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09 January, 2014

चन्द्र तुम मौन हो .......



मैं विकारी ... तुम निर्विकार ...!!
निराकार मुझमे लेते हो आकार ,
रजनी के ललाट  पर उज्ज्वल
यूं मिटाते हो हृदय कलुष ,
मैं आधेय तुम आधार ....!!

मेरे मन के एकाकी क्षणो को
 तुम ही तो भर  रहे हो,
बताओ तो -
क्यूँ लगता है मुझे

मेरे हृदय के असंख्य अनुनाद,
वो अनहद नाद ,
सुन रहे हो
समझ रहे हो ...!!
तभी तो ..
भीगी हुई चाँदनी सरस बरस रही है
चन्द्र तुम मौन हो,
और ....मेरे निभृत क्षणों   को----------
झर झर भर रहा है
अविदित मधुरता सरसाता हुआ,
बरसता हुआ अविरल,
शुभ्र ज्योत्सना सा
तुम्हारा हृदयामृत  .....!!

***********************

निभृत -शांत सा ...एकाकी सा ...

23 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शुक्रवार (10-01-2014) को "चली लांघने सप्त सिन्धु मैं" (चर्चा मंच:अंक 1488) में "मयंक का कोना" पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    Replies
    1. हार्दिक आभार शास्त्री जी आपने मेरी कविता को चर्चा मंच पर स्थान दिया ...!!

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  2. मैं विकारी ... तुम निर्विकार ...!!
    निराकार मुझमे लेते हो आकार ,
    रजनी के ललाट पर उज्ज्वल
    यूं मिटाते हो हृदय कलुष ,
    मैं आधेय तुम आधार ....!!
    बहुत खुबसूरत पंक्तियाँ हैं |
    नई पोस्ट आम आदमी !
    नई पोस्ट लघु कथा

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  3. सुन्दर प्रस्तुति-
    आभार आदरणीया-

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  4. मन को कौन पूछे.. हृदयातल तक शीतल करती रचना. अति सुन्दर कृति.

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  5. बहुत बहुत खुबसूरत प्रस्तुति...

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  6. अनुपम भाव संयोजन .....

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  7. शुभ्र ज्योत्सना सा
    तुम्हारा हृदयामृत .....!!
    इतने सुंदर शब्द
    सुंदर भाव संयोजन !!

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  8. वाह अनुपमा जी, चाँद से भी बातें हो गयीं..उसने कुछ कहा तो होगा अगले गीत में लिख डालें

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  9. तुम्हारा हृदयामृत .....!!
    इतने सुंदर शब्द
    ..................सुंदर भाव संयोजन !!

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  10. मैं विकारी ... तुम निर्विकार ...!!
    निराकार मुझमे लेते हो आकार ,
    रजनी के ललाट पर उज्ज्वल
    यूं मिटाते हो हृदय कलुष ,
    मैं आधेय तुम आधार ....!!

    बहुत सुन्दर प्रस्तुति है काव्य सौंदर्य देखते ही बनता है।

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  11. बहुत सुन्दर कृति ...
    मकर सक्रांति की शुभकामनायें!

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    1. आभार आपको भी ....कविता जी ।

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  12. मकर सक्रांति की शुभकामनायें!

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    Replies
    1. आभार अमित जी ....आपको भी सपरिवार मकर संक्रांति की शुभकामनायें ।

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  13. चांदनी रात हो
    चाँद से बात हो
    अमृत रस की बरसात हो
    वाह वाह क्या बात हो ...।मनोहर प्रस्तुति

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  14. चांदनी रात हो
    चाँद से बात हो
    अमृत रस की बरसात हो
    वाह वाह क्या बात हो ...।मनोहर प्रस्तुति

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  15. चांदनी रात हो
    चांदसे बात हो
    अमृत रस की बरसात हो
    वाह वाह क्या बात हो । मनोहारी प्रस्तुति

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  16. चन्द्रमा की ज्योत्सना सी स्निग्ध, शीतल, अमृतमयी मधुर रचना ! अति सुंदर !

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