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27 November, 2010

धूप-- छाँव



उल्लासित जीवन जीने का -
सतत प्रयास करती रही -
कभी धूप 
कभी छाँव  के मौसम से -
निरंतर गुज़रती रही -
ज़िन्दगी से प्रीत निभाती रही .


छुप जाती थीं जब सूर्य की -
दिव्य उष्म प्रकाश की
अलौकिक रेखाएं -
आच्छादित थीं रवि -आभ पर -
छाँव  लाती हुई -
अलक सी घटायें -
ठगी सी निर्निमेष निहारती थी -
अपलक मेरी पलक -
वही अलक सी घटायें -
छाई थी मेरे मन पर क्यों -
कारी -कारी अंधियारी लाती हुई -
वही अलक सी घटायें -
उस पर दामिनी -
दमक- दमक कर -
मन डरपा जाती थी -
बीतते न थे-
पल-पल गिनते भी -
दुःख के करील से क्षण .....!!
मनन करता था मन -
करता था पुरजोर अथक प्रयास -
ढूंढता था तनिक आमोद-प्रमोद
आल्हाद और उल्लास ...!!


है यह नियति की परिपाटी -
सुख के बाद -
अब दुःख की घाटी
हर एक मोड़ जीवन का
ले लेता जैसे अग्नि परीक्षा -
पर हो कर्तव्य की पराकाष्ठा -
और अपने ईश पर घनीभूत आस्था -
हे ईश -ऐसा दो शीश पर आशीष
जी सकूँ निर्भीक जीवन -
वेग के आवेग से मैं बच सकूँ -
आंधी औ तूफ़ान से जब-जब घिरुं-
दो अभय वरदान अपराजिता बनू -




जब -जब पा जाता था मन प्रसाद -
विस्मृत हो जाते सारे अवसाद -
आ जाता जीवन में पुनः आह्लाद ,
और फिर जी उठता  प्रमाद ....!!
फिर वही गीत गुनगुनाती रही .........!!
ज़िन्दगी की रीत निभाती रही ..!
कभी धूप कभी छाँव के मौसम से-
निरंतर गुज़रती रही -
उल्लसित जीवन जीने का-
सतत प्रयास करती रही ........!!!
ज़िन्दगी से प्रीत निभाती रही ............!!!!!!

21 comments:

  1. सुख के बाद -
    अब दुःख की घाटी
    सुन्दर रचना... धूप छांव के खेल से तादात्म्य स्थापित करता अथक प्रयास चलता रहे!

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  2. यही प्रीति जीवन के विविध अध्याय लिखती है, वह भी हमारे भविष्य में।

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  3. "...हे ईश -ऐसा दो शीश पर आशीष
    जी सकूँ निर्भीक जीवन ....."

    बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति!

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  4. अरे वाह!
    यहाँ तो पहली बार ही आया हूँ!
    --
    यहाँ तो बहुत सुन्दर रचना है!
    बढ़िया लेखन के लिए बधाई!

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  5. बहुत सुन्दर कविता...
    पहली बार आपके ब्लॉग पे आया हूँ..अच्छा लगा :)

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  6. सुन्दर अभिव्यक्ति

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  7. प्रशंसा के लिए ह्रदय से आभार ....!!

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  8. अनुपमा ही रहो , अपराजिता वैसे ही बन जाओगे . बहुत दिनों बाद ... सुन्दर रचना .

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  9. करील से क्षण , शानदार अभिव्यक्ति ।

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  10. A very true expression of your real in."Very nice composition"

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  11. बहुत सुन्दर कविता...
    पहली बार आपके ब्लॉग पे आया हूँ.

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  12. वाह पहली बार पढ़ा आपको बहुत अच्छा लगा.
    आप बहुत अच्छा लिखती हैं और गहरा भी.
    बधाई.

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  13. अनुपमा जी
    नमस्कार
    बहुत अच्छा लिखती हैं आप ....जीवन के वास्तविक सन्दर्भों को बखूबी उतरा है आपने अपनी लेखनी से ....बहुत - बहुत शुभकामनायें

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  14. सबका किस्सा ऐसी ही विसंगतियों का हिस्सा है ।
    प्रीति निभाती रही .....
    प्रशंसनीय रचना ।

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  15. एक बेहतरीन रचना ।
    काबिले तारीफ़ शव्द संयोजन ।
    बेहतरीन अनूठी कल्पना भावाव्यक्ति ।
    सुन्दर भावाव्यक्ति

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  16. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति
    सादर बधाई....

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  17. मन के सभी भावों को बेहतरीन शब्द दिए हैं आपने.
    सुन्दर अभिव्यक्ति.

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  18. कभी धूप कभी छाँव के मौसम से-
    निरंतर गुज़रती रही -
    उल्लसित जीवन जीने का-
    सतत प्रयास करती रही ........!!!
    ज़िन्दगी से प्रीत निभाती रही ........!!!!!!

    sundar...
    prernadayak....!!

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