नमष्कार !!आपका स्वागत है ....!!!

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09 January, 2014

चन्द्र तुम मौन हो .......



मैं विकारी ... तुम निर्विकार ...!!
निराकार मुझमे लेते हो आकार ,
रजनी के ललाट  पर उज्ज्वल
यूं मिटाते हो हृदय कलुष ,
मैं आधेय तुम आधार ....!!

मेरे मन के एकाकी क्षणो को
 तुम ही तो भर  रहे हो,
बताओ तो -
क्यूँ लगता है मुझे

मेरे हृदय के असंख्य अनुनाद,
वो अनहद नाद ,
सुन रहे हो
समझ रहे हो ...!!
तभी तो ..
भीगी हुई चाँदनी सरस बरस रही है
चन्द्र तुम मौन हो,
और ....मेरे निभृत क्षणों   को----------
झर झर भर रहा है
अविदित मधुरता सरसाता हुआ,
बरसता हुआ अविरल,
शुभ्र ज्योत्सना सा
तुम्हारा हृदयामृत  .....!!

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निभृत -शांत सा ...एकाकी सा ...