हे वृक्ष
कतिपय
तुम्हारी छाया के अवलंबन में
अभ्रांत सहृदयता के पलों के
सात्विक तत्व से
आश्रय पाकर ही
सूर्य की तेजस्विता से
आलोकित होता है जीवन ...!!
तुम पर झूलते
पाखी के झूले
सदाशयता की चहक से
गुंजायमान हो
भोर की आहट बनते हैं
तुम से ही धरा पर हरियाली है ...!!
खुशहाली है !!
अनुपमा त्रिपाठी
"सुकृति "
