नमस्कार ....!!आपका स्वागत है ....!!

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26 January, 2011

सुख कल्पना...!!

जड़ को चेतन कर जाती है -
                    सुख कल्पना ..!!
दुःख में भी गहरा साथ निभाती है -
                    सुख कल्पना ..!!
सुधा सलिल की धार बनाती  है -
                    सुख कल्पना ..!!
घर आंगन अल्पना सजाती है -
                    सुख कल्पना ..!!
भूखे को रोटी की आस दिलाती है -
                    सुख कल्पना ..!!
एकाकी जीवन को मृदु राग सुनाती   है -
                    सुख कल्पना ..!!
भीनी खुशबु के  स्पर्श सा- छा जाती है -
                    सुख कल्पना ..!!
ठहरे जल को स्पंदन दे जाती है -
                      सुख कल्पना ..!!
तुम्हारे अस्तित्व का एहसास कराती  है -
                       सुख कल्पना ..!!
हाँ प्रभु चरणों तक खींच ले जाती है -
                       सुख कल्पना ..!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

20 January, 2011

लो फिर आई ऋतू बसंत

बुलबुल के चहकने से -
कोयल के कुहुकने से -
फूलों के महकने से -
प्रभु-कृति जीवंत ....!!  
लो फिर आई -
ऋतु  बसंत...!!
लिए संग-संग-
 सुरभि अनंत ...!!!
डार -डार पर रही है डोल-
गाती हुयी राग हिंडोल -

है कैसी कुसुमित अनुभूति -
बोल रही मृदु वचन बहार -
कितने अद्भुत रंग बिरंगे -
फूलों पर लायी निखार-
हरसूं झूम रही बहार -
ऋतु में बहार -
उर में बहार -
सुर में बहार समाया -
कितने दिनों के बाद 
पवन ने राग बहार है गाया  ...!!

पेरी पहन के अवनि
चपला सी लर्जाती  है-
अँचरा  की पीली सरसों -
खेतों में लहराती है-
लहर लहर अलमस्त -
राग बसंत गाती है  -


कड़ी धूप हो या हो पाला-
देखा था एक सपन निराला  -
 करता था  अनवरत  परिश्रम--
मन  में  नहीं था कोई भी भ्रम -
बोये थे मेहनत   के  बीज-
 सींचा था पसीने से-
अपनी बगिया को  माली ने-
अब  जो  फैली है खुशहाली -
ताकता है व्योम से भी -
धीमे से मुस्कुराता -
 कंचन  सा चमचमाता-
     अंशुमाली ....!!!


  



11 January, 2011

शुभप्रभात

आज है शुभप्रभात  -
गुनगुनी गुनगुनाती सी धूप में -
गुनगुना उठा है वातावरण  -
तीर सी चुभती -
हवा की ठंडक -
मिटती चली  जाती है -
नव -वधूसी आसमान 
ओढ़े है चुनरिया -
सुर्ख लाल माथे पर -
सूर्य की चमके-
ज्यों बिंदिया -
हल्का गुलाबी है-
चहुँ ओर का आवरण-
रंग बिरंगे खिल उठे हैं-
ह्रदय सुमन -
दूर ................देखो ..!!  -
ध्येय अब-
फिर निहारता  है -
लक्ष्य  अब-
फिर पुकारता   है -
चलो अब मत रुको  -
सुंदर से सुंदरतम पर हो-
हम सभी का  गमन -
भोर भई अब -
उल्लसित मन श्रवण करे -
अति सुमधुर कर्णप्रिय-
आलाप गायन ......!!
राग भैरव जैसा  -
चहक -चहक-
वृहग- वृन्दों का -
मंगल गीत गवन-
दूर .....क्षितिज पर -
सतरंगी रंग रंगा है -
मंगल कलश सजा है-
ध्येय नया सा शायद-
हाँ शायद ...!!-
दूर ......!!!!! -
कुछ दिखता तो है ...!!
अब फिर चल पड़ा है-
कौतुक मन -
संग लिए-
गाती हुई पवन ....!!



04 January, 2011

धुन्ध (DHUNDH)

रात अँधेरी सूनसान -
कैसी धुन्ध  में लिपटे हैं प्राण-
क्षीण सी होती जाती है दृष्टि 
व्यथा मिटा सके
 बरसे जो  नयन - वृष्टि -


कहाँ छुप गया है
 सभ्यता -संस्कृती का 
वो अनमोल खज़ाना -
जिसका डंका पीटता है -
आज भी सारा ज़माना-


हम क्यों बदलने पर आमादा हो गए ..?
आस्था के कच्चे धागे कहाँ खा गए ..?
पत्थर की पूजा करके -
कैसे मिलेंगे भगवान .? 
श्रद्धा भक्ति और सेवा का -
कौन करेगा अब गुणगान .?


काश बीत जाये ये शीतलहर ......!!
नष्ट हो हमारी सभ्यता पर छाया -
ये धुन्ध का कहर .....!!
शीत से थरथराता  कंपकपाता है मन -
नित्य ही करता है जप -
जीवन विलास  है या तप..?


बरसों से जाग-जाग कर -
की थी आराधना -
साध साध कर की थी साधना -
और किया था अंतर्मन का -
गहन अध्ययन ...!!
जैसे सागर मंथन से
 विषपान कर चुका था मन ...!!
गहराते तम  से -
सहसा हट गए नयन -


कैसे व्योम पर पहुंची मेरी दृष्टि -
शुभप्रभात की अमृत बेला -
देख रही थी सृष्टि .............!!!!
छंट चुकी थी धुन्ध ...!!
साफ़ दिख रही थी उषा की प्रथम किरण...
अकस्मात् ही गुनगुना उठा मेरा  मन -
न बदलेंगे हम -
न बदलने देंगे ज़माने को 
आओ शपथ लें ये  नया वर्ष मनाने को ........!!!!!