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20 July, 2022

बन पलाश !!


मुड़ती हुई सी राह की वो मुश्किलें 

 कर न पाईं थीं मेरे मन को हताश 

गूँज उठती आस  वही एक नाद बन 

रंग उठता था कि जैसे बन पलाश !! 


प्रकृति से सार पाने की क्रिया का

भोर से मन जोड़ने की प्रक्रिया का

नित नए अवगुंठनो को  खोलने का 

करती हूँ सतत अनूठा सा प्रयास !!


मुड़ती हुई सी राह की वो मुश्किलें 

कर न पाईं थीं मेरे मन को हताश 


मोर की टिहुँकार सुन मैं जाग जाती 

पपीहे की पिहु पिहु में गीत गाती 

बासन्ती हँसी में जाग जाती मेरे हृद की 

सोई हुई अप्रतिम उजास !!


मुड़ती हुई सी राह की वो मुश्किलें 

कर न पाईं थीं मेरे मन को हताश !!


अनुपमा त्रिपाठी 

"सुकृति ''





  

8 comments:

  1. वाह वाह! खूब अभिव्यक्ति।

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  2. बहुत सुंदर एवं प्रेरणास्पद कविता है आपकी अनुपमा जी। अभिनंदन।

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  3. प्रकृति से प्रेरणा ले कर एक सकारात्मक सोच के साथ लिखी बेहतरीन रचना । प्रयास निरंतर जारी रहे ।

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  4. सकारात्मकता सदा सही मार्ग दिखलाती है ! सुंदर रचना

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  5. वाह , आभार आपका

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  6. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार २२ जुलाई २०२२ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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    Replies
    1. धन्यवाद श्वेता सिन्हा जी मेरी रचना को साझा करने हेतु ❤!

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  7. प्रकृति से सार पाने की क्रिया का

    भोर से मन जोड़ने की प्रक्रिया का

    नित नए अवगुंठनो को खोलने का

    करती हूँ सतत अनूठा सा प्रयास !!
    बस यूँ ही अवगुंठन खोलना है ही है जिंदग।

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