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07 August, 2013

रे माया ठगिनी हम जानी ....

रे माया ठगिनी हम जानी ....!!

प्रेम पियासी आकुल कोयल ...
..बोलत मधुरि  बानी ....
उन  हिरदय पिघलत नाहीं इक पल   ......
मन कछु  और ही ठानी ...

रे माया ठगिनी हम जानी ....

पंच तत्व अवगुण मन अतहीं......
पीर न जिय  की जानी ...
जानत नाहीं भरे   गुण भीतर ...
जगत फिरत अभिमानी ...

रे माया ठगिनी हम जानी ....


झर झर पीर झरे नयनन सों........
प्रभु बिलोकि तब जानी  .....
निर्गुण के गुण राम मिले जब  .....
तज माया हुलसानी .....


रे माया ठगिनी हम जानी ......

34 comments:

  1. दीदी
    शुभ प्रभात
    एक अच्छी सारगर्भित कविता
    सादर

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  2. इश्वर की माया के सामने इन्सान हमेशा ही बौना रहेगा . चाचा जी को श्रद्धाजलि सुमन अर्पित .

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  3. सब जानी पर कुछ न कर पानी ! :)

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  4. अपने मन हम सबहिं नचावत

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  5. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल गुरुवार (08-08-2013) को "ब्लॉग प्रसारण- 79" पर लिंक की गयी है,कृपया पधारे.वहाँ आपका स्वागत है.

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    Replies
    1. राजेंद्र जी ...हृदय से आभार मेरी रचना ब्लॉग प्रसारण पर लेने के लिए ....!!

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  6. रे माया ठगिनी हम जानी ......सारगर्भित सुन्दर रचना..

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  7. उत्कृष्ट सारगर्भित प्रस्तुति

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  8. झर झर पीर झरे नयनन सों........
    प्रभु बिलोकि तब जानी .....
    निर्गुण के गुण राम मिले प्रभु .....
    तज माया हुलसानी .....

    हृदय से निकले उद्गार..

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  9. वाह.............
    औलोकिक.................

    सस्नेह
    अनु

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  10. माया तो ठगिनी ही होती है, बहुत सुंदर प्रस्तुति

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  11. बहुत सुंदर, शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  12. बहुत सुंदर भाव ... अलौकिक रचना ।

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  13. हृदय से निकले लाजबाब अभिव्यक्ति,,,

    RECENT POST : तस्वीर नही बदली

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  14. बहुत ही सुंदर...... जाने फिर भी क्यूँ उलझे रहतें हैं हम ....

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  15. ठगिनी को हम जानी पर करे है अपनी ही मनमानी.. अति सुन्दर..बहुत ही सुन्दर..

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  16. कबीर याद हो आये...और यह तो बस - "निर्गुण के गुण राम मिले जब.." - आनंद दे गया.. :) ___/\___

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  17. कबीर याद हो आये...और यह तो बस - "निर्गुण के गुण राम मिले जब.." - आनंद दे गया.. :) ___/\___

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  18. माया महा ठागिनी हम जानी ,

    त्रिगुण फांस लिए करि जोरी ,

    बोले माधुरी वाणी।


    याद आ गया सहज ही यह पद आपको बांचकर पोस्ट का भाव और सार अनुकरणीय है।

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  19. झर झर पीर झरे नयनन सों........
    प्रभु बिलोकि तब जानी .....
    निर्गुण के गुण राम मिले जब .....
    तज माया हुलसानी .
    बहुत ही सुंदर ...

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  20. चित्रित बारिश की बूंदों में ठगिनी माया …. बहुत बढ़िया

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  21. रे माया ठगिनी हम जानी ........ अति सुन्दर

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  22. माया यह ठगिनी ही नहीं जादूगरनी भी है तभी तो सब सम्मोहित हो मंत्रमुग्ध से उसके इशारों पर अवश हो नाचते रहते हैं ! बहुत सुंदर रचना अनुपमा जी ! आभार !

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  23. झर झर पीर झरे नयनन सों........
    प्रभु बिलोकि तब जानी .....
    निर्गुण के गुण राम मिले जब .....
    तज माया हुलसानी .

    प्रभु मोरे अवगुण चित न धरो की भांति सन्देश और आग्रह से भरी पोस्ट बधाई

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  24. आभार आप सभी का ....मेरे हृदय के इन भावों से जुडने का ....

    झर झर पीर झरे नयनन सों........
    प्रभु बिलोकि तब जानी .....
    निर्गुण के गुण राम मिले जब .....
    तज माया हुलसानी .


    असत्य को ईश्वर रूपी सत्य मिल जाये तो माया अपनी माया भूल जाती है ...

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  25. बहुत सुन्दर अनु....

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  26. खूबसूरत प्रस्तुति

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