नमस्कार ....!!आपका स्वागत है ....!!

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20 May, 2022

अनहद

दूर से आती हुई आवाज़ भला कैसे सुनूं
मुझे अनहद पे यकीं आज भी बेइंतहा होता है
याद आता है स्पर्श माँ का जब भी
दिल के कोने में फिर इक ख़ाब सा महकता है
रुक रुक के चलते हुए कदमों की तस्लीम थकन
इस भटकन के सिवा  ज़िन्दगी में रक्खा भी क्या है ?
मुझको चाहो या भूलो पर ऐतबार तो करो
अपनी दानिश का वजूद हर सिम्त यूँ कहता क्या है !!


तस्लीम -स्वीकार करना
दानिश -शिक्षा
सिम्त -ओर ,तरफ।
अनुपमा त्रिपाठी 
   सुकृति

13 May, 2022

मन फिर मुस्काता है !!

जब

कभी किसी

उदास शाम की आगोश में

लिपटी मेरी तन्हाई ,

न कहती है ,

न कहने देती है ,

अपनी उदासी का सबब ,

गहराती सुरमई  साँझ

कजरारे नैनो के मानिंद

तब

पलकें उठाती है

और सोये हुए  खाब मेरे

फिर जी उठते हैं ... !!

हवा का इक झोंखा

सहलाकर माथे को

दूर कर देता है

माथे की शिकन

नायाब सा वो खाब

फिर इक बार

जगमगाता है , 

मन फिर मुस्काता है !!

मन फिर मुस्काता है !!

अनुपमा त्रिपाठी

"सुकृति "

07 May, 2022

शब्द वही होते हैं

शब्द वही होते हैं 
जुड़ते हैं तो वाक्य से वाक्या भी बनते हैं 
बुन लिए जाते हैं 
तो गर्माहट देते हैं 
गुन  लिए जाते हैं 
तो ज्ञान का अथाह सागर
स्पर्श करें जो भाव तो
समुद्र की लहरों से चंचल
तुम्हारे ...मेरे...
हाँ ... शब्द वही होते हैं ...!!!

अनुपमा त्रिपाठी
"सुकृति "

04 May, 2022

नदिया में बहते पानी सा मन !!!

नदिया में बहते पानी सा मन 

विचारों सा प्रवाहित जीवन 

उसपर बहती जीवन की नाव 

रे मन

सबका अपना अपना ठौर 

सबकी अपनी अपनी ठाँव !!


कोई धारा कोई किनारा

कोई ले आता मजधार

फिर भी कोई पेड़ों सी देता
 ठंडी ठंडी छाँव 
सबका अपना अपना ठौर 

सबकी अपनी अपनी ठाँव !!


अनुपमा त्रिपाठी 

"सुकृति "

01 May, 2022

संस्मरण ....Baroda days ...!!

संस्मरण ....Baroda days ...!!

 

कहते है -जैसे अपने मन के भाव होते है ...वैसी ही दुनियां दिखती है ....!!.भ्रम क्या होता है ...इसी पर कुछ लिखने का मन हुआ ..!!


बहुत दिनों पहले की बात है ..मेरे पतिदेव का वड़ोदरा  स्थानांतरण हुआ था ।हम नए नए ही पहुंचे थे नया घर सुसज्जित कर मन प्रसन्न था ।फ्रिज साफ़ करके जमाया तो हवा का एक झोंका जैसे पल को उदास कर गया ...''अरे सब्जी तो है ही नहीं ..!!"सोचा ..क्यूँ न बाज़ार से सब्जी ही ले आऊँ ..?और शाम को पतिदेव को बढ़िया  सा खाना  ही खिलाऊँ ..!!पिछले कुछ दिनों से ढंग से खाना घर में बना ही कहाँ था ..?प्रसन्न मुद्रा ...अपनी ही सोच में डूबी ....मन ही मन कुछ गुनगुनाती हुई सी ......सब्ज़ी मंडी  पहुंची !बहुत भाव-ताव करना उस समय आता नहीं था .........हाँ पतिदेव की ट्रेनिंग में अब बामुश्किल सीखा है ..!!वो भी शायद ढंग से नहीं ....!!सब्जी खरीद चुकी थी ।लौटते हुए बिलकुल ताज़ी ...हरी धनिया(कोतमीर) दिखी ...!!अरे वाह ...एकदम ताजी धनिया .....!!!हींग जीरे की छुंकी  दाल हो .......और ऊपर से धनिया पड़ा हो .....हमारे घर में खुशी बिखेरने के लिए इतना बहुत है ...!!जब श्रीमानजी के लिए धनिया खरीदी जा रही थी ...तो थोड़ी उनकी ट्रेनिंग भी याद रही ..."थोडा भाव-ताव  किया करो ...!''बस वही याद करते करते लग गए भाव -ताव करने ...!!"अरे इतना महंगा धनिया ..!!!!अरे नहीं भई ...भाव तो ठीक दो ।"अब वो भला मानुस भी अपनी दलीले देने लग गया । मानने को राज़ी नहीं ...खैर मैंने भी सोचा नहीं लूंगी अगर कम में नहीं देगा ....!! मैं पलटी और वापस चल दी   !!


पंद्रह बीस  कदम चल चुकी थी ,तब  न जाने क्या  सोच कर उसने मुझे आवाज़ दी ..."ओ मोठी बेन .....कोतमीर लइए जाओ | " मैं वड़ोदरा  में नई थी और गुजराती भी नहीं जानती थी | और तो और मोटापे की मारी तो थी ही ! अब मोटे इंसान को अगर मोटा कह दिया जाये तो उससे बुरा उसके लिए और कुछ नहीं होता ,यकीन मानिये !!उसकी आवाज़ सुनते ही गुस्से के मारे मैं तमतमा गई  !!"उसने मुझे मोटी  बोला  तो बोला  कैसे ??? पलटकर तेज़  रफ़्तार मैं उसकी ओर बढ़ने लगी !मेरा चेहरा देखते ही भला मानुस मेरे मन की बात समझ गया | तुरंत हाथ जोड़ खड़ा हुआ और बोला " बेन आप गुजरात में नए आये हो ??'' उसके मासूम चेहरे और धीर गंभीर व्यक्तित्व के आगे मेरे गुस्से ने अपने हथियार डाल दिए !! मैंने कहा "हाँ ,क्यों  ??" ''अरे बेन इधर ,हमारे गुजराती में मोठी मने बड़ी बेन होता है मोटी नहीं  !!" इतना कहकर मुस्कुरा दिया | अब मुझे अपनी गलती समझ आई |

इस घटना का असर यह हुआ कि वो सब्जी वाला मेरा परमानेंट सब्जी वाला बन गया ,जब तक मैं वड़ोदरा  में रही |


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कभी कभी थोड़ा हंसना -हँसाना भी सेहत के लिए अच्छा होता है .....!!!


अनुपमा त्रिपाठी 

"सुकृति "

28 April, 2022

लक्ष्मी

रमेश बड़ा ही ईमानदार और सज्जन पुरुष है | नेक दिल इंसान ,हर किसी की मदद  को तत्पर !!गरीबी में भी कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाये | स्कूल के मास्टर साब ,जो पिताजी के दोस्त भी हैं ,उनके घर बचपन से आना जाना रहा है | उन्हीं की पुत्री सुगंधा कब हृदय में विराजमान हो गई ,पता ही नहीं चला | दोनों मित्र अपने बच्चों के मन की बात जानते थे ,सो यथा समय विवाह हो गया | गाँव का जीवन आसान नहीं होता !! नित नयी मुश्किल का सामना करते हुए रमेश दो पुत्रियों का पिता भी बन गया | उसे अपनी बेटियां बहुत प्यारी थी !! खेत खलिहान पर दिन भर की थकन के बाद जब घर आता ,बच्चों की मीठी मीठी बातों में सरे ग़म भूल जाता | सुगंधा मेहनत कर दिन -ब-दिन दुबली हुई जा रही थी!दूसरे प्रसव में उसे बहुत तकलीफ़ हुई थी और डॉक्टर दीदी ने कह दिया था, "रमेश अब तुम तीसरे बच्चे की सोचना भी मत | "

       इसी तरह छुटकी भी अब आठ साल की हो गई थी !! रमेश जहाँ जाता गाँव के बूढ़े उसे आशीष देते कह ही देते ,''एक लड़का हुई जाये | '' रमेश कभी खीज भी जाता | लेकिन समाज का असर मनस्थिति पर हो ही जाता है | रमेश के मन में भी यही विचार धीरे धीरे घर करने लगा | किसी तरह उसने सुगंधा को भी राज़ी कर लिया | जब तीसरे गर्भावस्था की ख़बर डॉक्टर दीदी को मिली तो वे बहुत नाराज़ हुईं | लेकिन इस बार सुगंधा की तबियत बिलकुल ठीक है | उसे खूब भूख़ लगती है ,और चेहरे पर चमक भी आ गई है | सुगंधा को लगा वैभव लक्ष्मी का व्रत कर उसने इस बार लड़का माँगा है ,शायद ईश्वर ने उसकी सुन ली है | रमेश के दिन बदलने से लगे हैं | नित नई  परेशानियां दूर भागने लगीं हैं | उसे समझ में आ गया है कि उसका सोया भाग जाग गया है !! ये बच्चा उनके परिवार के लिए भाग्यशाली सिद्ध हो रहा है | सुगंधा जहाँ जाती बड़ी बूढ़ी  औरतें अटकलें लगतीं ,''लड़का है '',कुछ कहतीं ,''मुझे तो इस बार भी लड़की ही लगे है |'' सुगंधा धीरे से मुस्कुरा देती | अब वो दिन आ ही गया | जैसे ही बच्चा हुआ ,सुगंघा ने डॉक्टर दीदी से तुरंत पूछा ,''दीदी क्या हुआ ?" अब डॉक्टर दीदी थोड़ी असमंजस में आ गईं  कैसे बताया जाये !! उन्होंने टालने की कोशिश की | सुगंधा समझ गई की इस बार भी लड़की है !! उधर रमेश ईश्वर से सुगंधा और बच्चे के लिए दुआ मांग रहा था !! वो ये बात तो जान ही गया था कि बच्चा उसके लिए बहुत किस्मत लेकर आया है और अब उसके दिन फिर गए हैं !! जैसे ही डॉक्टर दीदी प्रसव रूम से बहार आईं उन्होंने बड़ी मायूसी से कहा ,''रमेश इस बार भी लड़की है | '' रमेश के पास दो रास्ते थे ,या तो अपनी किस्मत को ख़ुशी ख़ुशी स्वीकार करे ,या जीवन भर मायूस रहे | उसने मुस्कुराते हुए पूछा ,''दीदी सुगंधा ठीक है न ? और हाँ दीदी इस बच्ची का नाम हमने लक्ष्मी तय किया है |'' डॉक्टर दीदी को अब रमेश और सुगंधा पर गर्व हो रहा था !! 



अनुपमा त्रिपाठी 

  ''सुकृति "

25 April, 2022

मेहनत रंग लाई !! (लघु कथा )

मेहनत रंग लाई!!(लघुकथा )

सुनील को उसके काम की वजह से बहुत इज़्ज़त मिलती है |  प्यारी सी मुनिया को पा सुनील मिस्त्री बहुत खुश था |अब दूसरा बच्चा नहीं चाहिए | सुरेखा भी सिलाई करके कुछ पैसे कमा लेती थी सर्व गुण संपन्न ,आठ साल की मुनिया कॉन्वेंट में पढ़ती है | पढ़ने में अव्वल |

 कल मुनिया ने पापा से पूछ ही लिया ,''पापा आप ने क्या पढ़ाई की है ?'' सुनील ने बात टाल दी | उसे लगा अगर  मुनिया को डॉक्टर बनाना है तो उसे पढ़ाई करनी ही पड़ेगी |  उसने मैट्रिक का फॉर्म भर दिया | मेहनत रंग लाती  है | आज मुनिया डॉक्टर है ,सुनील का काम बढ़िया चल रहा है और घर के  बाहर  बोर्ड लगा है सुनील मिस्त्री ,बी ए ,एल.एल बी !!


अनुपमा त्रिपाठी 

  "सुकृति "