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06 June, 2021

निशाँ...!!




हवाओं में उड़ते हुए ,
तरन्नुम में तबस्सुम से 
महकते हुए
मुहब्बत के निशाँ
सुनो ......
कुछ तुम कहो कुछ मैं सुनूं ...!


रेत  पर चलते हुए , बहकते हुए 
जीवन सा चहकते हुए , 
बनते हुए क़दमों के  निशाँ ,
सुनो ... 
कुछ तुम चलो कुछ मैं चलूँ...!

जीवन को जीते हुए 
हँसते हुए रोते हुए 
हैं वक़्त के अनमोल  निशाँ 
सुनो ...
कुछ तुम लिखो कुछ मैं लिखूं !


अनुपमा त्रिपाठी
 "सुकृति "



11 comments:

  1. सुंदर रचना

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  2. मंत्रमुग्ध करती रचना - -

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  3. जीवन को जीते हुए
    हँसते हुए रोते हुए
    हैं वक़्त के अनमोल निशाँ
    सुनो ...
    कुछ तुम लिखो कुछ मैं लिखूं !..सच अगर ऐसा हो, तो इससे खूबसूरत क्या हो सकता है,सुंदर कृति ।

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  4. बहुत दिनों बाद लिंक पर आया हूँ...आपकी निरंतरता प्रेरक है...सुन्दर रचना...

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  5. निशाँ-ए-गुनगुन,
    कुछ हम, कुछ तुम।
    गहन अभिव्यक्ति..

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  6. कोमल भावपूर्ण रचना

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  7. हवाओं में उड़ते हुए ,
    तरन्नुम में तबस्सुम से 

    महकते हुए
    मुहब्बत के निशाँ
    सुनो ......
    कुछ तुम कहो कुछ मैं सुनूं ...

    बहुत सुंदर रचना

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  8. वाह!बहुत ही सुंदर सृजन।
    बहुत बहुत बधाई ।
    सादर

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  9. बहुत सुंदर रचना है।

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  10. सुहृद पाठकों का सादर धन्यवाद जिन्होंने यहाँ अपने विचार दिए !

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