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19 September, 2014

क्षणिकाएं.....!!

रे मन
प्रेम पर  ठहरी हैं
झील  सी गहरी हैं
तोरे मन की बतियाँ ......
********************
प्रवृत्ति है ये जल की ,
जल  भी
जब कभी नदी सा
कल कल कल कल ....
बह नहीं पाता
तब भी रुका हुआ .....
यह जल ,
सरोवर में,
ठहरा हुआ ,
शब्दों    के  हृदय कमल
  है खिलाता !!

14 comments:

  1. हृदय से आभार यशोदा ....!!

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  2. सुन्दर और सार्थक भावनाएं..

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (20-09-2014) को "हम बेवफ़ा तो हरगिज न थे" (चर्चा मंच 1742) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    Replies
    1. हृदय से आभार शास्त्री जी ...!!

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  4. http://raaz-o-niyaaz.blogspot.com/2014/09/blog-post.html

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  5. भावो की अभिवयक्ति......

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  6. मन के भावो को खुबसूरत शब्द दिए है अपने.....

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  7. "सरोवर में हृदय कमल है खिलाता"
    निहायती खुबसुरत भाव जो महसूस किया जा सकता है।

    कभी मेरे ब्लॉग तक भी पधारिये मुझे अच्छा लगेगा पासबां-ए-जिन्दगी: हिन्दी

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  8. मन पर तिरते शब्द मानो जल पर खिले कमल ...सुंदर बिम्ब...

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  9. इसका खिलना यूँ ही जारी रहे. सुन्दर रचना.

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  10. जल भी भे कल कल ... कमल भी खिले पल पल ...
    यूँ ही चलता रहे जीवन पल पल ...

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