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30 June, 2014

ओ मासूम ज़िन्दगी। ....!!

समय जब भी असमय
 छीन  लेता  है
कुछ मासूम चेहरों से
मुस्कराहट,
आवृत सा कुछ  होता है,
जो बनता है मौन ताकत   …… !!

धीरे धीरे कड़ी जुड़ती है ,
इस मौन ताकत में ,
प्राची के पट खुलते  ही ,
होने लगता है शोर
 इस ताकत का
तब टूटने लगता है मौन   …
उदासी का ...!

आहत  मन सुनता है
आहट जीवन की  …!!
और चल पड़ती है  ज़िन्दगी फिर......!!

तब सुनाई देती है ,
वही प्रार्थनारत आवाज़ें ,
अगर मेरे शब्दों में ताकत है
अगर मेरी प्रार्थना में बल है
तो दर्द लेकर भी ह्रदय में अपने,
सुनकर मेरे शब्दों की सदा ,
तुम्हें फिर उठना होगा ,
तुम्हें फिर हँसना होगा  …
ओ मासूम ज़िन्दगी। ....!!

26 comments:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।

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    1. हृदय से आभार रविकर जी ....!!

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  2. बहुत सुन्दर भाव .........

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  3. आपकी लिखी रचना बुधवार 02 जुलाई 2014 को लिंक की जाएगी...............
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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    1. हृदय से आभार यशोदा ....!!

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  4. प्रार्थना में अकूत बल है...जो जिन्दगी के चेहरे पर फिर से मुस्कुराहट लाने में सक्षम है...सुंदर भाव अनुपमा जी !

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  5. Thats life :)
    bahut hi sundar kavita hai :) Very beautiful!!

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  6. Thats life :)
    bahut hi sundar kavita hai :) Very beautiful!!

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  7. जिन्द्स्गी की और आशा भरी नज़र से देखती रचना ... प्रेरित करते भाव ...

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  8. ब्लॉग बुलेटिन की 900 वीं बुलेटिन, ब्लॉग बुलेटिन और मेरी महबूबा - 900वीं बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  9. हृदय से आभार सलिल जी ....!!

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  10. ये निराशा के प्रहर बीतेंगे दुख की शिकनें दूर कर फिर प्रसन्नता और उछाह छायेगा - प्रार्थना में बहुत बल है !

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  11. निराशा की रात से आशा के उजाले की ओर.. सुंदर कविता

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  12. Aise aahwan zindgi ko sunne hi honge!

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  13. बहुत सार्थक और भावपूर्ण रचना...

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  14. अगर मेरे शब्दों में ताकत है
    अगर मेरी प्रार्थना में बल है
    तो दर्द लेकर भी ह्रदय में अपने,
    सुनकर मेरे शब्दों की सदा ,
    तुम्हें फिर उठना होगा ,
    तुम्हें फिर हँसना होगा …
    ओ मासूम ज़िन्दगी। ....!!

    बहुत सुन्दर भाव
    अतुलनीय


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  15. आशा का संचार करती सुन्दर पंक्तियाँ |

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  16. भावपूर्ण रचना

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  17. बहुत सार्थक और भावपूर्ण रचना...

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  18. दृढसंकल्पित हो कर्म-अभिरत चलने को प्रेरित करती हुई कविता.

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