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28 September, 2019

यूँ मुस्कुरा रहा हूँ मैं

कुछ दूर मुझसे यूँ  मेरा क़िरदार जा बसा ,
वही खोज तरन्नुम की जहाँ खो गया हूँ मैं

वाबस्ता नहीं  मुझसे ये दीदारे हुनर भी ,
इक बूँद में सागर का जिगर बांचता हूँ मैं

तू है तो ज़माने का नमक भी क़ुबूल है ,
तेरे हुनर से गीत-ग़ज़ल राचता  हूँ मैं












लिखने का फ़न तो रस्मों अदायगी ही सही
पढ़ पढ़ के तेरे गीत यूँ मुस्कुरा रहा हूँ मैं

अनुपमा त्रिपाठी
 "सुकृति "

5 comments:


  1. जय मां हाटेशवरी.......
    आप को बताते हुए हर्ष हो रहा है......
    आप की इस रचना का लिंक भी......
    29/09/2019 रविवार को......
    पांच लिंकों का आनंद ब्लौग पर.....
    शामिल किया गया है.....
    आप भी इस हलचल में. .....
    सादर आमंत्रित है......

    अधिक जानकारी के लिये ब्लौग का लिंक:
    http s://www.halchalwith5links.blogspot.com
    धन्यवाद

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  2. बहुत सुन्दर

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  3. हाँ , मुस्कुराहट तो आ ही गई ।

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  4. बेहतरीन/उम्दा सृजन।

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  5. वाह ! सुंदर भावपूर्ण रचना

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