नमष्कार !!आपका स्वागत है ....!!!

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20 February, 2012

गुलाबी सा गुलाब ....!!


जीते हुए जीवन ...
सहजता से...सजकता से ..सुघड़ता से ..
जीवन की कठिनाईयों पर ...कामना पर  ...
प्रबलता से ....सबलता से ..सरलता से ..
विजय पाना ...
गुलाब के फूल की तरह ...
घिर कर काँटों से ..
धूप में ..छाँव में इस तरह  खिलना...
कोमलता को ही आत्मसात करना ...
संस्कारों की उर्वरक पाकर ...
मंद मंद मुस्काना ... ......
काँटों से ऊपर उठ जाना ...
सुखद अनुभूति ही देना ...
हे गुलाब ...
आसान नहीं है ... कठिन है ,
तुम्हारी तरह ...मन का ..
गुलाबी सा गुलाब बन जाना ...!!

22 November, 2011

तुम मेरी पहुँच से दूर क्यों हो ..?

प्रभु मैं हूँ -
तुम्हारी ही कृति  .. ..
मनुष्य रुपी ये तन ..
और गुण- अवगुण से भरा मन .......
तुम्हीं ने तो दिए ...
प्रसाद रूप मैंने ग्रहण किये ...!


इन्हीं को साथ ले कर...
चलती हूँ मैं......
तुम्हारे पास पहुँचने  का...
मन है ...मेरा ...
और अब यह भी प्रण है मेरा .. 
तुम्हारी इस कृति से ...
सुकृती बनना है मुझे ... 
तुम तक  पहुँचना है मुझे ..!!

राह दिखती है ..
तुम तक पहुंचती हुई..
और फिर मुड़ जाती है ... !!
ये कैसे असत्य के
घेरे से घिर गयी हूँ मैं ... .....
कितनी ही कोशिश कर लूँ ..
तुम तक पहुँचने की ...!!
तुम मेरी पहुँच से दूर क्यों हो ..?
क्या  पात्रता  नहीं  है मुझमे ..?
मेरी आहत नाद की अर्चना ...
मेरी अनाहत नाद की आराधना ...
शायद मेरे सत्य में...
मेरे कत्थ्य में ..
अभी भी वो 
तत्थ्य नहीं ..वो सत्य नहीं ...
जो तुम तक पहुँच सके......!!
मोड़ बढ़ते ही जाते हैं ..
जीवन यात्रा चलती ही जाती है ..
अंतहीन ...अनवरत ..निरंतर ...
किन्तु अटल विश्वास है ..
तुम पर ...स्वयं पर भी ..
खोज लूंगी वो निधि एक दिन ...
तुम तक पहुँचने की विधि एक दिन ...!!


मन  चिंतन ...
घिरी हुयी विचारों से ...
अब सोचती हूँ...
दीन हीन मलिन ...
शबरी में थी ..
कैसी ..भक्ति..आसक्ति ...
कैसी वो अदम्य शक्ति ....!!
खिला सकी प्रेम वश ..
अपने जूठे बेर भी तुम्हें ...
आज ..
भले ही वो युग नहीं है ...
पर सबकुछ तो झूठ
अभी भी  नहीं है ...
दमकती है ..चमकती है ...
दूर ....एक किरण ...

अभी भी दिखती है-
निश्छल मुस्कान...
कुछ चेहरों पर...
कुछ सत्य बाकी है ..
निश्चित ही धरा पर ... 
देता है नवचेतना ..
ये उगता हुआ सूर्य मुझे ...
चलना है चलना है ...
चलते ही जाना है ...
 जीवन पर्यन्त..
प्रयत्न करते रहना है ....
त्याग  कर असत्य का ..
ये  ताना-बाना...
सशक्त सत्य को खोजते हुए .. 
तुम तक पहुँचना ही है एक दिन ...!!


कुछ  समय  पूर्व परिकल्पना पर छपी थी ये कविता आज इसे ब्लॉग पर डाल रही हूँ |