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13 September, 2010

पिया घर आये ......!!!-20



घोर प्रतीक्षा के दिन बीते -
आनंदित पल थे जो रीते --

मुखरित सी अब मूक विधाएं -
स्पंदनरत निस्पंद दिशाएं-



नैनन का कजरा भी बोले -

भेद जिया के पल-पल खोले -
श्लथ था मन अब अति हुलसाये -
धन धन भाग पिया घर आये ........!!!!!!!

16 comments:

  1. संगीत की तरह सुमधुर भाव प्रवाह

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  2. नैनन का कजरा भी बोले -
    भेद जिया के पल-पल खोले -
    मृत था मन अब अति हुलसाये -
    धन धन भाग पिया घर आये ........!!!!!!!
    बहुत अच्छा लिखा है।

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  3. bhabhiji aapki hindi to bahut hi acchi hai....kya kya words use kiye hai aapne....kavitayen padkar to main aapki fan ho gayi hoon.......ek ek kavita man ko choo jaati hai..bhavanao se oat proat hai....
    with regards
    Prerna

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  4. कोमलता, सरलता और प्रेम की मधुर मिश्री।

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  5. नैनन का कजरा भी बोले -
    भेद जिया के पल-पल खोले -
    मृत था मन अब अति हुलसाये -
    धन धन भाग पिया घर आये ......

    यूँ लगा किसी छायादी कवी की पंक्तियाँ पढ़ रही हूँ .....!!

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  6. हरकीरत जी-आप उस गहराई तक पहुँच पायीं मुझे हर्ष है-
    अगर कभी अपने आस -पास भगवन को महसूस करें ऐसी ही ख़ुशी होती है जैसे पिया के आगमन पर होती है
    -अनेक धन्यवाद .

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  7. कविता पसंद के लिए -
    आप सभी की आभारी हूँ -

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  8. आदरणीया अनुपमा जी

    संक्षिप्त अवश्य है आपकी रचना , इसलिए श्रेष्ठ सृजन से सुदीर्घ साक्षात् की कामना अतृप्त रही …
    किंतु फिर भी कहूंगा देखन में छोटी सही , घाव किया गंभीर …!

    कुछ शब्द आपको सादर समर्पित हैं …

    अनुपम अनुपम अनुपमा , उपमा ना उपमान !
    शब्द भाव रच' सजन का , सहज किया सम्मान !!


    शुभकामनाओं सहित …
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  9. राजेंद्र जी -आपके सुचारू भावों के लिए
    अनेक धन्यवाद .
    Atul,Prerna,Shobha ji,Praveen ji,Parul ji,-thanks a lot for the appreciation.

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  10. वाह री सजनी क्यों सकुचाए..
    हाथों में मुखडा काहे छुपाये..
    पिया घर आये तो नैन मिलाओ
    अपने पिया से यूँ ना शर्माओ.

    हा.हा.हा.

    आपकी कविता पढ़ कर...ये पंक्तियाँ यूँ ही लब पर आ गयी...

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  11. प्रेम . माधुर्य का समन्वय ।

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  12. मधुर होने के लिए एक बूँद की पर्याप्त है, अतीव मधुर रचना,
    हार्दिक शुभकामनाएँ!

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