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16 December, 2013

कुछ शब्दों की लौ सी …




सृष्टि का एक भाग
अंधकारमय करता हुआ ,
 विधि के प्रवर्तन से बंधा
जब डूबता है सूरज
सागर के  अतल प्रशांत  में
सत्य का अस्तित्व बोध  लिए,
कुछ शब्दों की लौ सी,
वह  अटल आशा  संचारित  रही
मोह-पटल  के स्वर्णिम  एकांत  में .....!!

उस लौ के साथ
तब ....कुछ शब्द रचना
और रचते ही जाना
जिससे पहुँच सके तुम तक 
अंतस की वो पीड़ा   मेरी 
क्यूंकि शब्द शब्द व्यथा  गहराती है
टेर हृदय की क्षीण सी पड़ती 
पल पल बीतती ज़िंदगी 
मुट्ठी भर  रेत सी फिसलती जाती है ....!!


28 comments:

  1. sundar rachna ........antim panktiyo ne dil ko chu liya.........

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  2. सच कहा ..तिमिर के क्षणों में यही शब्द-दीप और उनकी आवलियाँ अनंत प्रकाश भरती रहती हैं. सुन्दर कृति.

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  3. शब्दों में लिपटी निकली है, पीड़ा मेरी।

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  4. कुछ शब्दों की लौ सी,
    वह अटल आशा संचारित रही
    मोह-पटल के स्वर्णिम एकांत में .....!!

    बहुत सुंदर भाव...मोह रत्रि कितनी भी घनी हो...स्वर्णिम प्रकाश छिपाए रहती है...

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  5. सच है यह जिंदगी रेत सा मुट्ठी से निकलती जा रही है !
    नई पोस्ट चंदा मामा
    नई पोस्ट विरोध

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  6. "जिससे पहुँच सके तुम तक
    अंतस की वो पीड़ा मेरी "

    अपनी सी...
    जैसे हो मेरे ही मन की बात!
    ***
    बेहद सुन्दर रचना!

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  7. कोमल भावपूर्ण रचना...

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  8. बेहद भावपूर्ण और सुन्दर प्रस्तुति

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  9. और यूँ ही रचते रहने से रेत भी हथेलियों से चिपका रहता है ..सुन्दर रचना..

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  10. बहुत ही उम्दा,भावपूर्ण प्रस्तुति...!
    RECENT POST -: एक बूँद ओस की.

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  11. समय का चक्र और सूरज वाह अद्भूत

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  12. सुन्दर प्रस्तुति अनुपमा जी

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  13. कुछ शब्दों की लौ सी,
    वह अटल आशा संचारित रही
    मोह-पटल के स्वर्णिम एकांत में ....

    मननीय अभिव्यक्ति।

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  14. सूर्योदय और सूर्यास्त ऐसे दो प्राकृतिक पर्तीक हैं जिनसे कई कहानियाम, कवितायें, दर्शन जन्म लेते रहे हैं.. आज आपने जो कविता लिखी वह इसी प्रतीक के माध्यम से प्रारम्भ होकर एक मौन प्रार्थना/पुकार प्रस्तुत करती है!! बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति!!

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  15. bahut sundar bhavpurn rachna..!!

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  16. जिंदगी पल पल फिसल रही है ... इसी दर्शन को सूर्य और अंधेरे के शांत लम्हों में उतारा है ... लाजवाब भाव ...

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  17. अंतस की पीड़ा के शब्द शब्द को उन तक पहुचाने में सफल सौम्य कविता ... बहुत सुंदर .....

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  18. सूर्य रश्मियों के सामान तेजोमय शब्दों में गुंथी और तमसो मां ज्योतिर्गमय की सीख देती पंक्तियाँ . बहुत सुन्दर कविता दी.

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  19. बहुत भावपूर्ण...
    पल पल बीतती ज़िंदगी
    मुट्ठी भर रेत सी फिसलती जाती है ....!!
    और अंतस की टीस यूँ ही शब्दों में सँवरती है. बधाई.

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  20. बहुत बहुत आभार आप सभी का मेरी रचना पर आपने अपने विचार दिये ...!!

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  21. पीड़ा - एक दिशा से उदित
    एक दिशा में अस्त
    पीड़ा सूर्य नहीं
    तो उदयाचल से अस्ताचल की यात्रा निश्चित नहीं
    ऐसे में शब्द सहयात्री होते हैं

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  22. सूर्यास्त से गहन पीड़ा का भाव लेते हुए शब्दों में उतरना .... सुन्दर प्रस्तुति

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  23. बहुत ही खूबसूरत रचना अनुपमा जी ! शुभकामनायें !

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नमस्कार ...!!पढ़कर अपने विचार ज़रूर दें .....!!