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20 November, 2014

सुरलहरी ...

शीत का पुनरावर्तन ,
जागृति प्रदायिनी ,
उमगी सुनहली प्रात,.....!!

अलसाई सी ,गुनगुनी धूप ,
गुनगुनाती हुई स्वर लहरियाँ,
शब्दों की धारा सी ...
शांत बहती नदी ...
और ...
 हृदय में अंबर का विस्तार ,
मेरे मन के दोनों किनारों को जोड़ता
एक सशक्त पुल .....
नयनाभिराम सौन्दर्य देते पल...!!

और कुछ शब्दों की माला पिरोता....
गाता मेरा मन ...
आओ री आओ री आली
गूँध गूँध लाओ री ,
फूलन के हरवा ....!!''



13 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (21.11.2014) को "इंसान का विश्वास " (चर्चा अंक-1804)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

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  2. मेरी कृति चर्चा मंच पर लेने हेतु आपका हृदय से आभार राजेंद्र कुमार जी !!

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  3. वाह... शरद के आगमन की सुंदर सुरलहरी

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  4. सुरलहरी .... नाम के अनुरूप अभिव्‍यक्ति
    अनुपम भाव

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  5. मन के तारों को झंकृत करते शब्द ...

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  6. बहुत सुन्दर

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  7. गूंध-गूंध लिया है इस फूलन के हरवा को..

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  8. मुझे आपका blog बहुत अच्छा लगा। मैं एक Social Worker हूं और Jkhealthworld.com के माध्यम से लोगों को स्वास्थ्य के बारे में जानकारियां देता हूं। मुझे लगता है कि आपको इस website को देखना चाहिए। यदि आपको यह website पसंद आये तो अपने blog पर इसे Link करें। क्योंकि यह जनकल्याण के लिए हैं।
    Health World in Hindi

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  9. फूलन के हरवा... अहा! मन मोह लिया इस शब्द ने. बहुत सुन्दर रचना, बधाई.

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  10. आपकी कविता पढ कर ये संसार और भी खूबसूरत नज़र आने लगता है।
    सुनहली प्रभात अलसाई दोपहरी, शब्दों सी शांत बहती नदी और मन में अंबर का विस्तार वाह, पर आज कोहरे के परदे के पीछे है यह सब।

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