रहता नहीं जब
कोई भी समीप -
सघन तिमिर में,
हृदय में
घनीभूत आश्वस्ति सा
टिमटिमाता रहता है
वही दीप ,
सघन तिमिर में !!
पूस की रैन
जाग जाग कर बीतती है,
जब टीस हृदय की
आस लिए नैन बसती है,
ओस पात पात जमती है ,
नैराश्य से लड़ता है मन ,
आशा का रहता है संचार
जब सघन तिमिर में,
तारों सी निसर्ग पर ,
तब भी रहती है,
उद्दीप्त मुस्कान,
सघन तिमिर में !!
पंखों में उड़ान भर ,
पाखी करते हैं
नव प्रात का स्वागत ...!!!
शनैः शनैः
तिरोहित होता जाता है तमस
भी तब सघन तिमिर मेंअनुपमा त्रिपाठी
"सुकृति "

