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13 October, 2010

पथिकवा रे ...अब कहाँ ...?

जीवन की सूनसान डगर में ..
बसता फिर अनजान नगर में ..
मील के पत्थर अनेकों ..
राह की शोभा बढाते ..
मधुर भावों से सुसज्जित ..
गीत तेरा साथ देते ...!!
बीच काँटों की पड़ी 
इस ज़िन्दगी में ..
फूल की माला बनाते ...!!

ढोल नगाड़े लेकर संग में ...
जंगल में मंगल करता चल ...
आगे ही आगे बढ़ता चल ...!!

जंगल में मंगल हो कैसे ..
गीत सुरीला संग हो जैसे ...
धुन अपनी ही राग जो गए ..
संग झांझर झंकार सुनाये ...
सुन-सुन विहग भी बीन बजाये ..
घिर-घिर बदल रस बरसाए ..
टिपिर- टिपिर सुर ताल मिलाये ...
मन मयुरवा पंख फैलाये ..
पुलकित व्योम सतरंग दिखाए ..
विविध रंग जीवन दर्शाए ...
जंगल में मंगल हो ऐसे ...!!
       धानी सी ओढ़े है चुनरिया ..
       संग तेरे ये कौन गुजरिया ..
        ले कर इसको -
         संग-संग अपने ...
         जी ले तू -
       जीवन  के सपने ..!!

ठौर ठिकाना लेकर अपना ..
बुनता है क्या ताना -बना ..?
मौन उपासना रख ले मन में ..
आग लक्ष्य की प्रज्जवल  उर में .. 
शक्ति है जब तेरे संग में ..
वक़्त की अंगड़ाइयों  को 
देखता क्या ..? 
तम से ही तुझको लड़ना है ..
रैनका सपना बीत चुका अब ..
आगे ही आगे बढ़ाना है ...!!
राह की कठिनाइयों से जूझता  ..
झूमता ..रमता ..चला जाता है ..
ओ  बटोही ..
पथिकवा रे ...कहाँ ...?
अब कहाँ ...?

17 comments:

  1. जीवन की सुनसान डगर में ,
    जंगल में मंगल करता चल ,
    ओ बटोही ! पथिकवा रे !!
    बहुत खूब . दूसरे में ध्वनि खूब जमी है .
    पर पते की बात तीसरे में ज्यादा है .

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  2. जीवन की अन्चीन्ही राहें, बढ़े चलाचल।

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  3. चल चला चल!
    बहुत खूब!
    आशीष
    --
    प्रायश्चित

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  4. बहुत प्यारी रचना |बधाई
    आशा

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  5. badhai.
    videsh main rahkar hindi ki behatrin rachna likhtin hain aap.

    PLEASE COME FORWARD & JOIN SANSKRITI SANRAKSHAN AUR SANSKAR PALLAWAN ABHIYAN.

    cbjainbigstar.blogspot.com

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  6. मौन उपासना रख ले मन में -
    आग लक्ष्य की प्रज्जवल उर में -
    शक्ति है जब तेरे संग में -
    वक्त की अंगड़ाइयों को देखता क्या ....?
    तम से ही तुझको लड़ना है -
    रैन का सपना बीत चुका अब-


    बहुत प्रेरणादायक रचना ....टेक्स्ट का रंग पढने में कठिनाई हुई ..

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  7. सजीव चित्रण - अति सुंदर
    "धानी सी ओढ़े है चुनरिया
    संग तेरे ये कौन गुजरिया
    लेकर उसको संग -संग अपने
    जी ले तू जीवन के सपने
    ठौर -ठिकाना लेकर अपना
    बुनता है क्या ताना -बाना"

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  8. उत्साहवर्धक रचना. बहुत खूब.

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  9. दीप पर्व की हार्दिक शुभकामनायें ...

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  10. दीप पर्व की हार्दिक शुभकामनायें ... ...

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  11. वाह....

    क्या कहूँ...?????

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  12. तम से ही तुझको लड़ना है ..
    रैनका सपना बीत चुका अब ..
    आगे ही आगे बढ़ाना है ...!!
    राह की कठिनाइयों से जूझता ..
    झूमता ..रमता ..चला जाता है ..
    ओ बटोही ..
    पथिकवा रे ...कहाँ ...?
    अब कहाँ ...?

    अहा! सुन्दर अनुपम प्रस्तुति.
    कहाँ से भर देतीं हैं इतना रंग
    आप अपनी प्रस्तुति में.

    प्रेरक जगाती हुई शानदार
    अभिव्यक्ति के लिए आभार,अनुपमा जी.

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  13. बहुत ही सुन्दर भावो को पिरोया है।

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  14. वाह ...बहुत बढि़या ।

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  15. बहुत ही अच्छा संदेश दिया है।

    सादर

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