के डर से घिरी हुई  ........
सब छूट जाये पर,
छूटता नहीं मोह अब ...
न सखी न सहेली ....
बैठी हुई ..नितांत अकेली
फिर भी ......
देखो तो पापी मन मेरा  ...!
Painting by Abro khuda bux.
झगड़े और करे मेरा..तेरा  ..!!
डर-डर कर रहना सीख रहीं हूँ अब ...


क्षमा करना प्रभु ...
तुमने दिया था जन्म मुझे ..
खुली खुली इस सुंदर ...
मनमोहक   धरा पर . ..!
किन्तु ..मेरे द्वारा  बसाई ...
इस दुनिया के पिंजरे में क़ैद हो  ...
अपने आप से दूर ........
बहुत दूर  ....
और निरंतर दूर होती हुई ...
पिंजरबद्ध हो..
 रहना...मैंने...सीख ही लिया...
 एक दिन........!

हाँ ...अपनी इस काया के लिए जीना..
मोह में बंधना .. माया के लिए जीना ..
मैंने सीख ही लिया...
 एक दिन ..............!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

24 November, 2011

मेरा प्रतिबिम्ब ही है.. जीवन ...!!


जैसा  पानी का रंग है ...
 वैसा मन  का रंग है ...
 और जीवन ..का रंग है ...
 कोई रंग ही नहीं ...
पर दिया अपना रंग मैंने इसे ...
और रंग दिया जीवन अपने ही रंग में ...


या ...
जैसा  गीली माटी का रूप है ....
वैसा मन का रूप है ....
और जीवन का रूप है ...
अपना कोई स्वरूप ही नहीं....
पर चाक पर  दिया -
एक  रूप मैंने इसे ..
और ढाल लिया जीवन..
 अपने मन के स्वरूप में ..


शीश महल की तरह ...
अपनी ही छब दिखाता है ये जीवन ....
विविध रंग-रूप में सिमटा...लिपटा..या फैला ....
मेरा  ही  प्रतिबिम्ब है  जीवन ...
मेरा ही रंग ...मेरा ही रूप ...
मेरी ही दृष्टि ...छाई चाहूं ओर...
चाहूं ओर ..मैं ही  हूँ ..
मेरे ही हर दान से मिला..
 प्रतिदान वरदान.....
हर रोध से मिला..
 अवरोध ..प्रतिरोध...
हर क्रिया  से मिली प्रतिक्रिया ...
और हर बिम्ब से मिला प्रतिबिम्ब ...
हाँ निश्चय ही .....


मेरा  प्रतिबिम्ब ही  है.. जीवन ...!!


Oct.,2011,when I was in U.K ,one of my articles was published in the news paper titled , ''The gift of music .''for  ''Thought of the week.''Please spare a few minutes if u can.Thanks.

22 November, 2011

तुम मेरी पहुँच से दूर क्यों हो ..?

प्रभु मैं हूँ -
तुम्हारी ही कृति  .. ..
मनुष्य रुपी ये तन ..
और गुण- अवगुण से भरा मन .......
तुम्हीं ने तो दिए ...
प्रसाद रूप मैंने ग्रहण किये ...!


इन्हीं को साथ ले कर...
चलती हूँ मैं......
तुम्हारे पास पहुँचने  का...
मन है ...मेरा ...
और अब यह भी प्रण है मेरा .. 
तुम्हारी इस कृति से ...
सुकृती बनना है मुझे ... 
तुम तक  पहुँचना है मुझे ..!!

राह दिखती है ..
तुम तक पहुंचती हुई..
और फिर मुड़ जाती है ... !!
ये कैसे असत्य के
घेरे से घिर गयी हूँ मैं ... .....
कितनी ही कोशिश कर लूँ ..
तुम तक पहुँचने की ...!!
तुम मेरी पहुँच से दूर क्यों हो ..?
क्या  पात्रता  नहीं  है मुझमे ..?
मेरी आहत नाद की अर्चना ...
मेरी अनाहत नाद की आराधना ...
शायद मेरे सत्य में...
मेरे कत्थ्य में ..
अभी भी वो 
तत्थ्य नहीं ..वो सत्य नहीं ...
जो तुम तक पहुँच सके......!!
मोड़ बढ़ते ही जाते हैं ..
जीवन यात्रा चलती ही जाती है ..
अंतहीन ...अनवरत ..निरंतर ...
किन्तु अटल विश्वास है ..
तुम पर ...स्वयं पर भी ..
खोज लूंगी वो निधि एक दिन ...
तुम तक पहुँचने की विधि एक दिन ...!!


मन  चिंतन ...
घिरी हुयी विचारों से ...
अब सोचती हूँ...
दीन हीन मलिन ...
शबरी में थी ..
कैसी ..भक्ति..आसक्ति ...
कैसी वो अदम्य शक्ति ....!!
खिला सकी प्रेम वश ..
अपने जूठे बेर भी तुम्हें ...
आज ..
भले ही वो युग नहीं है ...
पर सबकुछ तो झूठ
अभी भी  नहीं है ...
दमकती है ..चमकती है ...
दूर ....एक किरण ...

अभी भी दिखती है-
निश्छल मुस्कान...
कुछ चेहरों पर...
कुछ सत्य बाकी है ..
निश्चित ही धरा पर ... 
देता है नवचेतना ..
ये उगता हुआ सूर्य मुझे ...
चलना है चलना है ...
चलते ही जाना है ...
 जीवन पर्यन्त..
प्रयत्न करते रहना है ....
त्याग  कर असत्य का ..
ये  ताना-बाना...
सशक्त सत्य को खोजते हुए .. 
तुम तक पहुँचना ही है एक दिन ...!!


कुछ  समय  पूर्व परिकल्पना पर छपी थी ये कविता आज इसे ब्लॉग पर डाल रही हूँ | 

15 November, 2011

कितने दिनों की प्रतीक्षा बाद ...!!


कितने  दिनों की -
प्रतीक्षा  बाद ...
जब  सुनी  वो -
ममतामयी ..करुणामयी ..
अविरल ..अनवरत ...
अनाहत नाद ...!!!

सौभाग्य के बादल...
उमड़-घुमड़ कर ..
घन घन करते ...ढोल बजाते ....
खोले जब उर के द्वार ...!
देखा ...........

नवरंग से दुकूल लिए ...
सप्त रंग बहार लिए ..

श्रुति में द्युति लिए ...
पाहुना घर आया है ...!!!!!!

हाँ ..उसी के लिए ही मैंने -
 भुवन सजाया है ..!

देखो भवन  मेरा -
रंगीन सुकृति से सजा है ...!

झड़ गयी है धूल -
कई दिनों से पसरी थी ..
मनः पटल पर... जमी थी जो ....
ढेरों..ढेरों  परतें उसकी ...!!

बगिया मेरी, छिटकी हुई-
कुछ बूँद पश्चात्  ही ..
हरी-भरी ...
साफ सुथरी सी 
लग रही है ...!!

कोने कोने में-
अहेतुक बिखर गयी है ..
संविद मुस्कान मेरी ... 
अज्रस  उर्जा से संचारित -
मेरे मन की सरिता -
बढ़ गयी है -
एक नए आवेग से -
अगले पड़ाव पर -
जीवन के कुछ नए आयाम पाने के लिए.....!!




*अहेतुक -अकारण 
*संविद- चेतनायुक्त
*अज्रस  -बिना रुके या लगातार 

09 November, 2011

सिलसिला...जीवन का .....!!!!!!!



 देख रही हूँ ...
शबनमी सर्द रात..
आती हुई ...
और फिर  ....
और गहराती हुई ...



नींद मुझसे कोसों दूर जाती हुई ....
एक  याद पल-पल..
आती हुई ...
और फिर....
और पास आती हुई ...

नाज़ुक से दिल को बहकाती  हुई ...
दो बूँद आंसू गालों पर...
 ढलकाती  हुई ....
और फिर ...
और उदास कर जाती हुई ...


फिर ...झींगुर  की  आवाज़....
मन भरमाती हुई ....
जैसे ..जागते जीवन का राग..
 सुनाती हुई ...
 और फिर.... सोई हुई आस जगाती हुई ...

आँखों ही आँखों में रात..
फिर जाती हुई ...!!
बीत  जाती हुई ......!!
और फिर....
जागी हुई सी आस...मेरे पास  छोड़ जाती हुई...........................................................................................................................................................

07 November, 2011

अब तो बेड़ा पार करो खेवैया ...!!

     प्रभु तुम ..
हो दयाल ..रहो कृपाल ..
यूँ बसो सदा ही ..
मन  में मेरे ...

देख सको अपनी चितवन से  ..
सांझ -सबेरे मुझे जतन से ...
नित मन क्यों घिरता अंधड़ से ...?
नहीं दूर हुई तुमरे सिमरन से ...!!


लीन तुम्हारे प्रेम में प्रभु ...
भय से व्याकुल फिर क्यों होती ...?
painted by:Pragya Singh.
नित  ही  भय  की मन में चलती...
आंधी  से फिर क्यों   घिर  जाती  ...?
 धूल धूसरित क्यों   हो जाती...?
क्यों निर्भीक नहीं हो पाती.....?
एक अजब से डर से डगमग ..
क्योंकर डोले जीवन नैया ...?
अब तो अभय  दान  दो प्रभु .......
राखो लाज हमारी,गिरधारी ...
बेड़ा पार करो खेवैया ....
हे बंसी बजैया ...!!
*कृपया एक नज़र इधर भी डालें...http://swarojsurmandir.blogspot.com/

01 November, 2011

एक परीक्षा है.......जीवन ....!!

ये कैसी प्रक्रिया है .....
क्या मेरी प्रतिक्रिया है...
समेटना ...सहेजना ...संजोना ...संवरना-संवारना  .....
खिलना- खिलाना  ...
दूर रहकर भी बहुत पास रहना ...या ...
पास रहकर भी बहुत दूर रहना ....

जीवन की  आकांक्षा .....
जीते रहना ...सांस लेते रहना ...
 पल-पल खोना बहुत ...पाना कम ...
फिर भी निरंतर आगे ही बढ़ते रहना ...
अदम्य साहस के साथ ....
और उस  ...और  पाने   की ...
एक  प्रतीक्षा पुनः करते रहना .......
और फिर ..
उस प्रतीक्षा के आकार  को साकार करने हेतु ....
निराकार प्रेम बाँटते  रहना ......
एक परीक्षा है.......जीवन ....!!

 प्रकृति  की मौन धारा   से ...
मुझमे प्रवाहित होता हुआ ...आकर्षण है ...
गुरुत्वाकर्षण है...
 दिव्यता है ...
भव्यता है ...
सूक्ष्मता है ....
दक्षता है ....
एक परीक्षा है जीवन .....!!



27 October, 2011

एक मुट्ठी माटी.......!!!!!


  अपने मन...वतन 
और  संस्कारों की
एक मुट्ठी माटी....
हाथ में बटोर कर ...
समेट  कर ...
कर ली बंद मुट्ठी ...

हाथ बंद मुट्ठी ...
पैर जीवन पगडण्डी पर ...
चल रही है अनवरत ..जीवन यात्रा ...
पड़ी कुछ वर्षा की बूँदें.....
मुझ पर ....
भीगी सी माटी....
सोंधी सी खुशबू ...

देखते ही देखते ...
खिल गयी कुछ कोमल कोपलें ...
समेट ली थी माटी ...
अब सहेजना है ...
इन्हीं कोमल कोपलों का जीवन ...!!!!!!!!!!!!


दीपोत्सव  पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनायें .......
शुभ ज्योति...नवल ज्योति....
ज्यों ...ज्यों ...
बिखेरे अपनी कीर्ति....
 बनी रहे परस्पर सबमे  स्नेह और प्रीती ...!!
इसी भावना से एक क्षमा याचना है कि कुछ दिनों से अपने गायन के सिलसिले में उलझी रही और ब्लोगिंग से दूर रही |अब पुनः अपने देश वापस आने पर कविताओं का सफ़र जारी रहेगा .... अपने विचारों से अवगत कराते   रहिएगा ....वही उर्जा कुछ नया लिखने को प्रेरित करती है ...!!आभार...

29 September, 2011

क्वांर की धूप में .... !!

.
Black buck antelope.
आँगन -आँगन  ....गलियारे ...
मैदान ..मैदान...
कोने-कोने में ...पड़ने लगी है ...
खिलने लगी है धूप  ......
आज फिर आ गया है क्वांर (अश्विन)....!!
तपती क्वांर की   धूप में ....
तप करता है ...
तपता है जैसे मन ...
तपता इस मृग का तन ....
कौन  है  जो  नहीं  तपा .....?
कौन  है जो  बचा  रहा ...?
कभी जब रोकती है.. 
हलकी सी धुप की गर्माहट हमें ...
अलसाई सी इस धूप में ...
जो सो गया वो खो गया ...!!

मौसम  का  क्वांर  तो  आता   है 
 जीवन  में    क्वांर भी  लाता  है....
हमारे जीवन का...?
या इस मृग के जीवन का...?

प्रेरणा पाती हूँ इसकी तपस्या से ...
घंटों धूप में बैठा ....
Basking in the sun.
सहता है धूप की तपिश ....
तप से तप कर ...
जैसे  आग  में  जल  कर..
  कंचन   निखरता है  ...
 निखर  जाता  है मृग  का  तन  भी  ....

धूप में जल-जल कर ....
तप कर ...
तप का उन्माद जब छाया ..
 बन  जाती  है अनमोल  उसकी  काया  ... 
 यही है ..जीवन की..अद्भुत  माया.....!!


According to the Hindu mythology Blackbuck or Krishna Jinka is considered as the vehicle (vahana) of the Moon-god Chandrama.
According to the Garuda Purana of Hindu Mythology, Krishna Jinka bestows prosperity in the areas where they live. The skin of Krishna Mrigam plays an important role in Hinduism, and Brahmin boys are traditionally required to wear a strip of unleathered hide after performing Upanayanam.More importantly...when the antelope sits in the sun for hours together in this season, the skin gets tanned, making it look more beautiful and the colour of the skin becomes more  precious.

Please read this text as just an information to enrich knowledge .
क्वांर से अभिप्राय ...आश्विन मास से है .ये हिंदी महिना सावन ,भादों के बाद क्वांर आता है |इसी क्वांर के महीने में ये हिरन अपने शरीर की काया पलट लेता है ...और फिर उसे देखने दूर-दूर से लोग आते हैं|इसी बात को ध्यान में रखकर ये पोस्ट लिखी है|