तेरी फ़िक्र से मुझमे है मेरी सांस का होना '
तुझे तुझसे कहीं दूर चुरा लाया हूँ मैं
तेरे चेहरे की हँसी में ही मेरी शाम-ओ -सहर है
सबब -ए -ज़िक्र का पोशीदा असर लाया हूँ मैं
मौसम-ए -गुल की पनाहों में मैं हूँ ,तेरे ख़त भी हैं
तेरी यादों से रची शाम संवार लाया हूँ मैं
घने शजर की छाँव में की दो घड़ी की बात
दिल अपना तेरे पास यूँ ही छोड़ आया हूँ मैं
अनुपमा त्रिपाठी
"सुकृति "
