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26 September, 2020

आज भी .. ...(अनुगूंज ) 25

आज भी .. ...
आज भी सूर्यांश की ऊष्मा  ने 
अभिनव मन  के कपाट खोले  ,
देकर ओजस्विता
किरणें चहुँ दिस  ,
रस अमृत घोलें  ..!!
आज भी चढ़ती धूप  सुनहरी ,
भेद जिया के खोले ,
नीम की डार पर आज भी
गौरैया की चहकन
चहक चहक  बोले ,
आज भी साँझ की पतियाँ 
लाई है संदेसा
 पिया आवन का , 
आज भी
खिलखिलाती है ज़िन्दगी 
गुनकर जो रंग ,
बुनकर सा हृदय आज भी 
बुन लेता है
अभिरामिक शब्दों को
आमंजु अभिधा में ऐसे ,
जैसे तुम्हारी कविता
मेरे हृदय  में स्थापित होती है ,
अनुश्रुति सी ,अपने
अथक प्रयत्न के उपरान्त !!
हाँ ..... आज भी ..!!


अनुपमा त्रिपाठी
 "सुकृति "

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