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23 July, 2010

झर- झर ......मनहर ..!!-16

झर -झर प्रमोद -
कल -कल निनाद --
झिमिर -झिमिर मन --
तिमिर तिमिर तोड़ --
झर -झर मनहर
झरता ये झरना -
प्रकृति की अनुपम रचना ॥

झुरमुट सी झाड़ियों में -
सूनी सी वादियों में -
झर -झर मनहर ---
हर्षित प्रफुल्लित मुदित --
गुंजित अद्भुत संगीत --

जल की कल -कल करती -
मचलती सी राग --
भर अतुलित अनुराग --
है सुर -ताल का सुमधुर संवाद -
या कृष्ण -गोपियों का --
रसिक रास ..........!!
झर- झर मनहर --
बूँद -बूँद प्रेम -रस विभोर .....!
किलक-किलक थिरकत --
नाचत मन मोर --झर झर मन हर -
झरता ये झरना ----
प्रकृति की अनुपम रचना .....!!!!



13 comments:

  1. सार्थक और बेहद खूबसूरत,प्रभावी,उम्दा रचना है..शुभकामनाएं।

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  2. झर- झर मनहर --
    बूँद -बूँद प्रेम -रस विभोर .....!
    किलक-किलक थिरकत --
    नाचत मन मोर --झर झर मन हर -
    झरता ये झरना ----
    प्रकृति की अनुपम रचना .....!!!!

    गजब कि पंक्तियाँ हैं ...

    बहुत सुंदर रचना.... अंतिम पंक्तियों ने मन मोह लिया...

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  3. अनुपमा, बहुत सुंदर रचना. अनुराग

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  4. ध्वन्यात्मकता ने रचना की अर्थवत्ता द्विगुणित कर दी है ।

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  5. संगीत की लयात्मकता रचना में पूर्ण रूप से उपस्थित है . बहुत अच्छा .

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  6. अनुपमा जी आपकी "झरना कविता" पढ़कर मुझे संत तुलसीदासजी की "कंकन किंकिनी नूपुर धुनी सुनी" की याद ताजा हो आई.

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  7. --झर झर मन हर -

    रस प्लावित करती रचना

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  8. प्रकृति का खूबसूरत चित्रण |
    सुन्दर रचना |

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  9. बहुत अच्छा लगा यह शब्दचित्र!

    सादर

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  10. बहुत सुन्दर कविता .. दिल में प्रकृति के प्रति प्रेम जगाती हुई...
    आभार
    विजय
    -----------
    कृपया मेरी नयी कविता " फूल, चाय और बारिश " को पढकर अपनी बहुमूल्य राय दिजियेंगा . लिंक है : http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/07/blog-post_22.html

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  11. बेहद खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

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