नमस्कार ....!!आपका स्वागत है ....!!

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23 July, 2010

झर- झर ......मनहर ..!!-16

झर -झर प्रमोद -
कल -कल निनाद --
झिमिर -झिमिर मन --
तिमिर तिमिर तोड़ --
झर -झर मनहर
झरता ये झरना -
प्रकृति की अनुपम रचना ॥

झुरमुट सी झाड़ियों में -
सूनी सी वादियों में -
झर -झर मनहर ---
हर्षित प्रफुल्लित मुदित --
गुंजित अद्भुत संगीत --

जल की कल -कल करती -
मचलती सी राग --
भर अतुलित अनुराग --
है सुर -ताल का सुमधुर संवाद -
या कृष्ण -गोपियों का --
रसिक रास ..........!!
झर- झर मनहर --
बूँद -बूँद प्रेम -रस विभोर .....!
किलक-किलक थिरकत --
नाचत मन मोर --झर झर मन हर -
झरता ये झरना ----
प्रकृति की अनुपम रचना .....!!!!



16 July, 2010

वट-वृक्ष-15





अडिग अटल विराट -
वृक्षों का सम्राट ...!!
सदियों से -धरा पर मौन खड़ा  -
जीवन चलचित्र देखता -
यह वट वृक्ष ...!!!





घनी -घनी छायाहै इसकी -
आस्था सा पक्का चबूतरा -
आशा और विश्वास के-

कच्चे धागों से लिपटा ....!!

वक्त का चक्र चलते -चलते ,
कहाँ से कहाँ तक -------

पर कहता सदियों पुरानी-
अपनी वही कहानी .....

कैसे आज भी --
सुहाग की थाली सजाये -

नैनन में कजरा - माथे पे बिंदिया -
मांग में प्रियतम का सिन्दूर --

अपर्णा के साथ वटवृक्ष पूजन ...!
नाक में छोटी सी नाथ --
सर लिहाज़ से ढका हुआ --
अलबेली नार कर श्रृंगार--
सकुचाई सी खड़ी--
वट पूजने को ..........!!!!!

सावित्री का तप उज्जवल -सार्थक है ..
सत्यवान का सत्य -जीवन शाश्वत है ...!!!!

14 July, 2010

जियरा -14



उड़ता -फिरता बादल की तरह -
फैला जीवन है कठिन बड़ा -

रागों की माला मैं कैसे गाऊँ ?
लोरीकी धुन भूल न जाऊं -

मोम सा पिघलाव ह्रदय में -
विस्तृत अम्बर ममता का आंचल-

लालन निहारन तरस रहा जियरा -
नैना बदरी बन बरस रहा जियरा -

08 July, 2010

सागर की व्यथा ...!!-13


एक बूँद पहुंची सागर घर -
हाल-चाल सागर का लेने -
देख- अचंभित ..!!खड़ी मूर्तिवत -
सोच रही यूँ मन में अपने -
बूँद- बूँद से तो सागर बनता -
बनकर सागर भी सागर-
फिर व्यथित क्यों रहता ....?

कहने लगा हंसकर सागर फिर -
विस्तार तुमने देखा -
विस्तार तुमने जाना -
विस्तार तुमने लिया -
सभ्यता तुमने पाई  -
व्यथा भी तो देखो ......
प्रकृति के नियम का -
परिणाम भी तो देखो --

बूँद एक पल को मुस्कुराई -
जब बात समझ में आई -
कहती है सागर से फिर वो-
बुलबुला है मन का -उठता है -
फूट जाता है ----
क्षण भर का आवेग है -
आता है चला जाता है --
सागर सा विस्तार अगर है --
फिर सागर को क्या डर है ॥?

सह जाए प्रारब्ध --
उसे तो सहना है --
मंथन कर ढेरों विष -
फिर अमृत ही बहना है --
अमृत ही बहना है ........!!!!!!