नमष्कार !!आपका स्वागत है ....!!!

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02 October, 2022

यूँ ही रहता हूँ !!!

ज़िन्दगी की हसीन पनाहों में यूँ ही फिरता हूँ ,

तेरी तस्वीर को आँखों में लिए फिरता हूँ !!

आवारगी की ये कैसी इन्तेहाँ हो गई 

तेरे संग धूप में छाया में यूँ ही फिरता हूँ 

मेरी मस्ती को मेरी हस्ती की ये कमज़ोरी न समझ 

तू ही तू है तेरी यादों में यूँ ही रहता हूँ !!!


तेरे आने की खबर ले के हवा आती  है 

तेरे रुखसार पे अलकों सी घटा छाती है 

तेरे उस नूर का हर पल मैं यूँ दीदार करूँ 

इसी हसरत में यूँ ही शाम ओ सहर जीता हूँ 

अनुपमा त्रिपाठी 

   ''सुकृति ''

04 June, 2022

शजर

तेरी फ़िक्र से मुझमे है मेरी सांस का होना '

तुझे तुझसे कहीं  दूर चुरा लाया हूँ मैं 


तेरे चेहरे की हँसी में ही मेरी शाम-ओ -सहर है

सबब -ए -ज़िक्र का पोशीदा असर लाया हूँ मैं


मौसम-ए -गुल की पनाहों में  मैं हूँ ,तेरे ख़त  भी हैं

तेरी यादों से रची शाम संवार लाया हूँ मैं


घने शजर की छाँव में की दो घड़ी  की बात 

दिल अपना तेरे पास यूँ ही छोड़ आया हूँ मैं


अनुपमा त्रिपाठी

"सुकृति "


24 September, 2013

जीवन की मौलिकता .....!!


''महुआ ले आई बीन के -
और तिल्ली  धरी है कूट -
आज सजन की आवती -
सो कौन बात की छूट .......!!

 गुड़ होतो तो
 गुलगुला बनाती  ....
तेल   लै आती उधार...
मनो का करों जा बात की ..
मैं आटे से लाचार ........!!!!''



ये  बुन्देलखंडी कहावत, अम्मा (मेरी दादी ) बहुत सारी  चीज़ों में अपनी लाचारगी को छुपाते हुए, बहुत खुश होकर कहा करती थीं |उनकी लाचारगी अब समझ में आती है |

कितना कुछ करना चाहते हैं हम इस जीवन में !!और ज़िन्दगी के इस घेरे में बंध कर क्या - क्या कर पाते हैं ...!!


स्वप्न और यथार्थ के बीच की कड़ी ही जीवन है ...!!
भले ही हम तरक्की कर चाँद पर ही क्यों न घर बना लें ,कुछ मौलिक बातों से दूर हम कभी ....कभी नहीं जा पाते  !!यही शाश्वत सत्य से जुड़ाव ही, हमें जीवन को जीने का कोई संदर्भ ,कोई कारण  भी  देता है !!

  समय के साथसाथ पुरानी कहावते ,मान्यताएं सभी तो दम तोड़ रहीं हैं |अम्मा की दी हुई इस धरोहर को आप सभी तक पहुंचा कर उनको एक भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करती हूँ |वो क्या गयीं मेरा बुन्देलखंडी भाषा से जैसे नाता ही टूट गया |
मेरा वो --''काय अम्मा ?''पूछना और उनका वो --''कछु नईं बेटा ....''कहना बहुत याद आ रहा है | आज उन्हीं की यादों  के साथ पुनः जी ले  रही हूँ अपना बचपन थोड़ी देर के लिए ....!!

''धीरे गूँद  गुंदना री गूँदना......धीरे गूँद गूँदना री .....''
ये गीत भी अम्मा गाती थीं |
और इसे  लिखते लिखते भी मन मुस्कुरा  रहा है |याद आ रहा है उनके हाथ पर बना वो गूँदना |आजकल के बच्चे जिसे टैटू कहते हैं ,अम्मा उसे गूँदना कहती थीं |सच है न .........कुछ तो है जो कभी नहीं बदलता .....जैसे जीवन की मौलिकता .....!!या हमारा माटी से जुड़ाव ....

''मन क्यूँ नहीं भजता राम लला .....
कृष्ण नाम की माखन मिसरी ....
राम नाम के दही बड़ा ...
मन क्यूँ नहीं भजता राम लला ....!!''

अम्मा काम करती जाती थीं और गाने गुनगुनाती जाती थीं !!
''छोटी-छोटी सुइयां रे ....जाली का मेरा काढ़ना ....!!''
अब समझ में आता है ये सब रियाज़ होता था उनका ...!!
''संजा के मिसराइन के इते बुलौआ  आए |सोई आए गाना चल रओ''(शाम को मिसराइन याने -श्रीमति मिश्रा ,के घर गाने का बुलावा है ,इसलिए गाने का रियाज़ हो रहा है ...!!):))

और फिर शाम को मिसराइन के घर ढोलक  की धमक और गीतों भरी वो शाम .....
कितनी सादगी से ,परम्पराओं से जुड़ा सार्थक सुंदर जीवन ...........