नमस्कार ....!!आपका स्वागत है ....!!

नमस्कार ....!!आपका स्वागत है ....!!
नमस्कार ....!!आपका स्वागत है ....!!

28 August, 2014

प्रीतिकर झरे प्रतीति !!!!!!

दादुर ,मोर ,पपीहा गायें,
...रुस रुस राग मल्हार सुनायें ,
बूंदों की लड़ियों में रिमझिम ,
गीत खुशी के झूमें आयें

टप टप गिरती,झर झर झरतीं
रिमक झिमक पृथ्वी पर पड़तीं
आयीं मन बहलाने लड़ियाँ
जोड़ें जीवन की फिर कड़ियाँ...!!

चलो बाग हिंडोला  झूलें
दिन भर के दुख फिर से भूलें...!!
ऊंची ऊंची लेकर पींगें,
मन मोरा रसधार में भींगे...!!

छम छम पैजनियाँ सी बजतीं
आहा ,  प्रीतिकर झरे प्रतीति !!!!!!

17 comments:

  1. प्रीतिकर झरे प्रतीति ....
    मधुर गीत !

    ReplyDelete
  2. दीदी, मजा आ रह है इस पढ़ने में अभी! बारिश का मौसम है, और ऐसी खूबसूरत कविता :)

    ReplyDelete
  3. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (29.08.2014) को "सामाजिक परिवर्तन" (चर्चा अंक-1720)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

    ReplyDelete
    Replies
    1. हृदय से आभार आपका राजेंद्र जी ....!!

      Delete
  4. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (29.08.2014) को "सामाजिक परिवर्तन" (चर्चा अंक-1720)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

    ReplyDelete
  5. बहुत सुन्दर और मनभावन गीत...

    ReplyDelete
  6. अकेले 'रूस रूस' ने मन में आनंद भर दिया :)

    ReplyDelete
  7. छम छम पैजनियाँ सी बजतीं
    आहा , प्रीतिकर झरे प्रतीति !!!!!!

    पढ़ते पढ़ते मन जैसे भीगने लगा..

    ReplyDelete
  8. बहुत सुंदर रचना

    ReplyDelete
  9. झर-झर झरती सुंदर रचना।

    ReplyDelete
  10. बहुत सुंदर रचना और लाजवाब तस्‍वीर..

    ReplyDelete

  11. मन को छूती सुन्दर रचना ---
    सादर ---

    आग्रह है --मेरे ब्लॉग में भी शामिल हों
    भीतर ही भीतर -------

    ReplyDelete

नमस्कार ...!!पढ़कर अपने विचार ज़रूर दें .....!!