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14 July, 2010

जियरा -14



उड़ता -फिरता बादल की तरह -
फैला जीवन है कठिन बड़ा -

रागों की माला मैं कैसे गाऊँ ?
लोरीकी धुन भूल न जाऊं -

मोम सा पिघलाव ह्रदय में -
विस्तृत अम्बर ममता का आंचल-

लालन निहारन तरस रहा जियरा -
नैना बदरी बन बरस रहा जियरा -

4 comments:

  1. किसी कि यादों का सरमाया लगती है यह रचना . लोरी , ममता, लालन यानि माँ कि याद आ रही है शायद .

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  2. ऐसी कवितायें रोज रोज पढने को नहीं मिलती...इतनी भावपूर्ण कवितायें लिखने के लिए आप को बधाई...शब्द शब्द दिल में उतर गयी.

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  3. भावपूर्ण रचना के लिये बधाई !

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  4. सुन्दर भावों से सजाई रचना....

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