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06 October, 2012

श्यामल यवनिका उठ चली ..

श्यामल यवनिका उठ चली ..




 


 प्राची पट खोल रही  ...

श्यामल यवनिका उठ चली ..
 जागी उषा की स्वर्णिम लाली ...
नभ नवल नील मस्तक सजाती ....  ....
 मुस्काती .. आशा की लाली ...!!
छलकाती नवरस की प्याली .....!!



कुछ अनहद नाद सी श्रुति ....
अमर भावना सी लगी ...
अद्भुत भोर हुई ...!!




मंगलाचरण  गाते विहग ....
दूर क्षितिज पर  ....
रेखा सी कतार कहीं ...
कहीं भरते छोटी सी उड़ान ...!!
सभी का  स्मित विहान.......!!
नील नवल वितान ...
खिल रहा आसमान ....!!
छा जाती मन पर......वो आकृति ...
जो देती नहीं दिखाई ....पर देती है सुनाई ...




ॐ सा ओंकार सुनाते ....

मंगलाचरण गाते विहगों की ....
अनहद नाद सी मन दस्तक देने आई ....
आई ...मन भाई ......
नभ मुख मण्डल..
अरुणिमा  छाई ...
 ....अब ले अंगड़ाई ...
पुनि भोर भई  ....!!  ...
अद्भुत भोर भई ....



46 comments:

  1. आई ...मन भाई ......
    नभ मुख मण्डल..
    अरुणिमा छाई ...
    खुबसूरत शब्दों का बेहतरीन ताना-बाना,

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  2. बढ़िया सुबह-
    आभार ||

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  3. वाह ... बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

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  4. अवर्णनीय प्रातःकालीन सौंदर्य शब्द चित्र

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  5. बहुत ही ख़ूबसूरत वर्णन प्रातः का.
    सारे दृश्य आँखों के समक्ष साकार हो उठे.

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  6. बहुत सुन्दर........
    ऐसी भोर ....दिन तो शुभ होगा ही..
    सादर
    अनु

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  7. हर पहर में शंकनाद...अच्छा लगता है

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  8. khubsurat shabdo ke sath chitran......

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  9. आई ...मन भाई ......
    नभ मुख मण्डल..
    अरुणिमा छाई ...
    ....अब ले अंगड़ाई ...
    पुनि भोर हुई ....!! ...
    अद्भुत भोर हुई ....

    हर पल सुकून देती सुबह पक्षियों के कलरव के संग .

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  10. वाह: अद्भुत भोर की सुनहरी लाली सा सुन्दर शब्द चित्र..आभार..

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  11. बहुत भावपूर्ण रचना |
    आशा

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  12. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (07-10-2012) के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    सूचनार्थ!

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    Replies
    1. बहुत आभार शास्त्री जी ...!!

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  13. भोर भयी, अद्भुत भयी।

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  14. बीती बिभावरी जाग री
    अम्बर पनघट में डुबो रही , ताराघट उषा नागरी
    खग -कुल कुल -कुल सा बोल रहा
    किसलय का अंचल डोल रहा
    लो यह लतिका भी भर ला‌ई-
    मधु मुकुल नवल रस गागरी ।

    आपकी कविता पढ़ के मुझे प्रसाद जी की ये कविता यद् आई . अत्यंत सुन्दर, शब्दों में आपने सुबह का चित्ताकर्षक वर्णन किया है .

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  15. मंगलाचरण गाते विहगों की ....
    अनहद नाद सी मन दस्तक देने आई ....
    .................
    अद्भुत

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  16. मंगलाचरण गाते विहगों की ....अनहद नाद सी मन दस्तक देने आई ....
    प्रातः का अद्भुत वर्णन पढ़ अभी रात में लगा जैसे सुबह हो रही है सुंदर शब्द विन्यास अनुपमा


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  17. कुछ अनहद नाद सी श्रुति ....
    अमर भावना सी लगी ...
    अद्भुत भोर हुई ...!!

    वाह ....बहुत सुंदर चित्रण ....

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  18. कुछ अनहद नाद सी श्रुति ....

    वाह !!!!!!!!!!!!!! शब्दों के चमत्कारिक प्रयोग ने श्यामल यवनिका सचमुच ही उठा दी. लुप्त-सुप्त दुर्लभ शब्दों की कमलिनी खिल उठीं. भावों की सद्यस्नात पवन ने जैसे नम छुअन के साथ कह दिया - शुभ प्रभात...........

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  19. शब्दों से चमत्कार किया है आपने अनुपमा जी.

    बेहतरीन प्रस्तुति.

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  20. रूपक ताल में सजी राग भैरवी की कोई रचना है यह..या किसी चित्रकार की पेंटिंग!! जो भी है, बस एक एहसास है जो दिल को सुकून पहुंचा रहा है!!
    अनुपमा जी बहुत सुन्दर!!

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  21. ...अब ले अंगड़ाई ...
    पुनि भोर भई ....!! ...
    अद्भुत भोर भई ..
    सुनहरी लाली ....अनुपमा जी

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  22. बहुत ही खुबसूरत चित्रण ...लगा जैसे अभी अभी पौ फटी

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  23. बहुत सुन्दर ,खुबसूरत वर्णन...
    :-)

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  24. अद्भुत भोर के अद्भुत अनुभव की अद्भुत अभिव्यक्ति ..

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  25. सूर्योदय का बहुत ही चित्रात्मक वर्णन किया है ! ऐसी सुहानी भोर का स्वागत कर मन सचमुच विभोर हो उठा ! बहुत सुन्दर !

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  26. भोर का सुंदर वर्णन ।

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  27. सुबह सुबह ही भोर का अप्रतिम वर्णन पढ़ आनंद आ गया .... बहुत सुंदर

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  28. sadharan bhasha me good morning kaha ja sakta hai na :))) anupama jee:)
    waise aapke rachna ka jabab nahi...

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  29. अद्भुत भाव को रोम-रोम में प्रवाहित करती.. अद्भुत..

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  30. beautiful Hindi....very impressive...

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  31. अनुपमा जी, पहले तो आपके ब्लॉग पर न आ पाने के लिए खेद, सदा की तरह संगीतमयी आपकी रचना में भोर का अद्भुत वर्णन पढकर मन तृप्त हुआ.. चित्र भी अनुपम हैं..आभार !

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  32. मंगलाचरण गाते विहग ....
    दूर क्षितिज पर ....
    रेखा सी कतार कहीं ...
    कहीं भरते छोटी सी उड़ान ...!!
    सभी का स्मित विहान.......!

    विहगों का कलरव प्रातः ग्रंथ का मंगलाचरण ही है।
    रचना बार-बार पठनीय है।

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  33. आपके शब्द प्रभावित करते हैं ...
    आभार !

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  34. प्रकृति की अनुपम छटा को आपने ऐसा सजाया है शब्दों मानों चित्रकार ने कूची से रंग भर दिया हो।

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  35. आप सभी का बहुत आभार ....!!

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नमस्कार ...!!पढ़कर अपने विचार ज़रूर दें .....!!