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07 July, 2022

हाइकु


तुम पुकारो

गाओ प्रातः का राग

प्रीत महके


 भोर चहके

चिड़ियों की रागिनी

मन बहके


 प्रीत श्रृंगार

नवल अलंकार

गीत लहके


 भोर सुहानी

कहती है कहानी

शब्द संवारे


 पँख फैलाये

डोल रहा है मन

गुनगुनाये


 रैन बसेरा

क्यों मन लगाए रे

दुनिया मेला


 लिखते चलो

जीवन अभिलाषा

मन की भाषा


आई बहार

सकल बन फूले 

रंग बिखरे


पुष्प धवल 

सुगन्धित बयार 

खिले संसार 


 हुआ सवेरा

जागी फिर आशाएं

खिली दिशाएं


घूँघट खोला

नवल प्रभात ने

बिखेरे रंग


 पापीहा बोले

भेद जिया के खोले

मनवा डोले


 दिन बीतते

फिर भी न रीतते

स्वप्न सलोने


 आई बहार

सकल बन फूले

छाई बहार


 चंचल मन

जा रे पिया के देस

उड़ता जा रे


प्रकृति नटी 

रंग ज्यों बिखराये 

प्रीत सजाये 


तुमसे बनी 

आकृति प्रीत की 

झूमे प्रकृति 


अनुपमा त्रिपाठी

'सुकृति '

7 comments:

  1. हाइकू संग
    भोर की रंगशाला
    बिखेरे रंग
    ***********
    हर हाइकु
    प्रीत लिए संग में
    मन को भाए ।

    बेहतरीन हाइकु ।

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    1. अहा दी कितने सुंदर हाइकू ,धन्यवाद !!

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  2. नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शुक्रवार 08 जुलाई 2022 को 'आँगन में रखी कुर्सियाँ अब धूप में तपती हैं' (चर्चा अंक 4484) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है। 12:01 AM के बाद आपकी प्रस्तुति ब्लॉग 'चर्चामंच' पर उपलब्ध होगी।

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    Replies
    1. नमस्ते रविंद्र सिंह यादव जी ,
      मेरी प्रविष्टि को चर्चा मंच पर स्थान देने हेतु सादर धन्यवाद आपका |

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  3. वाह ! जीवन के अनगिन रंग हाईकू के संग, सुंदर सृजन !

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  4. बहुत सुंदर

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