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15 June, 2010

सुकृती----पहचान मेरी -8

देखती थी आइना फिर सोचती थी
कौन हूँ मैं ..?क्या करूँ मैं ....?
कुछ करूँ मैं...... कुछ बनूँ मैं .....!!
कुछ बने पहचान मेरी ......!

खिली -खिली मन की बगिया -
तितली बन जाऊं .....?
अद्भुत सुंदर जीवन ....!!!!
फिर भी चैन न पाऊँ ।

सांझ ढले मंदिर का दीपक
रोज़ जलाऊँ ...
प्रभु चरणों में शीश नवाऊँ -
चैन न पाऊँ...

कर्म रथ पर--
जीवन पथ पर --
कर्म निरंतर करते करते -
धन ये पाया --
देखा मैंने --- आकृती है साथ मेरे --
मेरी छाया.......!!
डोर थी एक मन में मेरे -
जोश था वो साथ देता ...
खींच लाइ मन को मेरे-
बन गयी फिर एक काया ...!!

आकृती से स्वकृति ---
फिर सुकृती ...
बन गयी पहचान मेरी ...!!!
देखती हूँ आइना अब सोचती हूँ ---
सुकृती ---पहचान मेरी !!!!!!!
सुकृती- पहचान मेरी !!!!!!!!!!!

9 comments:

  1. स्वयं से संवाद - अच्छा है . स्वयं संवाद को विश्व संवाद बना लो . और मज़ा आएगा . साथ ही और बिम्बों का इस्तेमाल शायद अनुभवों की वैविध्यता को और भी ला सके . नहीं तो बिम्बों का गुंजन ज्यादा खुद को दोहराता हुआ सा लगने लगेगा . बस इतना ही

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  2. मन को छू लेने वाली कविता लिखी है आपने। बधाई।

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  3. सुन्दर, सशक्त और सार्थक रचना...शुभकामनाएं।

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  4. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल कल 01-09 - 2011 को यहाँ भी है

    ...नयी पुरानी हलचल में आज ... दो पग तेरे , दो पग मेरे

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  5. स्वसंवाद...!!
    खुबसूरत अभिव्यक्ति...
    सादर...

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  6. डोर थी एक मन में मेरे -
    जोश था वो साथ देता ...
    खींच लाइ मन को मेरे-
    बन गयी फिर एक काया ...!!

    बेहतरीन।

    सादर

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  7. आत्म मंथन स्वयं से संवाद अपनी पहचान की तलाश ..बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति !!!

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