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26 May, 2022

पथकिनी

विजन निशा की व्याकुल भटकन ,

पथकिनी  का ऐसा जीवन ,

मलयानिल का वेग सहन कर ,

मुख पर कुंतल का आलिंगन ,

बढ़ती जाती पथ पर अपने ,

उषा का स्वागत करता मन !!


रात्रि की निस्तब्धता में 

कुमुदिनी कलिका का किलक बसेरा 

प्रातः के ललाम आलोक में 

उर सरोज सा खिलता सवेरा !!


री पथकिनी तू रुक मत 

नित नित चलती चल ,

धरा पर सूर्य की आभा से 

मचलती चल !!


अनुपमा त्रिपाठी 

  "सुकृति "

15 comments:

  1. इस रूप गर्विता के पांव को धरती भी चूमती होगी। अति सुन्दर कृति।

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  2. बहुत सुंदर रचना,

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  3. बहुत सुंदर रचना

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  4. चरैवेती का संदेश देती सुंदर कृति

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  5. चलना ही जिदंगी है

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  6. खूबसूरत अभिव्यक्ति .....एहसास दिल के

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  7. ऊषा का स्वागत करता मन कितनी आतुरता से रात्रि के बाद लालिमा लिए भोर की प्रतीक्षा करता है । ऐसे में पथकिनी कैसे रुक सकती है ।। बहुत सुंदर रचना ।

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  8. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार(२८-०५-२०२२ ) को
    'सुलगी है प्रीत की अँगीठी'(चर्चा अंक-४४४४)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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    1. @अनीता सैनी 'दीप्ती ' जी आपका सादर धन्यवाद आपने मेरी कृति को चर्चा मंच पर स्थान दिया!!

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  9. बहुत सुंदर रचना

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  10. बहुत सुंदर सृजन

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  11. री पथकिनी तू रुक मत

    नित नित चलती चल ,

    धरा पर सूर्य की आभा से

    मचलती चल !!..बहुत सुंदर प्रेरणा से युक्त सराहनीय रचना।

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  12. प्रेरणादायक सृजन, चलना ही जीवन है,सादर नमन आपको 🙏

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  13. बहुत ही भावपूर्ण रचना

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  14. बहुत ही भावपूर्ण रचना

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