नमस्कार ....!!आपका स्वागत है ....!!

नमस्कार ....!!आपका स्वागत है ....!!
नमस्कार ....!!आपका स्वागत है ....!!

06 September, 2015

मृदुल राग की बानगी .....!!

मृदुल राग की बानगी ,
नभ घन भर लाई  ,
कुंतल सी उड़ती कारी
उजियारी मन पर छाई ...!!


जा री बदरी  बांवरी
निरख न मेरो भेस ,
मुतियन बुंदियन  बाट तकूँ मैं,
कब  सुलझाऊँ केस ……?

आस घनेरी छाई नभ पर ,
बरसे मन  हुलसाती  ,
पतियाँ  भीगी ,
लाई मुझ तक
कुहुक  कोयलिया गाती    …!!

निमुवा  फूले मनवा  झूले ,
मियां मल्हार की  बहार ,
सावन की ऋतु नेह बरसता ,
हरियाई  मनुहार    …!!

24 July, 2015

भोर हो गई ...!!

रात्रि के नीरव एकांत में ,
चाँद रौशन हुआ ,
मन का जब दीप जला,
पथ प्रदर्शित हुआ !!
मन चिन्मयानन्द  हुआ   …!!
बहती हवाओं में ,
फिर मेरा मैं चलता ही रहा ,
वो दीप जलता ही रहा …!!

माँ की दुआओं से ,
मन के अडिग विश्वास से ,
सदाओं का तेल भरता ही गया ,
 असर ऐसा रहा ,
वो दीप जलता ही रहा
मेरा मैं
अपनी राह चलता ही रहा    …
और …
और भोर हो गई ...!!

20 June, 2015

तुझ से ही हूँ मैं .....!!

तुझ से ही हूँ मैं,
तेरे दो आंसू
मेरी वेदना का समुंदर !!
 तेरा हँसना ,
समग्र सृष्टि का होना है !!
आँगन में तेरा होना
समग्र सृष्टि का खिलना है !!
ह्रदय में तेरा होना ही मेरी सम्पूर्णता है !!
हाँ .....तुझ से ही हूँ मैं !!

13 May, 2015

अनुभूति से अभिभूत ....!!


रवींद्रनाथ टैगोर ने भी परमब्रह्म तक पहुँचने के लिए संगीत को ही एकमात्र साधन कहा है --'' संगीत हमारी चित्तवृत्ति को अंतर्मुखी बनाकर हमें आत्मस्वरुप का नैसर्गिक बोध कराता है और आत्मस्वरुप का यह बोध ही मनुष्य को परमतत्व से जोड़ता है।"  

''अनुभूति को अनुभूत  करने में ही उसका अस्तित्व है ''


निसर्ग के इन्ही फूलों में रची बसी,
इन्हीं फूलों से उड़कर,
जो  पहुंचती है मुझ तक,
अनुभूति से अभिभूत ,
उस आमद का करती हूँ स्वागत,
उस सुरभि से ,
जोड़ जोड़ शब्द ,
भरती हूँ कुछ भाव ,
सजती है मेरी कल्पना,
भरती रंग मन अल्पना ,
उठती है  …,चलती है 
और फिर ,
ईश्वर की कृपा बरसती है ,
और....

और ....... 
अनायास नृत्य करती है,

मेरी पंगु कविता .....!!

10 May, 2015

एक माँ को नमन .....

एक माँ को नमन…

जिसकी  मासूम उदास आँखों से भी,
 झांकती है एक हँसी   …!!
वो अभी भी देखती है कुछ ख़ाब,
सूनी सी आँखों में रंग भर देते हैं जो ,
और फिर उसके पौधों का रंग हो उठता है ,
और भी हरा ,
उसके बाग़ की हर क्यारी में होते हैं
फूल ही फूल ,
उसकी कविता में होते हैं
शब्द ही शब्द
उसकी बातों में होते हैं भाव ही भाव ,
उसकी अल्पना में होता है ,
पलाश का रंग .....
इस तरह खिलती है
खिलखिलाती है ...
और फिर से,
उसकी मासूम उदास आँखों में से
झांकती है एक हँसी ...



05 April, 2015

अनुग्रह मेरा स्वीकार कीजिये .......

यही थे मन के विचार आज से पांच वर्ष पूर्व और आज भी यही है जीवन    …… कितना सुखद लग रहा है आज ,आप सभी के साथ का यह पांच वर्ष का सफर   .... 
अर्थ की अमा 
समर्थ की आभा है ,

अनुग्रह मेरा स्वीकार कीजिये ,
आज दो शब्द अपने ज़रूर मुझे दीजिये    …


मन की सरिता है
भीतर बहुत कुछ 
संजोये हुए ..
 कुछ कंकर ..
कुछ पत्थर-
कुछ सीप कुछ रेत,
कुछ पल शांत स्थिर-निर्वेग ....
तो कुछ पल ..
कल कल कल अति तेज ,
 मन की सरिता है ,



कभी ठहरी ठहरी रुकी रुकी-
निर्मल दिशाहीन सी....!
कभी लहर -लहर लहराती-
चपल -चपल चपला सी.....!!
बलखाती इठलाती .. ...
मौजों का  राग सुनाती ....
मन की सरिता है.

फिर आवेग जो आ जाये ,
गतिशील मन हो जाये -
धारा सी जो बह जाए ,
चल पड़ी -बह चली -
अपनी ही धुन में -
कल -कल सा गीत गाती  ...
राहें नई बनाती ....,    
मन की सरिता है -

लहर -लहर घूम घूम--
नगर- नगर झूम झूम
छल-छल है बहती जाती ..
जीवन संगीत सुनाती -----
मन की सरिता है !!!


…………………………………………। 

अनुग्रहित हूँ ,अभिभूत हूँ 

अनुपम त्रिपाठी 
सुकृती 

31 March, 2015

लीला धरते शब्द लीलाधर .....!!

लीला धरते शब्द लीलाधर .....!!

कभी जुलाहा बन
बुनते अद्यतन मन ....
समय  से जुड़े ,
बनाते  विश्वसनीय सेतु,


कभी खोल गठरी कपास की
बिखरे तितर बितर,
चुन चुन फिर सप्त स्वर,
शब्द उन्मेष
गाते गुनगुनाते,
बुनते धानी  चादर
गुनते जीवन
अद्यतन मन.......!!

शब्द फिर सहर्ष अभिनंदित,
स्वाभाविक स्वचालित,
सुलक्षण सुकल्पित,
रंग भरते मन
पुलक आरोहण ,
मनाते उत्स
रचते सत्व ,
लीला धरते शब्द लीलाधर .....!!

06 March, 2015

लगता है कोई है कहीं ....!!

मेरी उम्मीद  के अनघ सुरों में,
कुछ शब्द गढ़ते हैं भाव ,
भरते हैं रंग ,
उड़ता है फाग ,
बसंत का अनुराग ,
 वही है रंग ,
अबीर गुलाल सा ......
खिलता पलाश ....!!

रचना रचती है ,
 रंग से भरी
उमंग से भरी ,...
होली ...!!
और तब ..
धरा के कण कण में,
फूलों के अनेक रंगों में,
खिलती  है ,
खिलखिलाती है ज़िंदगी ,
हाँ .......
लगता है कोई है कहीं ....!!


आप सभी को होली की अनेक शुभकामनायें ...रंग से उमंग से जीवन भरा रहे ...!!

05 March, 2015

यूं ही अनवरत .....!!

15 वर्ष यकीनन बहुत लंबा समय होता है ...किन्तु सब कुछ आज भी याद है ...स्पष्ट ...!!
माँ की याद में ...आज उनकी पुण्यतिथि पर ,उनके लिए लिखे कुछ भाव ...!!


मेरे पास आज भी
 तुम्हारे दिये हुए
देखो वही शब्द हैं माँ
वही भाव हैं ...
जिन्हें तुम सर्दी में सहेजती थीं 
धूप दिखाकर ....,
गर्मी में सहेजती थी 
उस अंधेरी कोठरी  में 
धूप से बचा कर ....
बरसात मे  तुम्ही ने सिखाई बनाना 
वो कागज़ की नाव ,
जिस पर आज भी 
तिरते हैं मेरे मन के भाव
''वो कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी '' 
गाते हुए ....जानती हूँ ....
मानती भी हूँ .......
तुम से मुझ तक ...
मुझ से मेरी संतति तक ....
कुछ तो है जो चलता रहेगा ....
यूं ही अनवरत .....!!

04 March, 2015

बूंद रंग अपने भरोगे ...


शब्द की उस आकृति को
भाव की उस स्वकृति  को ,
शब्द शब्द गढ़  दूँ अगर तो
भाव कैसे पढ़ सकोगे .....?

जीवन  की यह वेदना है ,
जब नहीं संवाद न संवेदना है ,
शब्द मेरे ही हों किन्तु
भाव रंग अपने भरोगे...!!

है जगत की रीत यह तो ,
दो घड़ी की प्रीत यह तो,
जल भरा यह कलश मेरा ,
भाव रंग अपने भरोगे ....!!

*************

स्याही से
लिखते हुए
उज्ज्वल भाव भी
स्याह क्यों दिखते हैं ......?




28 February, 2015

वो है ज़रूर .....!!

नहीं ,
कोई आवाज़ नहीं है उसकी ,
न ही कोई रंग है ,
नहीं ,
कोई रूप नहीं है उसका ,
पर वो बुलंद है ...!!
मेरी आस में
मेरी सांस में
सोया जागा 
एक तार
विद्यमान है ...
हाँ है ज़रूर ,
मुझमें शांत एकांत 
उतना ही ...
जितना तुममे चंचल प्रबल ...
हाँ
वो है ज़रूर ....!!

23 February, 2015

मान्यताएँ ....(क्षणिकाएं)

मेरी मान्यताओं के धागे
बंधे हैं उससे  ,
समय के साथ ,
समय की क्षणभंगुरता जानते हुए भी,
 वृक्ष नहीं हिलता
अपने स्थान से  ,
बल्कि जड़ें निरंतर
माटी में और सशक्त
और गहरी पैठती चली  जाती हैं !!
आस्था गहराती है ,
छाया और घनी होती जाती है !!

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सदियों से ...
चूड़ी बिछिया पायल पहना ,
बेड़ियों मे जकड़ा ,
अपनों का भार वहन करता
ये कैसा संकोच है ,
निडर ...स्थिर,एकाग्र चित्त ...!!
अम्मा के सर के पल्ले की तरह ........
सरकता नहीं अपनी जगह से कभी ....!!

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बहती धारा से ,
सजल सुबोधित
उम्मीद भरे शब्द
शक्तिशाली होते हैं
प्रभावशाली प्रवाहशाली होते हैं
स्वत्व की चेतना जगा ,
जुडते हैं नदी के प्रवाह से इस तरह
के बहती जाती है नदी
कल कल निनाद के साथ
फिर रुकना  नहीं जानती ........!!
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25 January, 2015

प्रेम तब भी जीवित होगा...!!

मैं शब्द हूँ
नाद ब्रह्म ...
प्रकृति में रचा बसा ...!!
हूँ तो भाव भी हैं
किन्तु ,
न रहूँगा तब भी
भावों का अभाव न होगा !!
प्रतिध्वनित होती रहेगी
गूंज मौन की ,
उस हद से परे भी
प्रकृति की नाद में ,
जल की कल कल में
वायु के वेग में
अग्नि की लौ में  ,
आकाश के विस्तार में,
धृति  के धैर्य में,
रंग में ,बसंत में,
पहुंचेगी मेरी सदा  तुम तक
प्रभास तब भी जीवित होगा
 प्रेम तब भी जीवित होगा...!!