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19 May, 2021

बारिश .....!!





बारिश .....!!

आच्छादित है बादलों से आकाश
कोइ व्यथा तो नहीं ,
बूंदों में कहता अपनी बात
कोइ कथा तो नहीं ...!

बोलो तो
चलते हुए समय को टोकोगे कैसे ?
बरसती हुई बूँदों को रोकोगे कैसे ?
कहीं भी कभी भी अलग अलग
हिस्सों में जो मिलती है
हंस हंस कर ,
झुक झुक कर
कभी रूठ कर
कभी मनाती
हुई ,
जिंदगी मेरी ही तो है
बिखरे हुए इन यादों के लम्हों को
जोड़ोगे कैसे ?

सरल हो भाषा तो  भी
अर्थ गहन होते हैं
अर्थ के भावों को माटी के मोल
तौलोगे कैसे ?

सुबह से शाम होती हुई जिंदगी को
लिख भी डालो लेकिन
जब तलक सूर्योदय न हो ह्रदय का 
रात की सियाही को
उजाले से जोड़ोगे कैसे  .....?

अनुपमा त्रिपाठी
   सुकृति

13 comments:

  1. एक सूर्योदय की तलाश जिंदगी भर चलती रहती है,बहुत सुंदर सृजन !

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  2. सूर्य उदय होते ही तो स्याही गायब हो जाएगी ....बहुत सुंदर अभिव्यक्ति ।👌👌👌👌

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  3. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर ( 3034...रात की सियाही को उजाले से जोड़ोगे कैसे...?) गुरुवार 20 मई 2021 को साझा की गई है.... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    Replies
    1. धन्यवाद आदरणीय रवींद्र सिंह यादव जी!

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  4. बहुत इ अनुपम सृजन !सच कहा जब तक सूर्योदय न हो ह्रदय का रात की कालिमा कभी उजाले से नहीं जुड़ती।
    बहुत सुंदर लिखा है ।
    बधाई साधुवाद।

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  5. बहुत ही अनुपम सृजन !सच कहा जब तक सूर्योदय न हो ह्रदय का रात की कालिमा कभी उजाले से नहीं जुड़ती।
    बहुत सुंदर लिखा है ।
    बधाई साधुवाद।

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  6. आज की स्थिति को इंगित करती भाव भरी उत्कृष्ट रचना । समय मिले तो मेरे ब्लॉग पर भी भ्रमण करें ।सादर शुभकामनाओं सहित जिज्ञासा सिंह ।।

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  7. बहुत सुंदर

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  8. बहुत बहुत सुन्दर सराहनीय रचना

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  9. बहुत सुंदर रचना अनुपमा जी, सरल हो भाषा तो भी
    अर्थ गहन होते हैं
    अर्थ के भावों को माटी के मोल
    तौलोगे कैसे ? सत्‍य कहा और झ‍िंझोड़ा भी क‍ि हर अर्थ में छुपी होती है एक अनंत भावाव्‍यक्‍त‍ि-----वाह

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  10. प्रकृति की कही समझने के लिये प्रकृति सी विशालता चाहिये हृदय को।

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