नमस्कार ....!!आपका स्वागत है ....!!

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10 May, 2021

रात्रि की निस्तब्धता में ...!!

 रात्रि की निस्तब्धता में ,

अप्रमित कौमुदी मनोहर ,

लब्ध होते इन पलों में ,
अप्रतिम जीवन धरोहर !!

कांस पर जब यूँ बरसती 
चांदनी भी क्या कहो , 
है मधुर यह क्षण विलक्षण
कांतिमय अंतस गहो !!



सार युग युग का सुनाने ,
आ रही है चन्द्रिका ,
गीतिका सा नाद गुंजन
गा रही है चन्द्रिका

कौन है ऐसा जिसे यह
ज्योत्स्ना से  प्रेम न हो  ,
बह रही शीतल समीरण
उर्वी से अनुरक्ति न हो !!

बुन  रहा फिर आज बुनकर
रैन के अनुनेह को ,
है मधुर यह क्षण विलक्षण 
कांतिमय अंतस गहो !!

अनुपमा त्रिपाठी
 "सुकृति "


05 May, 2021

जीवन ही तो है!!!

                                                                                    



 जीवन के पड़ाव और 

सूरज के उगने से 

सांझ के आने तक की यात्रा 

 तुम्हारे  मौन रहने से 

अनहद तक यूँ ही 

कुछ  कुछ कहते रहने की यात्रा ,

अनगिन शब्द 

कागज़ पर उकेरने की यात्रा

या 

मन के भाव 

कैनवास पर उभारने की यात्रा ,

मैं से मैं तक ,

अनेक यात्राओं में 

रहने ,बिखरने और सिमटने की यात्रा 

जीवन ,जीवन के लिए 

जीवन ही तो है !!!



अनुपमा त्रिपाठी 

 ''सुकृति ''


29 April, 2021

बन्दगी


कभी पूजा
कभी इबादत कभी आराधन 
जब भी मिलती है मुझे ,
भेस नया रखती क्यूँ है ,
ऐ बंदगी तू मुझे
नित नए रूप में मिलती क्यूँ है   ?

अनुपमा त्रिपाठी
"सुकृति "



26 April, 2021

आज मैं चुप हूँ

आज मैं चुप हूँ
कलम 
तुम बोलो ,
रस रंग
जिया के भेद, अनोखे खोलो

कठिन राह
जीवन की
अब तुम
सरल बनाओ
जब भी प्रेम
लिखो तुम निर्मल,
नद धार धवल बहाओ
और फिर चलो उठो मन
आज तुम भी गाओ

श्यामल बदरी की कथा 
बूंदन बरस रही
हरियाली धरती पर
खिल खिल हरस रही

जोड़ जोड़ अब शब्द
लिखो तुम मन की भाषा
जो कहती कहने दो
जीवन की अभिलाषा

साँस साँस में बसा जो जीवन
है अनमोल
लिख डालो कुछ शब्दों में
है जो भी इसका तोल

अनुपमा त्रिपाठी
"सुकृति "

20 April, 2021

लगता है कोई है कहीं ....!!!!!!!!!!!!!!


अनुनाद
अंतर्नाद  बन
आत्मसंवाद सा ,
छिपा होता  है
हृदय में इस तरह ,
हवा में सरसराते पत्तों की
आहाट  में कभी .......
लगता है कोई है कहीं    ..!!

कभी   ....
नदिया की धार सा
बहता है  जीवन ....
नाव खेते माझी सी
तरंगित लहरों पर...
कल कल छल छल
अरुणिमा की लालिमा ओढ़े,
गाती गुनगुनाती है ज़िंदगी ....,!!
लगता है कोई है कहीं ....

कभी गुलाब सी
काँटों के बीच यूं खिलती
मुसकुराती है   ,
अनमोल रचती
भाव की बेला सी ,
लगता है कोई है कहीं ...

कभी रात के अंधेरे में  भी ,
जुगनू की रोशनी सी ,
घने जंगल में भी ,
टिमटिमाती हुई
एक आस रहती है ,

लगता है कोई है कहीं !!

अनुपमा त्रिपाठी
  "सुकृति "

09 April, 2021

सखी फिर बसंत आया है

 किसलय की आहट है 

रँग की फगुनाहट है 

प्रकृति की रचना का 

हो रहा अब स्वागत है 


मन मयूर थिरक उठा 

आम भी बौराया है 

चिड़ियों ने चहक चहक 

राग कोई गाया है 


जाग उठी कल्पना 

लेती अंगड़ाई है 

नीम की निम्बोड़ि भी 

फिर से इठलाई है 


कोयल ने कुहुक कुहक 

संदेसा सुनाया है 

अठखेलियों में सृष्टि के 

रँग मदमाया है 


सखी फिर बसंत आया है 


अनुपमा त्रिपाठी

  "सुकृति"

26 September, 2020

आज भी ......!!!

आज भी .. ...
आज भी सूर्यांश की ऊष्मा  ने 
अभिनव मन  के कपाट खोले  ,
देकर ओजस्विता
किरणें चहुँ दिस  ,
रस अमृत घोलें  ..!!
आज भी चढ़ती धूप  सुनहरी ,
भेद जिया के खोले ,
नीम की डार पर आज भी
गौरैया की चहकन
चहक चहक  बोले ,
आज भी साँझ की पतियाँ 
लाई है संदेसा
 पिया आवन का , 
आज भी
खिलखिलाती है ज़िन्दगी 
गुनकर जो रंग ,
बुनकर सा हृदय आज भी 
बुन लेता है
अभिरामिक शब्दों को
आमंजु अभिधा में ऐसे ,
जैसे तुम्हारी कविता
मेरे हृदय  में स्थापित होती है ,
अनुश्रुति सी ,अपने
अथक प्रयत्न के उपरान्त !!
हाँ ..... आज भी ..!!


अनुपमा त्रिपाठी
 "सुकृति "