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14 November, 2010

मेरा बचपन....!!


चहक उठती है
मन की चिड़िया -
महक उठती है
मन की बगिया-!

खिल उठता है
घर का कोना-कोना
जी उठता है
मन का कोना -कोना
बन जाती हूँ बच्ची मैं जब -
घर आते हैं बच्चे -
लौट आता है बचपन मेरा -
संग होते जब बच्चे -!!

है ये बच्चों का बचपन -
या मेरा बचपन -
या मेरा बचपन दोहराता हुआ -
मेरे प्यारे बच्चों का बचपन --

माँ -माँ करता गुंजित कलरव -
अमृत सा दे जाता है -
पीकर इसका प्याला -
मन हर पीड़ा दूर भगाता है --!

खो जाती हूँ रम जाती हूँ -
छोटी सी इस दुनिया में -
घर फिर घर सा लगता मुझको -
घर आते जब बच्चे-!!


24 comments:

  1. बच्चों से तो वैवाहिक जीवन महकता है।

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  2. बच्चे होते ही हैं ऐसे! उनका साथ किसे अच्छा नहीं लगता;नन्हे बच्चों की निश्छल मुस्कराहट सारी परेशानियों और थकान को पल में दूर कर देती है.
    दिल को छू गयी आप की ये कविता.

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  3. bahutb theek kaha.A very nice expression.

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  4. सच कहा है बच्चों के साथ एक बार फिर अपना बचपन जी लेते हैं हम .

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  5. मन के किसी कोने में बचपन सदैव जीवित रहता है... रहना ही चाहिए!
    सुन्दर रचना!

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  6. bachcho me hi to bachpan dhundhte hain ab...bahut badhiya...dil ko chune layak..

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  7. मेरा प्रयास पसंद आया-
    आप सभी का हृदय से आभार .

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  8. बच्चों के बिना घर बहुत बहुत सूना-सूना लगता है

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  9. BAHUT SUNDAR BHAVON KO SAMETA HAI AAPNE .BADHAI

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  10. BAHUT ACHCHHI BHAVNAON KO PRAKAT KIYA HAI AAPNE .AABHAR

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  11. बच्चों के साथ बच्चे बन कर बचपन जी लेते हैं फिर से सुंदर रचना !
    बधाई !!

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  12. बच्चों के बचपन में ही हम अपना बचपन एक बार फिर से जी लेते हैं ! बहुत सुन्दर रचना !

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  13. पढकर बचपन के यादों में खो गया,
    बहुत सुंदर प्रस्तुति,...

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  14. सुन्दर अभिव्यक्ति....
    सादर...

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  15. बहुत ख़ूबसूरत और भावपूर्ण अभिव्यक्ति...

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  16. संगीता जी आपका ह्रदय से आभार ...मेरी पुरानी रचना का नवीनीकरण हो गया ...!!

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  17. बहुत ही अच्छी रचना......

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  18. खो जाती हूँ रम जाती हूँ -
    छोटी सी इस दुनिया में -
    घर फिर घर सा लगता मुझको -
    घर आते जब बच्चे-!!
    lag bhag har ma ka haal aapke jesa hi hai

    baht sundar racna

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